सोमवार, 22 जुलाई 2013

अनर्गल..!!

बन गया है सिंघासन हो रही है वंदना,
धरती जीव वृक्ष यहाँ पर कर रहे है शंखनाद,
बह रही है मधुमय पवन दहाड़ रही है सिंघमय बिजली,
मानो आँखों में हो चमक जैसे विषय की विडंबना!!(१)

व्यर्थ ही आवेशित हो उठी है प्रमाद लदी ये काया,
अमोद-प्रमोद बिखेर रही है प्रकृति की काली छाया,
छू रहे है पंछी गगन झूम रही है ये धरती,
मगर व्यर्थ ही उमड़ पड़ी है तेज हवा की माया!!(2)

हाँ अब तो समय हो चला है ये बादल थोड़ा रो चला है,
मानों ढूंड रहे हो बादल अवसर का अनुमोदन,
भले ही बरसा नही वात्सल्य, नही हुआ है प्रेम गान,
मगर अनर्गल व्याकुल ये मन जैसे अम्बर का निर्वासन!!(३)

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