अपनी प्रथम हार को लेकर
मन-मन भींच रहा हूँ, मैं !
है आसमां बिल्कुल नीरव,
फिर भी भींग रहा हूँ, मैं !
माना स्थिति बड़ी विकट है
कुछ तो सीख रहा हूँ, मैं !
आँसु को पलकों पे सहजकर
सपने सींच रहा हूँ, मै !
असफलता के रस को चखकर
जीना सीख रहा हूँ, मैं !
सूनी पड़ी हथेली पर नयी रेखा
खीच रहा हूँ, मैं !
अपनी प्रथम हार को लेकर
मन हीं मन भींच रहा हूँ, मैं !
© योगेन्द्र भारत (कानपुर)
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