(1)
काली अँधेरी रात, चारो ओर पसरा सन्नाटा उस पर गरजते बादल 'पुष्पेन्द्र नाथ गौतम' के दिल की धड़कनो को तीव् कर रहे थे | वो मन ही मन में यही बड़बड़ाये जा रहे थे ,''पता नही वो कौन सा बुरा वक़्त था जब मैंने 'वसुंधरा' से शादी की, अजीब बेवकूफ औरत है इतनी रात गए भला कोई अपने पति को घर से बहार भेजता है | अरे! पैसे ही तो चाहियें थे, सुबह दुकान से लाकर दे देता, पता नही रात भर में जैसे दुगना कर देगी, कसम से बेवकूफ है..महा बेवकूफ | जैसे ही बदलो की गड़गड़ाहट तेज होती वैसे ही गौतम जी की साईकिल की रफतार भी तेज होती जाती | गौतम जी तेज रफ़्तार से दुकान की ओर बढ़े जा रहे थे, कि तभी साईकिल की चैन उतर गयी, एक तो इतनी रात ऊपर से काले छाये हुए बादल इस ओर ईशारा कर रहे थे कि कुछ ही देर में बारिश प्रारम्भ होने वाली है | अब और मुसीबत, गौतम जी आगे कि चैन चढ़ाएं तो पिछले पहियें कि चैन उत्तर जाये और पीछे कि चढ़ाये तो अगले पहियें की | एक तो वो पहले से ही इतनी रात गये घर से निकलना नही चाहते थे और ऊपर से साईकिल की चैन ने तो उनका ही चैन ही चैन छीन लिया | उन्होने 'आव देखा न ताव' और सड़क के किनारे की ओर पड़े पत्थर को बेढंगी रूप से साईकिल की चैन के पास मारने लगे| बेचारा उनका क्रोध उन्हे ही ले डूबा अभी चार-पाँच छोटे ही पड़ी थी की साईकिल की चैन ही टूट गयी और उनका सारा क्रोध पसीने की बूंदो के रूप में माथे पर आ गया, दिल में घबराहट सी होने लगी, जब उन्होने अपनी हाथ घडी में समय देखा तो रात्रि के साढ़े ग्यारह बज चुके थे | उन्हे ये विश्वास हो गया की वो किसी भी कीमत पर एक बजे से पहले घर नही पहुँच सकेंगे | अब तो उन्हें उलझन सी हो रही थी, सारा शारीर अकड़ा जा रहा था और मुँह बस यही निकल रहा था,''बेवकूफ औरत है..महा बेवकूफ | मन अनर्गल ही विचारो में मग्न था,''भगवान पत्थर बरसाओ पत्थर, इतने बड़े-बड़े की सर फट जाये मेरा और प्राण निकल जाये तब पता चले उस बेढंगी औरत को कि पति का मूल्य क्या होता है |'' यही सब अनर्गल तथ्य सोचते-सोचते वो मार्केट तक पहुँच गये जहाँ पर उन्होने अपनी किराने कि दुकान खोल रखी थी | मार्केट का चौकीदार वहाँ उपस्थित नही था और ऐसा लगा जैसे मार्केट कि सुरक्षा भगवान के भरोसे ही थी | चौकीदार जसवंत को अनुपस्थित पाकर उनकी बुद्धि और भी ख़राब हो गयी और वो यही बड़बड़ाने लगे ,''कमीना पैसा एक भी नही छोड़ता है, हरामखोरी तो देखो डूयटी भी सही से नही बजता है| कल ही इसको भगाता हूँ |'' उन्होने दुकान के पास ही अपनी साईकिल खड़ी की और जल्दी दिखाते हुए अपनी दुकान का शटर उठया और गोलक में रखे हुए पैसो को बटोरने लगे | उधर चौकीदार जसवंत एक हाथ में चाय का गिलास और बगल में फसे डंडे के साथ मस्त धीमे-धीमे चल से चला आ रहा था उसने जब देखा कि गौतम जी कि दुकान का शटर उठा हुआ है तो उसके तो होश ही उड़ गये | उसने वहीँ चाय के गिलास को फेका और डंडे को अपने हाथो में कस कर जकड़े हुए दुकान के शटर की ओर बढ़ा, तो देखा की कोई व्यक्ति गोलक से पैसो को बीनने में लगा हुआ है | तो चौकीदार ने 'आव देखा न ताव' और तुरंत ही डंडे की बरसात गौतम जी पर कर दी और उनके मुँह से बरबस यही निकला,''मर गया...मार डाला...बचाओ और ये कहते हुए वो वहीँ पर गिर पड़े |'' जब चौकीदार जसवंत ने देखा कि यह कोई चोर-वोर नही बल्कि गौतम जी है तो मानो उसके पैरो के नीचे से जमीं ही खिसक गयी और डंडा उसके हाथ से छूट गया|
(2)
दयाल जोशी कचहरी में दलाल थे, दलालो वाले सरे गुण उनमे विद्यमान थे | उनका कार्य ही कुछ ऐसा था कि लोगो से मेल जोल बनाकर तो रखना ही पड़ता था, पता नही कब कहाँ कोई नया ग्राहक फँस जाये | कभी किसी कार्य के लिए दयाल जोशी से कहा जाये तो न नही होती थी| पक्के बातूनी थे और हमेशा ही लोगो को कोई न कोई ज्ञान बाट ही दिया करते थे | लोगो ने उनकी इसी आदत के कारण उन्हे ज्ञानवाणी कहना शुरू कर दिया था|
मोहल्ले में दयाल जोशी का सबसे अधिक आना जाना गौतम जी के ही यहाँ पर था आखिर हो भी क्यों न दोनों के गुणो में समानता जो थी | जहाँ दयाल जोशी बातो के राजा थे तो वहीँ पर गौतम जी भी कुछ कम न थे, हमेशा ही अपनी जिंदगी के पन्नो को दुसरो को पढ़ाते हुए नजर आते थे | जब दयाल जोशी को पता चला कि चौकीदार ने चोर समझकर गौतम जी को पीट दिया और और लहूलुहान कर दिया तो दयाल जोशी को ये बात समझ में न आयी | वो बस यही सोचने लगे कि आखिर ऐसा कौन सा काम गौतम जी ने कर दिया कि उनके ही चौकीदार ने उन्हें चोर समझ कर पीट दिया |
जब इस घटना कि जानकारी तथा गौतम जी का हाल जानने के लिए वो गौतम जी के घर पहुंचे तो उन्होने देखा कि गौतम जी पलंग पर लेते हुए आराम फरमा रहे है, क्या सर क्या पैर हर जगह पट्टी बंधी हुई है | जैसे ही दयाल जोशी को गौतम जी के लड़के ने देखा तो वो तुरंत ही तेजी से भागकर अंदर कि और चला गया और अपनी माँ वसुन्धरा के पास जाकर धीरे से बोला,'' मम्मी ज्ञानवाणी चाचा आये है |'' ये तो और आये है जले में नमक छिड़कने,''वसुंधरा जी बोली''
दयाल जोशी तेज आवाज में- ''क्या हुआ गौतम साहब |''
गौतम जी- ''अरे! तुम कब आये दयाल, इतना कहकर उठने लगे |''
दयाल बाबू- ''लेते रहो गौतम भाई क्यों तकलीफ दे रहे हो | मैं सुना है कि तुम्हारे चौकीदार ने ही तुम्हे चोर समझकर तुम्हारी पिटाई कर दी क्यों गौतम भाई ऐसा क्या घटित हो गया जो तुम्हारा चौकीदार ही तुम्हे चोर समझ बैठा?''
