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पतझड़ पावन बहार हैं,
खुला आसमां प्रेम दिखाए
मगर ये सब बेकार हैं ।
यूँ समेट ली हैं ये दुनिया
मानव ने चौखाटे में,
अलग-अलग छड़ रंग दिखाए
नए-नए भिन्न मुखौटे में ।
फुदक रही ये जीवन-धारा
इस सीमित गलियारे में
मानो पंक्षी घर बनाए
समंदर के सिरहाने में ।
न प्रताप न संयम तुझमें
न प्रेम कि ज्वाला हैं,
जहाँ भी नजर उठाकर देखो
वहाँ गड़बड़ घोटाला हैं ।
जीवन में न रंग बचा हैं,
मानो फीका ये संसार हैं,
छोटा सा परिवार बनाकर
सोचे जिम्मेदार हैं ।
यूँ जो अगर जिम्मेदारी
कर्तव्य समझ में आ जाए,
सच मानलो इस दुनिया में
राम, रहीम फिर आ जाए ।
तो कर वादा हे! मानव
अपने इस परिवार से,
सीमित से गलियार नहीं
इस पूरे संसार से ।
करे भला तू जाति का अपनी
मानव तेरी जाति हैं,
मानव का हैं धर्म वहीं जिस
धर्म में विश्व-शांति हैं ।
आँखो को जो ये पूरा
संसार नजर में आ जाए,
सच मानलो दुनिया में
इंसान नजर में आ जाए ।
फैल जाएगी प्यार-मोहब्बत
इस पूरे संसार में,
जो गर मानव को खुद में
भगवान नजर में आ जाए ।
2.
कविता हेतु केवल वाह..वाह और कुछ नहीं
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