मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

अपनी प्रथम हार को लेकर


अपनी प्रथम हार को लेकर

मन-मन भींच रहा हूँ, मैं !

है आसमां बिल्कुल नीरव,

फिर भी भींग रहा हूँ, मैं !

माना स्थिति बड़ी विकट है

कुछ तो सीख रहा हूँ, मैं !

आँसु को पलकों पे सहजकर

सपने सींच रहा हूँ, मै !

असफलता के रस को चखकर

जीना सीख रहा हूँ, मैं !

सूनी पड़ी हथेली पर नयी रेखा

खीच रहा हूँ, मैं !

अपनी प्रथम हार को लेकर

मन हीं मन भींच रहा हूँ, मैं !

© योगेन्द्र भारत (कानपुर)

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