मंगलवार, 23 जुलाई 2013

||..भारत..||

हिन्द की हवाओं में,

अपनों की दुआओं में,

देख लेती हूँ मैं सपने,

पेड़ो की छाओं में..!!


कौन है प्रतापी

जो मुझको डराएगा ,

कौन है भला जो मुझे

राह से हटाएगा,

ह्रदय में बहती है मेरे पावन गंगा

तेरा पाप भला मेरा क्या कर पायेगा..!!



समस्त विश्व की अंग्वाडी हूँ मैं,

तीनो समंदर की दुलारी हूँ मैं,

खिलते है जहाँ प्रतिभाओं के फूल,

ऐसे फूलो की फुलवारी हूँ मैं..!!


मेरे सत्य को कौन झुठलायेगा,

अहिंसा के पुजारी को कौन भुला पायेगा,

विश्व आस्था का प्रतीक हूँ मैं,

मेरे इस प्रतीक को कौन मिटा पायेगा..!!


ये माना कि हथियार उठाती नहीं मैं,

अकारण ही हिंसा फैलाती नही मैं,

मगर बुझदिल समझने कि भूल न करना,

यूँ ही हिमालय का टिका लगाती नहीं मैं..!!
                          (मेरे काव्य जीवन कि पहली कविता )













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