बुधवार, 16 दिसंबर 2015

खुद में भगवान नजर आ जाए ।

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चार दिवारी दुनिया तेरी

पतझड़ पावन बहार हैं,

खुला आसमां प्रेम दिखाए

मगर ये सब बेकार हैं ।


यूँ समेट ली हैं ये दुनिया

मानव ने चौखाटे में,

अलग-अलग छड़ रंग दिखाए

नए-नए भिन्न मुखौटे में ।


फुदक रही ये जीवन-धारा

इस सीमित गलियारे में

मानो पंक्षी घर बनाए

समंदर के सिरहाने में ।


न प्रताप न संयम तुझमें

न प्रेम कि ज्वाला हैं,

जहाँ भी नजर उठाकर देखो

वहाँ गड़बड़ घोटाला हैं ।


जीवन में न रंग बचा हैं,

मानो फीका ये संसार हैं,

छोटा सा परिवार बनाकर

सोचे जिम्मेदार हैं ।

यूँ जो अगर जिम्मेदारी

कर्तव्य समझ में आ जाए,

सच मानलो इस दुनिया में

राम, रहीम फिर आ जाए ।


तो कर वादा हे! मानव

अपने इस परिवार से,

सीमित से गलियार नहीं

इस पूरे संसार से ।


करे भला तू जाति का अपनी

मानव तेरी जाति हैं,

मानव का हैं धर्म वहीं जिस

धर्म में विश्व-शांति हैं ।


आँखो को जो ये पूरा

संसार नजर में आ जाए,

सच मानलो दुनिया में

इंसान नजर में आ जाए ।


फैल जाएगी प्यार-मोहब्बत

इस पूरे संसार में,

जो गर मानव को खुद में

भगवान नजर में आ जाए ।


2.     

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