गुरुवार, 14 नवंबर 2013

गाँव की छोरी..!!

ओ भोली-भाली सूरत वाली,
नयन तुम्हारे अजब-गजब है,
होंठ लगे ठहरा सा दरिया,
माथे पर सूरज सी चमक है,
पर पहचान नही ये तेरे,
मेरे दिल में होने कि,
काले पत्थर में हीरे कि,
और सीप के भीतर मोती की!

तू है मोहनी न है रुकमणी न कोई,
परी सुहानी है, न तू गंगा का तट
है और न यमुना का पानी है,
अरे तू तो है वो गाँव की छोरी
जिसकी बात निराली है,
जिसके बिना क्या जीना मरना
दोनों ही फ़नकारी है,
अरे है पहचान यही तो तेरे
मेरे दिल में होने कि, काले पत्थर
में हीरे कि और सीप के भीतर
मोती की!!

न जाने  तू कैसे मुझको मेरी
साँसों से पढ़ लेती है, पता नही
तू खुद को कैसे मेरी इच्छा
से ढक लेती है, क्या इतना आसान
है बोलो ऐसे दिल का मिल पाना,
ऐसे दिल बिन क्या जीना और
ऐसे दिल बिन मर जाना,
तो है पहचान यही तो तेरे
मेरे दिल में होने कि, काले पत्थर
में हीरे कि और सीप के भीतर
मोती की!!
(योगेन्द्र भारत)
 

रविवार, 11 अगस्त 2013

||..मिलन का गीत..||

देखो नभ में पड़ गए झूले,
धरा हुई फुलवारी,
जो कल तक थी दूर-परायी,
वो हुई आज हमारी,
अब उसकी  मांग की रेखा में मेरा
श्रंगार हुआ है,
जो कल तक हारा राजा था वो
सम्राट हुआ है..!!

उसकी भोली-भाली सूरत या हो
उसके ग़जब नयन,
या मैं बोलू ओंठ गुलाबी या फिर
वो शर्मानापन,
अब उसके इन सब गहनों पर मेरा पावन
अधिकार हुआ है,
जो कल तक हारा राजा था वो
सम्राट हुआ है..!!

हर पल हँसना हँसते रहना मेरे
नयनो ने सीख़ लिया,
जो ज़ग की मीना-चविका थी
उसको हमने जीत लिया,
अरे, कुछ तो मेरी चाहत का
उस पर ख़ास हुआ है,
जो कल तक हारा राजा था वो
सम्राट हुआ है..!!

मैंने अपने प्रेम भाव को जिस
पुस्तक में उकेरा था,
उस पुस्तक का अंतिम पन्ना
बिल्कुल कोरा-अधूरा था,
पर उसकी प्रेम की कलम को पाकर
वो भी पूर्ण हुआ है,
जो कल तक हारा राजा था वो
सम्राट हुआ है..!!



गुरुवार, 1 अगस्त 2013

!!...सच...!!

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि रात काली क्यूँ होतीं है?

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि सूरज में लाली क्यूँ होती है?-------

जब एक रोज बारिश में बैठे भिगा रहा था तन,

तब ही इसका उत्तर यूँ ही उठ गया मेरे मन,

कि रात काली नही होती सूरज में लाली होती है,

और जब ये कहीं सों जाता है,

तो इसकी परछाई बादल के संग सोती है,

और जिसको हम कहते है रात वो दरसल रात नहीं,

वो दो प्रेमी के मिलन का मुहरत है,

जो अविरत ही आता है,

इस सूनसान अंधियारे में सूरज भी हनीमून मनाता है,

और जिसे हम समझते है पानी कि बूँदे,

वो केवल पानी नही,

वो दो प्रेमी के मिलन का परिणाम है,

उनके इस त्याग को यूँ जाया न करो तुम,

इन सच्चे प्रेमियों कि संतानों को यूँ बहाया न करो तुम...!!

कुछ शब्द:
           
             ''देखें बहुत से प्रेमी दुनिया में पर
              तुमसा प्रेमी युगल न पाया,
              देखें लाख करोड़ो त्यागी पर
              तुमसा महात्यागी ना पाया,
              तो झुक कर नमन है तुमको
              ऐ देवो तुमको मेरा प्रणाम है,
              हाय लगे मेरी उस मानव को
              जिसने किया तेरा अपमान है|''
            


  
            
            

बुधवार, 31 जुलाई 2013

स्त्री..!!

