बुधवार, 24 जुलाई 2013

क्यों खुश है?

क्यों खुश है रे पतिंगे,

क्यों सुख है तुझमे डोल रहा,

ये गगन भी आँचल खोल कर,

मन ही मन तुझसे कुछ बोल रहा,

मगर तू ठहरा आवारा-अज्ञानी,

तेरी समझ में कुछ न आना है,

एक न एक दिन इस गगन को भी,

तेरा साथ छोड़ कर जाना है,

मगर तू इसके साथ से रे पतिंगे,

इतना बदल जायेगा----

कि दूर बैठा शत्रु भी तुझे मित्र नज़र आएगा..!!

क्यों खुश है रे पतिंगे, अब तो बदल जा,

थोडा ठहर जा, रुक कर सोच उस गगन कि भाषा,

जो हर पल कहती है तुझसे प्रकृति कि मौन भाषा..!!
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''यानि अपने अच्छे वक़्त का सही उपयोग न करना,

उसे यूँ ही भोग-विलास के कार्यो में जाया करना,

अपने-आप से खिलवाड़ करने जैसा है, ये दुनिया का

सबसे बड़ा सच है कि अच्छे वक़्त में सब साथ होते है

जब कि बुरे वक़्त में बिरले ही साथ देते है इसलिए ये बेहद

जरुरी है कि हमे वक़्त का सही उपयोग करना आना

चाहिए|''




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