गौतम जी- ''अब क्या बताये तुम्हे, जिस घर कि औरत ही जिद्दी हो तो ऐसा बंटाधार तो होना स्वाभाविक ही है न..|
दयाल बाबू- ''क्या कहँ रहे हो गौतम भाई, तो ये सब क्या भाभी कि वजह से हुआ है? नही...नही वो तो बड़ी समझदार और सुशील है "
गौतम जी- '' पता है कितनी समझदार है, 'बेवकूफ औरत' अब तुम ही बताओ दयाल बाबू कोई औरत अपने पति को रात ग्यारह बजे घर से बाहर भेजेगी
गौतम जी अपनी पत्नी 'वसुंधरा' कि बुराइयों का बिगुल बजाने में ही मस्त थे कि उतने में ही वसुंधरा जी मीठा और पानी लेकर वहाँ आ पहुंची और पास रखी मेज़ को खिसकाकर मीठा और पानी उस पर रख दिया |
दयाल बाबू- ''बुरा न मानियेगा, एक बात कहते है 'इतनी रात गए अपने पति को घर के बाहर भेजना कोई अच्छे संस्कारो का प्रतीक नही है |'
वसुंधरा जी- ''दयाल भैया आपको पूरी बात तो इन्होने बताई न होगी..?''
दयाल बाबू- ''हाँ गौतम भाई ये तो बताया ही नही कि इतनी रात गये आपको घर से बाहर जाने कि कौन सी जरुरत पड़ गयी?''
गौतम जी- ''अरे इनसे पूछो, दुनियां कि सबसे समझदार महिला, पैसो के आगे पति कहाँ पर टिकता है | सुबह तक का इंतज़ार तो कर नही सकती थी , पता नही जैसे पैसो को दुगना करने कि मशीन लगा रखी है जो रात भर में दुगना कर देगी
दयाल बाबू- ''अरे...अरे, क्यों गुस्सा होते हो गौतम भाई |''
वसुंधरा जी- '' अपनी गलती कौन मानता ही यहाँ पर, तीन दिन से बेचारे दोनों बेटे फीस न जमा होने कि वजह से स्कूल में लज्जित हो रहे थे, परुन्तु इनको कहाँ फर्क पड़ता है , कभी बड़े स्कूल में पढ़े हो तो पता चले वहाँ के नियम कायदे क्या होते है | जब भी पैसा मांगो तो एक ही बहाना,'अरे! वो दुकान में भूल गया, सुबह दे दूंगा |' इनसे पूछो कि कब इनकी सुबह हुई है | तीन दिन से यही बहाना सुन रही थी, क्या करती इतनी रात को दुकान भेजना ही पड़ा |''
दयाल बाबू- ''ये तो गलत बात है गौतम भाई, बच्चो कि पढाई के मामले में तो हर माता पिता को गम्भीर रहना चाहियें | आज इस विज्ञान के युग में शिक्षा से बढ़कर भला क्या है |''
गौतम जी- ''हमें चिंता है दयाल बाबू कोई दिमाग से पैदल नही हूँ | मात्रा १६ साल का ही था जब घर से चला आया, कितनी मुसीबत झेली है ये मेरा ही दिल जनता है | अपने गाँव से जब मैं यहाँ 'कानपुर' आया तो मेरे जेब में मात्र दस रूपए ही थे | आज इस बड़े शहर में मेरा खुद का मकान है हैम अच्छे से जी रहे है, मेरे बच्चे भी अच्छे खासे स्कूल में ही पढ रहे है अगर यूँ ही अकल का तुंद होता कहीं चौराहे पर खड़ा भीख मांग रहा होता |''
दयाल बाबू- ''अरे! गौतम भाई हम आप पर कोई उंगली थोड़े न उठा रहे है, क्या हमें पता नही है आप कितने मेहनती और समझदार है | मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि शायद ही कोई मोहल्ले में होगा जो आपसा मेहनती हो|''
गौतम जी(कुछ देर शांत रहने के बाद)- ''अच्छा, भाई पानी तो पियो |''
दयाल बाबू- ''हाँ...हाँ क्यों नही, तुम भी कुछ मीठा ले लो , वैसे गौतम भाई चोट ज्यादा गहरी तो नही आयी |''
गौतम जी- ''नही...नही कोई भी अंदरूनी चोट नही आयी, वो तो शुक्र है भगवान का जो सर में डंडा नही पड़ा वरना तो लेने के देने पद जाते |''
दयाल बाबू- ''फिर भी गौतम भाई दो-तीन दिन घर पर ही आराम करना |''
और इतना कह कर दयाल बाबू गौतम जी के घर से विदा ले लेते है...!
गौतम जी वसुंधरा से,''तुम यहाँ बैठे क्या कर रही हो जाओ खाना-वाना बनाओ बच्चे भूखे होगे| ये पुलकित और सोमिल आज स्कूल क्यों नही गये? अभी फीस नही जमा कि है क्या?''
वसुंधरा जी- ''क्या तुम्हे नही पता है हम तो आज सारा दिन से घर पर ही है तो फीस कैसे जमा होगी..अब कल ही जमा हो पायेगी |''
(3)
पुलकित और सोमिल भले ही सगे भाई थे परन्तु किसी भी प्रकार से उनमे समानता नही थी | सोमिल पुलकित से यही कुछ तीन साल बड़ा था और इस समय ग्यारह वर्ष कि आयु का था | जहाँ सोमिल रुखा-रुखा सा रहता था वहीँ पुलकित अत्यंत प्रभावशाली था | बाते तो इस प्रकार से करता था कि सुनने वाले का दिल जीत लेता था| मुख मंडल ऐसी चमक थी मानो किसी देवता कि छत्रछाया उस पर हो| जो भी उसे देख ले तो तो उसे बार बार देखने का जी करता था | जहाँ सोमिल खूब पढाई करने के बाद भी परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नही कर पता था वहीँ पुलकित थोडा सा ही पढ़ कर अच्छे नम्बरो से पास हो जाता था | भले ही पुलकित अभी मात्र आठ वर्ष का ही था, परन्तु उसका बौद्धिक ज्ञान किसी भी प्रकार से सोला वर्ष कि आयु के किशोर से कम न था |
(4)
एक बार दयाल बाबू गौतम जी कि दुकान गये तो उन्होने देखा कि पुलकित भी वहाँ पर बैठा हुआ है तो उन्हे ये बात शोभा न दी उन्होने तुरंत ही गौतम जी से पूछा,''गौतम भाई आगे चल कर अपने बच्चे को दुकान ही सौपना है क्या?''