ऐ जगत की विकास रेखा,
ऐ धरा की शौर्य गाथा,
तुम हो प्रकृति की प्राण वायु,
फिर भी है तुझमे निराशा!

ये है नही कसाने-अजायब,
ये है स्त्री की सच्चाई,
अचला के आँखों के आँसूं,
काल की काली परछाई!

वृक्ष में पीपल हो तुम,
शब्दों में हो राम जैसी,
अक्षय परिमल हो कुसुम की,
तिमिर में हो चाँद जैसी!

फिर भी तो तुम यहाँ पर,
भय और डर से काँप रही हो,
शिव की इस पावन धरती को,
पिशाचो का गढ़ मान रही हो!

परन्तु कौन है कारण यहाँ,
तेरे इस अपमान का,
कौन है निर्माण करता,
भेड़ियाँ समाज का!

किसके अधर्मो से आखिर,
यहाँ धर्म संकट हो रहा है,
क्यों गेहूं की पिसाई में,
यहाँ घुन पिस रहा है!

आखिर किसी न किसी को,
बीड़ा तो उठाना होगा,
प्रथ्वी के विकास रथ का.
अश्व तो लौटना होगा!

परन्तु ये पानी में दीप
जलाने से कम नहीं है,
लेकिन असंभव कैसे बोलू,
जब कुछ भी असंभव नहीं है!

अगर हम अब भी न चेते
तो अनर्थ हो जायेगा,
इतिहास अवश्य ही स्वयं को,
फिर से दोहराएगा!

फिर होगी महाभारत,
फिर बहेगा रक्त-लहूँ,
एक-एक जन रोयेगा,
एक-एक जन पछताएँगा!!
                           (योगेन्द्र भारत )
                             -8052330128

बुधवार, 24 जुलाई 2013

क्यों खुश है?

क्यों खुश है रे पतिंगे,

क्यों सुख है तुझमे डोल रहा,

ये गगन भी आँचल खोल कर,

मन ही मन तुझसे कुछ बोल रहा,

मगर तू ठहरा आवारा-अज्ञानी,

तेरी समझ में कुछ न आना है,

एक न एक दिन इस गगन को भी,

तेरा साथ छोड़ कर जाना है,

मगर तू इसके साथ से रे पतिंगे,

इतना बदल जायेगा----

कि दूर बैठा शत्रु भी तुझे मित्र नज़र आएगा..!!

क्यों खुश है रे पतिंगे, अब तो बदल जा,

थोडा ठहर जा, रुक कर सोच उस गगन कि भाषा,

जो हर पल कहती है तुझसे प्रकृति कि मौन भाषा..!!
.
.
''यानि अपने अच्छे वक़्त का सही उपयोग न करना,

उसे यूँ ही भोग-विलास के कार्यो में जाया करना,

अपने-आप से खिलवाड़ करने जैसा है, ये दुनिया का

सबसे बड़ा सच है कि अच्छे वक़्त में सब साथ होते है

जब कि बुरे वक़्त में बिरले ही साथ देते है इसलिए ये बेहद

जरुरी है कि हमे वक़्त का सही उपयोग करना आना

चाहिए|''




मंगलवार, 23 जुलाई 2013

||..भारत..||

हिन्द की हवाओं में,

अपनों की दुआओं में,

देख लेती हूँ मैं सपने,

पेड़ो की छाओं में..!!


कौन है प्रतापी

जो मुझको डराएगा ,

कौन है भला जो मुझे

राह से हटाएगा,

ह्रदय में बहती है मेरे पावन गंगा

तेरा पाप भला मेरा क्या कर पायेगा..!!



समस्त विश्व की अंग्वाडी हूँ मैं,

तीनो समंदर की दुलारी हूँ मैं,

खिलते है जहाँ प्रतिभाओं के फूल,

ऐसे फूलो की फुलवारी हूँ मैं..!!


मेरे सत्य को कौन झुठलायेगा,

अहिंसा के पुजारी को कौन भुला पायेगा,

विश्व आस्था का प्रतीक हूँ मैं,

मेरे इस प्रतीक को कौन मिटा पायेगा..!!


ये माना कि हथियार उठाती नहीं मैं,

अकारण ही हिंसा फैलाती नही मैं,

मगर बुझदिल समझने कि भूल न करना,

यूँ ही हिमालय का टिका लगाती नहीं मैं..!!
                          (मेरे काव्य जीवन कि पहली कविता )













श्रंगार का गीत..!!

