रविवार, 21 जुलाई 2013

विरह का गीत!

तेरे ह्रदय के आलिन्द में रखा है जो मोती,
मेरे नाम का होता तो तू नही रोती!
तू कर सकी नही थी हिम्मत साथ आने की,
खुद को निभाने की, सबको बताने की!!(१ )

कोशिश तो की मैंने तुझे पाने की पूरी,
पर मुझ प्रेमी के जीवन की रही भागवत अधूरी!
अरे! हो नही पाया मिलन वैदेही का उसके वर से,
मानो पूर्ण हुए न चक्कर अचला के सूरज से!!(2 )

है मालूम मुझको ये तूने त्याग किया है,
अपने ह़सी दिल को नीलाम किया है!
पर है नही कोई भी ऐसा इस ज़माने में,
जो कर सके कीमत अदा मेरे दिल को पाने में!!(३)


अब विरह के जो गीत ग़ा रहा हूँ मैं,
तू सोचती है की रुँला रहा हूँ मैं!
पर है यही सच्चाई अम्बर और धरती की,
दो दिल न मिलने की दो दिल बिछडने की!!(४)

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