गौतम जी- ''नही..नही दयाल बाबू, ये कोई अच्छा काम थोड़े न है, बड़ी मेहनत है भैया इसमें, अच्छी सरकारी नौकरी पा जाये हमारे बच्चे बस इतनी ही प्रार्थना है भगवान से |''
दयाल बाबू- ''तो फिर अभी से इस पुलकी को दुकान क्यों लेन लगे |''
गौतम जी- ''क्या बताएं दयाल बाबू, सुबह-सुबह ही ये मुझसे जिद करने लगा हैम भी दुकान चलेंगे, अब तुम ही बताओ दयाल बाबू, बालहट के सामने कौन नही नतमष्तक हुआ है |''
दयाल बाबू पुलकित से- '' इधर आओ पुलकी, ये बताओ आज तुम स्कूल क्यों नही गये |''
पुलकित- ''ओह..हो! दयाल अंकल आज रविवार है, क्या अखिल भैया रविवार को भी स्कूल जाते है |''
दयाल बाबू- ''यह मोड़ा बहुत चंट है गौतम, अच्छा पुलकी एक सवाल का जवाब दो,'यदि पैंच पेंसिल दस रुपए कि है तो दस रुपए कि कितनी पेंसिल मिलेगी' अगर तुमने इसका सही जवाब दिया तो मैं अभी तुमको दो टॉफ़ी खिलाऊंगा |
पुलकित- ''ये तो सरल है, आप गोल-गोल घुमा रहे हो, दस रुपए कि पाँच पेंसिल ही तो मिलेगी |''
दयाल बाबू गौतम जी से- ''पुलकी बहुत कुशाग्र बुद्धि का है| इस पर अच्छे से ध्यान दो ये तुम्हारे कुल और प्रदेश का नाम जरुर रोशन करेंगा |''
गौतम जी- ''पता नही, बुद्धि पलटते देर थोड़े न लगाती है |''
दयाल बाबू- ''चलो भैया दो टॉफ़ी दे दो वरना ये मोड़ा तो दिमाग ही चट डालेगा |''
पुलकी- ''नमस्ते अंकल !''
दयाल बाबू- ''अच्छा! बेटा टॉफ़ी मिल गयी तो नमस्ते, अच्छा गौतम भाई निकला जाए कचहरी के लिए देर हो रही है |''
गौतम जी- ''हाँ..हाँ अवश्य , अच्छा भइया नमस्कार |''
इस प्रकार हँसते खेलते हुए ६ वर्ष व्यतीत हो गये भले ही ६ वर्ष बीत चुके थे परन्तु अब पुलकित के स्वभाव में अब भी वैसी ही नम्रता बरक़रार थी| वो न केवल पढाई में तेज दिमाग था बल्कि खेल में भी उसे महारत हासिल थी क्रिकेट तो ऐसे खेलता था मानो जैसे कोई पेशेवर खिलाडी हो | वो अब विचारो से काफी परिपक्व हो चूका था | वो अन्य बच्चो कि भांति न था उसे कहानी, चुटकलों से अच्छा समाचार पत्र पढना लगता था वो बस यही सोचता कि वो जल्दी से बड़ा हो जाये और अपने जीवन को सामाजिक गतिविधियों में लिप्त कर दे | दया और करुणा उसके ह्रदय में गंगा और यमुना कि तरह निवास करती थी उसकी एक खास आदत थी कि वो धुन का बड़ा पक्का था और एक ऐसा इंसान था जो सदा ही आत्म संतुस्टी कि खोज में रहता था | समाचार पढने के शौक को लेकर तो जैसे उसका पूरा मोहल्ला ही परचित था | पुलकी का विद्यालय प्रातः सात बजे का था इसलिए उसने अच्छे से पता करके एक ऐसा पेपर वाला लगवा रखा था जो उसे तड़के पांच से साढ़े पांच बजे तक पेपर पहुंचा सके जिससे वो समय पर विद्यालय पहुँच सके | और जब कभी भी पेपर वाला न आये तो उसके चेहरे पर बेचैनी साफ़ दिखाई पड़ती थी | और वो घर के भीतर बहार चक्कर लगाया करता था कि शायद कोई दूसरा पेपर वाला दिख जाये जिससे वह उसे छुट्टा पैसे दे कर पेपर ले सके | हमेशा कि तरह उसे उस दिन विद्यालय पहुँचने में देर हो जाया करती थी | लेकिन कक्षा का सबसे मेधावी बच्च होने के कारण उसे किसी भी प्रकार का दंड नही मिलाता था | ऐसा वर्ष में ६ या ७ बार ही होता थ
अब तक पुलकित हाईस्कूल कि परीक्षा में प्रवेश कर चुका था तथा उसकी वार्षिक परीक्षा भी काफी नजदीक थी पूरे परिवार को काफी अपेक्षाए थी, सभी लोग उसकी जरुरतो का खास ध्यान रख रहे थे | माँ वसुंधरा ने खेलने कूदने में पाबन्दी लगा दी थी | सोते, उठते और बैठते पुलकित से एक ही बात कहती,''हाईस्कूल है पुलकि अच्छे से परीक्षा देना तुम्हारे हाईस्कूल परीक्षा का परिणाम ही तुम्हारे आगे के भविष्य को निर्धारित करेंगा |''
वसुंधरा जी पुलकित को सुबह चार बजे ही पढने के लिए बैठाल देती थी | पुलकित शुरू से पढने में काफी तेज़ था और निरंतर ही अच्छा प्रदर्शन करता आ रहा था, परन्तु अभी तक उसने अपनी माँ को स्वयं कि पढाई के प्रति इतना चिंतित नही पाया था | जितना कि वह अब देख रहा था | भाई सोमिल जो रात दिन पढने के बावजूद हाईस्कूल कि परीक्षा में द्वितीय श्रेणी को प्राप्त कर पाया था वो भी पुलकित को सदा हाईस्कूल परीक्षा के महत्त्व को बतलाया करता था | वो स्वयं इस समय इंटरमीडिएट में था परन्तु सारी नज़ारे पुलकित पर ही टिकी थी | घर वालो कि बातो और उनके व्यवहार ने पुलकित के मन में असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर दी थी | उसकी तैयारी युद्ध स्तर पर चल रही थी परन्तु फिर भी उसे ऐसा प्रतीत होता की जैसे उसे कुछ तैयार ही नही है |
''ये दिमाग भी बड़ी संवेदनशील वस्तु है | ये भले की मानव के सम्पूर्ण शरीर पर नियंत्रण रखता है परन्तु हैम अपने विचारो और सोचने के तरीके के बल पर इसे नियंत्रित रख सकते है | हमारे आस-पास का माहौल हमारे मष्तिक पर गहरा प्रभाव डालता है | नकारात्मक विचार हमारे मस्तिक की कार्य क्षमता को घटाते है तथा सकारात्मक विचार उसे ऊर्जावान बनाते है |'
