बुधवार, 31 जुलाई 2013

स्त्री..!!

ऐ जगत की विकास रेखा,
ऐ धरा की शौर्य गाथा,
तुम हो प्रकृति की प्राण वायु,
फिर भी है तुझमे निराशा!

ये है नही कसाने-अजायब,
ये है स्त्री की सच्चाई,
अचला के आँखों के आँसूं,
काल की काली परछाई!

वृक्ष में पीपल हो तुम,
शब्दों में हो राम जैसी,
अक्षय परिमल हो कुसुम की,
तिमिर में हो चाँद जैसी!

फिर भी तो तुम यहाँ पर,
भय और डर से काँप रही हो,
शिव की इस पावन धरती को,
पिशाचो का गढ़ मान रही हो!

परन्तु कौन है कारण यहाँ,
तेरे इस अपमान का,
कौन है निर्माण करता,
भेड़ियाँ समाज का!

किसके अधर्मो से आखिर,
यहाँ धर्म संकट हो रहा है,
क्यों गेहूं की पिसाई में,
यहाँ घुन पिस रहा है!

आखिर किसी न किसी को,
बीड़ा तो उठाना होगा,
प्रथ्वी के विकास रथ का.
अश्व तो लौटना होगा!

परन्तु ये पानी में दीप
जलाने से कम नहीं है,
लेकिन असंभव कैसे बोलू,
जब कुछ भी असंभव नहीं है!

अगर हम अब भी न चेते
तो अनर्थ हो जायेगा,
इतिहास अवश्य ही स्वयं को,
फिर से दोहराएगा!

फिर होगी महाभारत,
फिर बहेगा रक्त-लहूँ,
एक-एक जन रोयेगा,
एक-एक जन पछताएँगा!!
                           (योगेन्द्र भारत )
                             -8052330128

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