मैं धडकनों को चूमूं तेरे,

चूमूं तेरे अहसास को,

कोई गिला-शिकवा न हो,

जब तू मेरे पास हो..!!

मस्ती भरी बाँहे तेरी,

मेरे जिस्म को जकड़े रहे,

साँसे तेरी गर्म रेत सी,

मेरे होंठ पर टिकती रहे,

जकड़े रहे हम दोनों ही,

मदहोश हो जाये समां,

इस रात को 'भारत'

कुछ ऐसा गजब समां बने,

कि चाँदनी की रोशनी में,

पुष्प भी खिलने लगे..!!

सोमवार, 22 जुलाई 2013

अनर्गल..!!

बन गया है सिंघासन हो रही है वंदना,
धरती जीव वृक्ष यहाँ पर कर रहे है शंखनाद,
बह रही है मधुमय पवन दहाड़ रही है सिंघमय बिजली,
मानो आँखों में हो चमक जैसे विषय की विडंबना!!(१)

व्यर्थ ही आवेशित हो उठी है प्रमाद लदी ये काया,
अमोद-प्रमोद बिखेर रही है प्रकृति की काली छाया,
छू रहे है पंछी गगन झूम रही है ये धरती,
मगर व्यर्थ ही उमड़ पड़ी है तेज हवा की माया!!(2)

हाँ अब तो समय हो चला है ये बादल थोड़ा रो चला है,
मानों ढूंड रहे हो बादल अवसर का अनुमोदन,
भले ही बरसा नही वात्सल्य, नही हुआ है प्रेम गान,
मगर अनर्गल व्याकुल ये मन जैसे अम्बर का निर्वासन!!(३)

रविवार, 21 जुलाई 2013

विरह का गीत!

तेरे ह्रदय के आलिन्द में रखा है जो मोती,
मेरे नाम का होता तो तू नही रोती!
तू कर सकी नही थी हिम्मत साथ आने की,
खुद को निभाने की, सबको बताने की!!(१ )

कोशिश तो की मैंने तुझे पाने की पूरी,
पर मुझ प्रेमी के जीवन की रही भागवत अधूरी!
अरे! हो नही पाया मिलन वैदेही का उसके वर से,
मानो पूर्ण हुए न चक्कर अचला के सूरज से!!(2 )

है मालूम मुझको ये तूने त्याग किया है,
अपने ह़सी दिल को नीलाम किया है!
पर है नही कोई भी ऐसा इस ज़माने में,
जो कर सके कीमत अदा मेरे दिल को पाने में!!(३)


अब विरह के जो गीत ग़ा रहा हूँ मैं,
तू सोचती है की रुँला रहा हूँ मैं!
पर है यही सच्चाई अम्बर और धरती की,
दो दिल न मिलने की दो दिल बिछडने की!!(४)

कौन है कारण?

मुझे रुलाने लगे है अब
मेरे ही लिए हुए फैसले
वे लोग जिनके सानिध्य में रहकर
मैंने सपनो के लिए लड़ना सीखा
जिन्होंने मुझे मुश्किल निर्णयों
को लेने के लिए साहस दिया
वे सब मुझे कहाँ और क्यों
छोड़कर चले गए है?
मेरे मन में प्रश्न उठता है?
क्या ये वही है-
जिन्होंने मुझे स्वयं से
प्रेम करना सिखाया
जिन्होंने कीचड़ में पंकज
खिलने का सच बताया|
पता नही क्यों मुझे ऐसा
प्रतीत होने लगा है कि
जो प्रशंसा के तीर उन्होंने
मेरे भविष्य निर्माण के लिए छोड़े थे
वो ही आज मेरे विनाश
का कारण बने हुए है|
लेकिन अब बीच रास्ते से लौट पाना
मुमकिन नहीं दिख रहा है
सच तो ये है कि मुझे वो गलियारा
ही याद नहीं है जिसे छोड़कर
मैं यहाँ तक पहुंचा हूँ|
परन्तु इससे इतना तो लगने लगा है
कि मुझसे पाप हो गया है
इतना सारा समय मैंने व्यर्थ
ही गँवा दिया है|
मैंने पिता के विश्वास को तोडा है
उन सपनो का कत्ल किया है
जो रात-रात भर जागकर
मेरी माँ ने मेरे लिए देखे थे|
परन्तु कौन है कारण
चारो ओर फैले हुए नश्वरता
के इस वातावरण का?
मेरे लिए हुए फैसले---
या फिर वे लोग ---
जो मुझे छोड़ कर चले गए है|