''एक बार एक व्यक्ति की आँख में काली पट्टी को बांध कर उसे चूहे से कटवाया गया परन्तु उसे ये बताया की उसे सांप ने काट लिया है तो इसका परिणाम ये हुआ की कुछ ही देर के उपरांत उस व्यक्ति ने अपने प्राणो को ही त्याग दिया | ये घटना हमारे मष्तिक की संवेदनशीलता को प्रकट करने के लिए काफी है | सच में वह मानव चूहे के कटाने से नही बल्कि ह्रदय गति के रुक जाने के कारण से मारा था | यदि हम नकारात्मक माहौल में रहेंगे, नकारात्मक सोचेंगे तो फिर हम कैसे उम्मीद कर सकते है कि हमारे जीवन में सकारात्मक चीज़ो का प्रवेश हो |''
परीक्षाये समाप्ति कि और अग्रसर थी | ये पूरा परीक्षा सत्र जो अपनी पूर्ति कि ओर बढ़ रहा था वो अब तक के सभी परीक्षा सत्रो से भिन्न था | सूरज भी इस तरह ढलता, इस तरह उगता मनो दिन और रात्रि अपने मिलन को बेहद उतावले हो पुलकित के लिए ये समय जिस तरह गुजर रह था वो एक नया एवं विशिस्ट अनुभव था | रात्रि के तीन बजे उठना और सुबह के 6 बजे तक पढना फिर ७:३० से बोर्ड के एग्जाम और उसके बाद दूसरे पेपर कि तैयारी में एक योद्धा कि तरह जुट जाना | इन सब चीज़ो ने उसे बेहद थका दिया था | परीक्षा कोई युद्ध नही होती है ये तो पुलकित भी मनाता था लेकिन घर पर माहौल तो कुछ ऐसा ही था कि उसे युद्ध न मानो तो शायद न्याय न हो | परन्तु इस तरह कि थकाऊ एवं उबाऊ प्रकार कि रुपरेखा को अपनाकर क्या शिक्षा कि रोचकता को जीवन्त रखा जा सकता था?
युद्ध समाप्त हुआ! परन्तु कितने धराशायी हुए और कितने विजय हुए इसका निर्णय आना अभी बाकी था| हाँ इतना अवश्य था कि मंदिरो, मस्जिदो इत्यादि धार्मिक स्थलो पर युवाओं कि संख्या अब बढ़ने लगी थी | शायद धर्म के इन स्थलो पर अब सावन ने दस्तक दे दी थी | नयी-नयी उम्र के लड़के-लडकियां अव्यवहारिक रूप से इन पवित्र स्थलो कि चौखट पर माथे टेकते और हाथ जोड़े हुए दिख ही जाते थे | और इन युवाओ से कुछ वर्ष ही बड़े युवक-युवतियां जो स्वयं भी कभी ऐसे ही सावन में सक्रिय भागीदारी निभा चुके थे वो अब भला कैसे चुटकी लेने से पीछे छूट सकते थे |
लेकिन पुलकित इन सब से अलग था उसकी आत्मा में अभी ऐसे कार्यो के लिए रज़ामंदी नही दी थी | वो अपना वक्त अपने प्रिय खेलो में व्यतीत कर रहा था और उस ऊर्जा को पाने कि जद्दोजहद में था जो फिर से उसे मानसिक मजबूती प्रदान कर सके परन्तु पुलकित ऐसा भी नही था जो ईश्वर द्वारा प्रदत्त इन चौबीस घंटो को खेल-कूद में ही गवां दे | हाँ भले ही उसकी आत्मा धार्मिक स्थलो पर जाने कि अनुमति न प्रदान कर रही हो और बार-बार निजी स्वार्थ का हवाला देकर उसके कदम पीछे खींच रही हो लेकिन कही न कही पुलकित कि इसी आत्मा ने उसे परमात्मा से जुड़ने का सन्देश भी दे ही दिया था| जिसके प्रभाव से ही उसने गीता, रामायण एवं अन्य प्रकार कि धार्मिक पुस्तको के अध्यन में अपनी रूचि बना ली थी तथा ज्ञान के इस अथाह सागर में वो हर रोज़ डुबकी लगाने के लिए उत्सुक भी रहता था |
दैनिक समाचार पत्र इत्यादि के माध्यम से ज्ञात हुआ कि इंटरमीडिएट का रिजल्ट आगामी पन्द्रह जून एवं हाईस्कूल का रिजल्ट दस जून को घोसित किया जायेगा यानि गौतम जी के दोनों बेटो में प्रथम नंबर सोमिल का था | वे एक-एक दिन जो सीढ़ी के जीने के भाती परीक्षा कि तारीख के नजदीक पहुँच रहे थे वो अपने आप में विशेष बनते जा रहे थे| घर कि दीवारो पर एकान्त रूप रूप से टंगे रहने वाले कलेंडरों को भी सम्मान मिलने लगा था तथा गली मोहल्लो में ये जुमला तो आम ही बनता जा रहा था कि यार 'रिजल्ट कब आ रहा है |'
(5)
आज का दिन पुलकित के लिए बड़ा विशेष था क्यों कि आज के दिन ही उसके बड़े भाई सोमिल का रिजल्ट आने वाला था | सोमिल भले ही हाईस्कूल में द्वितीय श्रेणी से पास हुआ था परन्तु इस बार सब यही आशा कर रहे थे कि सोमिल प्रथम श्रेणी से पास होएगा | जीतनी बेचैनी सोमिल को हो रही थी कुछ उतनी ही पुलकित के मन में भाई के परिणाम को लेकर थी | एक-एक मिनट कटना मुश्किल हो रहा था उत्सुकता भी काफी हावी थी| अब तो प्रार्थनाओ का दौर प्रारम्भ हो गया था | माँ वसुंधरा ने सोमिल का परिणाम आने से पहेले उसे भगवान के समक्ष मत्था टेकने को कहा तथा ग्यारह रुपए और नारियल चढ़ाकर प्रभु से स्वयं और अपने बेटे पर दया दृष्टि बनाये रखने कि विनती की |
परिणाम जानने के सोमिल घर से विद्यालय के लिए निकल लिया | दिल बेचैन था, चेहरे का रंग उदा हुआ था, हाथ काँप रहे थे और जबान निरंतर ही प्रभु का नाम जपे जा रही थी | वो शीघ् ही विद्यालय के बाहर था अब तक दिल की धड़कने तीव्र हो चुकी थे मानो और विलम्ब हुआ तो ये शारीर के बाहर ही आ जायेगा| मन में बेचैनी और परिणाम का दर इस कदर छाया था कि सोमिल ने विद्यालय में प्रवेश से पहेले उसके मुंडेर कि धूल को अपने माथे से लगाया |
परन्तु परिणाम चौकाने वाला रहा| सोमिल इंटरमीडिएट कि परीक्षा को पास नही कर पाया था | दिल कि धड़कने मंद पड़ गयी थी, माथे पर पसीना था, कदम काँप रहे थे और मष्तिस्क पुरे शारीर को ढांढस बंधाते हुए कह रहा था कि,''पढाई ही सब कुछ थोड़े न है इसकी इतर भी तो कोई जिंदगी है वो व्यापार कर के भी तो अपने जीवन को संभाल सकता है | क्या पिताजी कोई इंटर पास है, क्या वो अच्छे से नही जी रहे है?''
सोमिल के परिणाम ने तो जैसे गौतम जी के घर पर पत्थर ही बरसा दिए| घर का माहौल बिल्कुल बदला सा था कोई एक-दूसरे से बात नही कर रहा था | भाई के इस परीक्षा फल ने तो पुलकि के मन में भी संका उत्पन्न कर दी कि 'क्या वो हाईस्कूल पास हो पायेगा?'' जब पुष्पेन्द्र नाथ गौतम जी को ये पता चला कि सोमिल फेल हो गया है तो वो एकदम से सोमिल के ऊपर तिलमिला उठे परन्तु वसुंधरा जी ने उसे ये कह कर शांत कर दिया कि इस समय सोमिल पर गुस्सा करना ठीक नही है, कही ऐसा न हो कि कहीं ऐसा वैसा कदम उठा ले कि जिससे हमें सारे जीवन अपने मुँह कि खानी पड़े | अभी कोई जीवन समाप्त थोड़े न हुआ है, दुबारा पढ़ाएंगे अगर मेहनत करेगा तो जरुर पास हो जायेंगा |
गौतम जी- ''दोबारा पढने कि कोई जरुरत नही है | जहाँ मोहल्ले भर के लड़के पास हुए जा रहे है वहीँ हमारे घर के लड़को कि अक्ल तो जैसे घास चरने गयी है | पास हो कर कुछ नही होने वाला कम से कम प्रथम श्रेणी में पास हो तब तो कुछ भला है वरना यूँ ही सारा जीवन भटकते रहेंगे इससे बढियां तो घर के व्यापर में ध्यान दे कम से कम जीवन तो सही ढंग से चलेंगा |
वसुंधरा जी- ''अगर सोमिल पढना चाहता है तो हम उसे जरुर पढ़ाएगे |''
गौतम जी- ''चाहने न चाहने से कुछ नही होता, पढाई के लक्षण भी तो दिखने चाहिए | अब दयाल बाबू के लड़के को ही देखो प्रथम श्रेणी में पास हुआ है...,ये होते है पढने वाले बच्चे |''
वसुंधरा जी आश्चर्य से- '' अखिल प्रथम श्रेणी में पास हुआ है?''
गौतम जी क्रोध में- ''अभी हम कोई बाते बना रहे थे क्या? अब जाओ यहाँ से आराम करने दो ''
वसुंधरा जी वहाँ से उठ कर चली जाती है और सोमिल पास जाकर बैठ जाती है, वहीँ नजदीक में पुलकित भी बैठा हुआ है | वसुंधरा जी एक समझदार महिला थी वो जानती थी कि इस समय सोमिल पर गुस्सा करना अच्छा नही होगा बल्कि ये समय तो उसके मन के अकेले पैन को भरने का है ये वो समय होता है जब छोटी सी बात भी बड़ी चुभन का एहसास देती है इंद्रियां बस में नही होती है मष्तिस्क व्यर्थ ही विचारो में डूबा रहता है और ऐसे में यदि कोई उसके दिल कि व्यथा को समझने वाला मिल जाये तो उसका ये साथ किसी संजीवनी से कम नही होता | तो इस समय कुछ ऐसा ही एहसास दिलाने कि कोशिश में जुटी थी वसुंधरा जी | उनकी इक्षा थी कि सोमिल दुबारा से इंटर में दाखिला ले ले परन्तु सोमिल ने ये कह कर बात को विराम देना चाहा कि अब वो पढ़ना नही चाहता है | पुत्र के मुँह से निकली ये बात वसुंधरा जी को बलकुल नही जचती है और दिल में जमा गुस्से का गुबार फुट पड़ा| उन्होने सोमिल पर चिल्लाते हुए कहा,''अगर पहले पता होता कि तू पढना नही चाहता है तो तुझे पढ़ाती ही न, पैसे का पैसा डूबा ऊपर से पूरे मोहल्ले में नाक कट गयी सो अलग | उसको देखो प्रथम आया है और एक तुम हो जो पास तक नही हो पाये, हिम्मत तो देखो कह रहा है कि पढना नही है | बड़ा गर्व महसूस हो रहा होगा ये बोलकर |''
सोमिल- '' मुझे आगे नही पढना है, मैं दुबारा इंटर नही करना चाहता हूँ |''
पुलकित पास में ही बैठा ये सब सुन रहा था | उसे इस समय माँ का चिल्लाना अच्छा नही लगा और वो बोल पड़ा कि,''क्यों चिल्ला रही हो माँ, जो होना था वो तो हो गया, अभी ये सब कहना जरुरी है क्या?'' वसुंधरा जी नियंतरण में नही थी और पुलकित कि ये बात सुनकर वो उस पर ही भड़क उठी और चेतावनी भरे शब्दो में बोली कि,'' तू मुझे अक्ल न सिखा, अभी कुछ दिन बाद तुम्हारा भी परीक्षाफल आ रहा है, देखते है तुम कौन सा गुल खिलाते हो |'' और इतना कह कर वो बहार वाले कमरे में जाकर तख़त पर लेट गयी | उन्होने ने महसूस किया कि वो व्यर्थ ही इतना सब बोल गयी बल्कि ऐसी कोई आवश्यकता नही थी |
'वो कभी-कभी इंसान मानसिक रूप से इतना भारीपन महसूस करने लगता है कि यदि एक बार जबान कि लगाम छूट जाये तो फिर उस नियंत्रण करना लगभग असम्भव हो जाता है | तो कुछ ऐसी ही स्थित वसुंधर जी कि भी थी |
सोमिल के बाद अब नम्बर गौतम जी के छोटे बेटे पुलकित के रिजल्ट का था जहाँ सोमिल के रिजल्ट ने सबको निराशा के दरिया में धकेल कर रख दिया था वहीँ सब यही आशा भी कर रहे थे कि पुलकित अवश्य ही अच्छे नम्बरो से पास होएगा| उम्मीदे पूरी भी हुई परन्तु वो छात्र जो हमेशा ही कक्षा का सर्वश्रेस्थ छात्र चुना जाता था उसे आज केवल प्रथम श्रेणी से ही संतुष्ट होना पड़ा था| हाला कि उसका प्रथम आना घर वालो के लिए तो हर्ष का विषय अवश्य था परन्तु ये पुलकित और उसके गुरजनो के लिए तो चौकाने वाला रहा था| वो भले ही ७०% नम्बरो से पास हुआ था| परन्तु पुलकित कि मेहनत को देखते हुए ये काफी कम था उसे उस प्रकार का परीक्षाफल नही मिला था जिसकी वो स्वं से अपेक्षा कर रहा था| बल्कि उससे कोशो दूर रहने वाले छात्र आज उससे अधिक नम्बरो से पास हुए थे| हाँ ये सर्वथा सत्य है कि मेहनत का कोई दूसरा विकल्प नही है, परन्तु केवल कड़ी मेहनत ही सफलता कि गारंटी नही हो सकती| बल्कि मायने ये रखता है कि हमारी मेहनत सही दिशा और योजना में हो रही है या नही| अगर किसी कार्य को करने में आनंद नही आ रहा है तो ये कैसे मान लिया जाये कि उसका फल आपको आनंदित करेंगे| पुलकित के परीक्षाफल ने उसे इस बात का एहसास करा दिया था कि उसने बेवजह ही इस परीक्षा को एक युद्ध कि भाति लिया था अगर उसने इसे अन्य परीक्षा कि तरह ही समझा होता तो शायद आज वो पुन से कक्षा का सर्व्श्रेस्थ छात्र घोसित होता|
पुलकित के प्रथम आने कि खुशी घर के सभी सदस्यों को थी परन्तु गौतम जी कि खुशी तो देखते ही बनती थी| उन्हे अपने छोटे बेटे पर बेहद गर्व हो रहा था और इसी खुशी में उन्होने लगभग पांच किलो लड्डू पुरे मोहल्ले में बटवा दिए थे| लेकिन पिता जी कि इतनी ख़ुशी पुलकित को कही से भी जँच नही रही थी उसे लग रहा था कि पिता जी व्यर्थ में ही इतना खुश हो रहे है| उसे खुद में बड़ा ही दुःख हो रहा था कि हर बार कि तरह ही वो इस बार सर्व्श्रेस्थ छात्र नही बन पाया| वो इस समय एक घायल शेर कि भांति था और अपनी सारी कसर आगे कि पढाई में निकलना चाहता था| उसके भाई सोमिल ने पुन से उसे ये कह कर डराया कि,''देखो पुलकि, तुम भले ही हाईस्कूल प्रथम श्रेणी से पास हो गये हो लेकिन मेरी एक बात जरुर ध्यान रखना कि इंटर और हाईस्कूल में जमीं आसमान का फर्क है, इसको कतई हल्के में न लेने मेरा परिणाम तो तुम देख ही चुके हो| बस इंटर और प्रथम श्रेणी से पास हो जाओ बाँकी आगे तो मज़ा ही मज़ा है|''
अभी १५ दिन ही बीते थे परन्तु पुलकित ने कक्षा ग्यारह कि पढाई को प्रारम्भ कर दिया था| वो नही चाहता था कि आगे कि पढाई किसी दर और नकारात्मक विचारो के साथ हो परिणाम स्वरुप उसने अपने आगे कि पढाई बिना किसी भय और सकारात्मक विचारो के साथ प्रारम्भ कि अब उसमे आत्मविश्वास भी पहेले से बढ़ा था| अब न केवल उसे पढ़ने में आनंद आने लगा था बल्कि उसकी स्मरण शक्ति में भी गजब का इजाफा हुआ था| एकाग्रता बढ़ी थी हर पल को आन्नद के साथ जीने कि चाहत सी उत्पन्न हो गयी थी| मष्तिस्क में बने इस सकारात्मक माहौल का प्रभाव ये हुआ कि कक्षा ११ में उसने पूरे स्कूल में टॉप किया| और विद्यालय कि योजना के अनुसार उसकी इंटरमीडिएट परीक्षा कि पढ़ाई मुफ्त हो गयी | बेटे कि इस सफलता ने घर वालो के दिल में आशा कि एक लौ जला दी थी अब सभी लोग उसका बेहद ध्यान रखने लगे थे घर का कोई भी सदस्य उसे रत्ती भर कार्य भी नही सौपता था | घर वालो का ये व्यवहार पुलकि को बिल्कुल भी नही पसंद नही था उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो वो घर का राजा हो और बाकि सब उसकी प्रजा |
इंटरमीडिएट कि पढाई को पुलकित हाईस्कूल कि तरह बिल्कुल भी ले रहा था | वह हर छण इसी कोशिश में था कि वह अपने दिमाग में किसी भी प्रकार से इंटर का भूत न चढ़ने दे जिससे पढाई कि रोचकता और आकर्षण दोनों बरक़रार रहे | हर विषय को पढ़ने का तरीका उसने कुछ इस प्रकार का बना रखा था कि अब किताबे उसे आनंदित करती थी, शायद ये सब सकारात्मक माहोल का ही प्रभाव था जो परीक्षा तिथि घोषित होने के बाद भी वो बिल्कुल मस्त था | कार्य में निरंतरता पूर्वता ही बरक़रार थी | सब कुछ सामान्य था तथा पुलकित का मानसिक माहोल कुछ इस प्रकार का बन चुका था कि ये परीक्षा अब युध न होकर अब एक आनंद का सफ़र बन चुकी थी जिसका पुलकित पूरी ईमानदारी के साथ स्वागत को बेक़रार था |
देखते ही देखते इंटरमीडिएट कि परीक्षा भी प्रारम्भ हो गयी | वसुंधरा जी कि भगवान पर गहरी आस्था थी वो सब कुछ भूल सकती थी परन्तु किसी भी तरह ये अवश्य ध्यान रखती थी कि पुलकित रोली-तिलक लगाकर पेपर देने अवश्य जाये | पुलकित लगभग १०-१२ सालो से ये सब देख रहा था परन्तु उसने कभी भी अपनी माँ से इस बारे में नही पूछा था लेकिन उसे मन ही मन बुरा भी लगता था कि हम हर कार्य को भगवान को ही क्यों सौप देते है? पुलकित कि भी भगवान पर गहरी आस्था थी परन्तु उसकी नज़र में भगवान कोई जिन्न नही थे जिन्हे केवल जरुरत के समय ही याद किया जाये बल्कि उसका मानना था कि ईश्वर तो एक शक्ति है जो हर सजीव और निर्जीव में निवास करती है बस जरुरत है तो उस शक्ति को पहचाने कि | तिलक लगाने, माला जपने से कुछ नही होता बस जरुरत है तो हर व्यक्ति का अपनी आत्मा को संतुस्ट एवं पवित्र रखना | जब पुलकित ने इस बारे में माँ 'वसुंधरा' से पूछा तो उन्होने ये कह कर बात को विराम दे दिया कि ये तिलक भगवान का आशीर्वाद है जो तुम्हारी रक्षा करेगा | माँ के दिए गये इस जवाब के बाद पुलकित को कोई और सवाल करने कि इच्छा न हुई |
(७)
अब तक इंटरमीडिएट कि परीक्षाये समाप्त हो चुकी थी | उम्मीदानुसार उसके सभी पेपर अच्छे ही बीते थे | घर के सभी सदस्यों को उसके रिजल्ट को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी | इस बात कि बेहद उम्मीद थी कि पुलकित फिर से प्रथम आएगा | अक्सर ही घर पर ये बाते उठती थी कि पुलकि को आगे क्या करवाया जाये | भाई सोमिल तो यही चाहता था कि पुलकि आगे चल कर एक बड़ा इंजिनियर बने जब कि पुलकि कि माँ उसे एक बड़ा सरकारी अफसर बनते हुए देखना चाहती थी | ऐसी ही कुछ इक्षा 'पुस्पेंद्र नाथ गौतम' जी कि भी थी | जब कि इन सब बातो से अनजान पुलकित तो बस एक अच्छा अध्यापक बनना चाहता था | इंटरमीडिएट कि परीक्षा को समाप्त हुए अभी कुछ दिन ही बीते थे कि अब उसे एक और परीक्षा कि तैयारी के लिए जुट जाना था | यह इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश कि परीक्षा थी जिसका फॉर्म पुलकित ने घर वालो कि इच्छा का सम्मान करते हुए डाला था | पुलकित के भाई कि तो ये दिली ख्वाहिस है कि पुलकित इस प्रवेश परीक्षा को किसी भी तरह से पास कर ले परन्तु इस समय पुलकित के रवैये को देख कर सोमिल को कहीं से भी ऐसा प्रतीत होता नही दिख रहा है कि वो इस प्रवेश परीक्षा को लेकर ज्यादा गम्भीर है |
सन्धया का समय, सूरज वृक्षो के पीछे छिपने को बेताब है, पछी रास्ता भटकने के डर से झुण्ड बनाकर घरो को लौट रहे है और पुलकित चटाई में आसमान कि ओर सर करके लेता हुआ उनकी गिनती करने में लगा हुआ है | वो कल्पनाओ के समंदर में डुबकी लगाने वाला ही होता है कि उसका भाई सोमिल आ जाता है | सोमिल पुलकित से- ''ऊपर क्या कर रहे हो?''
पुलकित- '' कुछ नही, बस यूँ ही लेते थे |''
सोमिल कुछ कहता कि उससे पहले ही पुलकित सोमिल से- ''भैया ये शाम का वक्त भी कितना अजीब सा होता है न मन करता है कि बस आसमान कि ओर ही देखते रहे | भगवन ने इन पंक्षियों को उड़ने के लिए खुला आस्मां तो दिया है लेकिन कहीं न सन्धया को भी बनाया है जो उनको इशारो ही इशारो में ये सूचित करती है कि तुम्हारा परम मित्र रवि अब थक चूका है और वो अपनी आँखों को बंद करने के लिए बेताब है और मानो घरो से सूरज कि किरणो का जाता हुआ प्रकाश उनको अपने-अपने घरो को लौट जाने का सन्देश....
पुलकित अपने बात को पूरी करता कि उससे पहले ही सोमिल उसकी वाणी को विराम देता हुआ बोलता है- ''यह समय कल्पनाओं के समंदर में गोते लगाने का नही तुम्हे पता है कि कुछ दिन बाद में ही तुम्हारी इंजीनियरिंग कि प्रवेश परीक्षा लगी हुई है | लेकिन मुझे कहीं से भी ऐसा प्रतीत नही हो रहा है कि तुम इसके लिए थोडा सा भी गम्भीर हो | कुछ दिन कि ही तो बात है अच्छे से पढाई कर कहीं अगर ये परीक्षा अच्छी रैंक से पास हो गये तो तुम्हे इस बात का अंदाज़ा भी नही है कि आगे का सफ़र कितना आसान हो जायेगा |''
...भाई के मुख से ये बात सुन कर पुलकि कि स्थिति उस कवि के समान थी कि जिसने अचानक ही किसी सुन्दर पंक्ति कि रचना कर दी हो परन्तु उसके पास उसे नोट करने के लिए कोई कलम न हो |
पुलकित भाई कि इस सलाह के जवाब में चुप रहना ही बेहतर समझता है |
सोमिल- ''क्या सोच रहे हो? क्या तुम्हे पेपर देने का मन नही है?''
पुलकित- ''मन तो है, लेकिन...''
सोमिल- ''लेकिन क्या..?''
पुलकित- ''नही कुछ नही |''
सोमिल- ''ऐसे-कैसे कुछ नही |''
पुलकित झल्लाते हुए- ''अरे! पेपर ही तो देना है, बोल तो रहे है पेपर देंगे, और कैसे कहे |''
सोमिल- ''अच्छा.., बहुत घमंड आ गया है न तुम्हे | अरे! जब रावण का घमंड न चला तो तुम क्या चीज़ हो |''
पुलकित- ''..अब पता नही इसमे घमंड कि बात कहाँ से आ गयी |''
सोमिल- ''...कहाँ से आ गयी...वो हम देख रहे है कि जब से तुम हाईस्कूल में प्रथम आ गये हो तब से तुम्हारे दिमाग ज्यादा ही ख़राब है |''
पुलकित अपने सर को दायीं ओर घुमाते हुए- ''ठीक है.."
उनका वार्तालाप खिचता ही जा रहा था और पुलकित हर बार यूँही जवाब दिए जा रहा था मानो उसको इस बात का पता हो जैसे वो स्वयं में कुछ गलत नही कर रहा हो | वो इंजिनियर नही बनना चाहता था लेकिन अभी तक उसने अपने इस फैसले को किसी के सामने जाहिर नही किया था | वहीं सोमिल अपने शब्दो को विराम नही दे रहा था अतः पुलकित ने वहाँ से उठ कर जाना ही बेहतर समझा और छत से निचे उतर कर बहार वाले कमरे में जाकर तख़्त पर लेट गया |
पल्कित का ये व्यवहार सोमिल को अपने चहरे पर किसी तमाचे से कम नही लगा और वो भी झल्लाता हुआ सीधे माँ वसुंधरा के पास पहुँच गया और लगभग चिल्लाते हुए बोला,''आज-कल इस पुलकि के दिमाग कितने ख़राब हो गये है, सीधे मुँह तो बात ही नही करता है, चार दिन बाद पेपर है लेकिन महाशय सारा समय आराम ही करते है |''
माँ वसुंधरा गुस्से से,''ये है कहाँ?''
सोमिल- ''देखो यही-कहीं आराम फरमा रहा होगा |''
वसुंधरा जी आँगन से बहार वाले कमरे कि ओर बढ़ती है तो वो पाती है कि पुलकित बहार वाले कमरे में तखत पर आराम से लेता हुआ है |
वसुंधरा जी पुलकित से- '' क्यों तुम्हे चिंता नही है जरा सी भी, अभी चार दिन बाद पेपर लगा हुआ है और तुम यहाँ पर आराम से लेते हुए हो?''
पुलकित उठ कर तो बैठ जाता है परन्तु माँ कि इस बात का कोई जवाब नही देता है | पुलकित के चहरे का रंग वसुंधरा जी को ये सूचित करने के लिए काफी था कि मानो पुलकित कुछ छुपा रहा हो | वसुंधरा जी वहीँ पुलकि के बगल में बैठ जाती है और पुलिकी के सर में हाथ फेरते हुए कहती है कि,''क्या..? बात क्या है आखिर, क्यों पढाई नही कर रहे हो ?'' स्नेह पूर्वक पूछे गये इस सवाल के जवाब में पुलकित अपने दिल कि बात को छुपा नही पता है और अपनी माँ से कह ही देता है कि वो इंजिनियर बनना नही चाहता है | लेकिन क्यों के सवाल में वो अपनी नजरो को नीचे कर के खामोश ही रहता है | वसुंधरा जी कुछ देर तो शांत रहती है लेकिन पुनः से,'' मेरी बात का जवाब तो दो पुलकि, आखिर क्या कारण है जो तुम इंजिनियर नही बनना नही चाहते हो?''
पुलकि- ''माँ मुझे इंजीनियरिंग में लगाव नही है | मैं शुरुआत से ही एक अध्यापक बनना चाहता हूँ |''
वसुंधरा जी दबी हुई आवाज में- ''यानि, तुमने सोच ही लिया है कि तू अपने माँ और बापू को ६-७ साल यूँ ही और रगड़ने देगा, तुम्हे पता है तुम्हारे पिताजी जब सोलह साल के थे तब से कमा रहे है | उनका शरीर अब थक आया है अब वो भी आराम करना चाहते है | अब व्यापार में इतनी कमाई नही बची है लेकिन लगता है हमारी किस्मत में तो सब बंजर ही है |
पुलकित- ''लेकिन, माँ तुम भी तो मुझे सरकारी नौकरी करते हुए देखना चाहती थी..!''
वसुंधरा जी- '' अभी भी चाहती हूँ लेकिन हर व्यक्ति को अपने जीवन में थोडा बहुत टेक्निकल तो होना ही चाहियें | अब कोई पक्का थोडा न है कि तुम एक सरकारी नौकर बन ही जाओ, ये तो किस्मत कि बात है अब मान लो तुम्हारी किस्मत ने साथ न दिया तो फिर क्या करोगे...केवल हाथ मलते ही रह जाओगे | और उस वक़्त यही सोचोगे कि काश मेरे पास इंजीनियरिंग कि डिग्री होती तो मैं यूँ ही बेकार न घूम रहा होता | बेटा, मैंने तुमसे ज्यादा जिंदगी देखी है इसलिए ही तो तुम्हे सलाह दे रही हूँ कि इस मौके को हाथ से न जाने दो |
पुलकित- ''लेकिन, माँ अगर एक बार मैंने इस क्षेत्र में कदम रख दिया तो सरकारी नौकरी का ख्वाब तो ख्वाब ही रह जायेगा |
वसुंधरा जी- ''तुम्हे कुछ मालूम भी है...पता है दयाल बाबू का लड़का सरकारी नौकर बन गया है | अभी दो साल भी नही हुए थे उसे इंजीनियरिंग करते हुए लेकिन हुनर तो देखो उसका अच्छा ख़ासा बैंक में नौकरी लग गयी |''
पुलकित माँ के इस उदाहरण के समक्ष निशब्द था |
वसुंधरा जी- ''क्या सोच रहे हो? तुम क्या उससे कोई कम हो...बोलो आज से अच्छे से तैयारी करोगे न...बोलो?''
पुलकित साँसों को अंदर खीचते हुए बड़े विश्वास के साथ कहता है,''हाँ..बिलकुल, जरुर..!''
यह शब्द पुलकित ने इस तरह बोले मानो उसे प्रकति से कोई ऊर्जा मिल गयी हो जिसने उसकी मस्तिस्क कि प्रवृति को बदल कर रख दिया हो और अचानक से उसका रुझान इंजीनियरिंग कि और बढ़ा दिया हो |
आज पुलकित कि इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का पेपर है | पुलकित खुद को काफी दबाव में महसूस कर रहा है और हो भी क्यों न आखिर कार उसने अपनी माँ से इंजीनियरिंग बनने का वादा जो किया है | संभवता इतना दबाव उसे इंटरमीडिएट कि परीक्षा को देते हुए ना रहा होगा | परन्तु इतने अधिक दबाव के बावजूद वो अपने दिमाग में नकारात्मक विचारो को हावी होने नही दे रहा है शायद ईश्वर भी आज उसके साथ में था तभी तो प्रश्नपत्र उसकी उम्मीद से काफी सरल आया, अतः उसे इसको हल करने में कोई विशेष परेशानी ना हुई | परीक्षा केंद्र से निकलते समय ही उसको यकीं हो गया था कि वो अवश्य ही एक अच्छी रैंक के साथ पास होगा | रास्ते में जाम आदि में फसे रहने के कारण पुलकित घर पहुचने में काफी देर हो गयी और जब उसने घर कि दहलीज़ के पार कदम रखा तो उसने देखा कि घर का दृश्य ऐसा था मानो कोई भूखा शेर अपने शिकार के इंतज़ार में बैठा हो | पुलकित परीक्षा को देकर रात आठ बजे घर पर पहुँच था अतः इस समय उसके पिता का उपस्थित होना भी लाज़मी ही था | पुलकित ने जैसे ही कक्ष में प्रवेश किया तो सबके मुँह से एक साथ यही निकल पड़ा कि 'पुलकित पेपर कैसा हुआ' परन्तु किसी ने देर से आने का कारण जानना जरुरी ना समझा, अंततः गौतम जी पुलकित से पूछ ही बैठे कि इंतनी देर कैसे हो गयी |'' पुलकित भी जवाब देते हुए बोला,''पिताजी..,वो रास्ते में जाम लग गया था इस लिए आने में देर हो गयी |''
गौतम जी- ''ठीक है, अच्छा अब जाओ और हाथ पैर धोलो और कहना खा लो जाकर | और हाँ, अब जल्दी सो जाया करो यही कुछ समय ही बचा है आराम करने का और फिर आगे कि पढाई प्रारम्भ हो जायेगी |''
पुलकित दबे स्वर में- ''ठीक है..!''
थका हुआ पुलकित जल्दी से खाना खता है और वहीँ तखत पर बिस्तर को लगा कर सो जाता है |
दैनिक समाचार पत्र कि एक हैडिंग ने सिथिल पड़ चुके माहोल में बिजली से एक तेजी ला दी | आखिर ऐसा हो भी क्यों न जब पुलकित कि इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के परिणाम कि तिथि घोसित हो गयी हो शायद ही ऐसा कोई दिन बीत रहा हो जब भाई सोमिल, पुलकित से ये न पूछे कि 'पास तो हो जाओगे न...तुम्हे क्या लगता है?'' और पुलकित भी रोज़ कि तरह नजरे चुराता हुआ निरुत्तर ही रहता है |
रिजल्ट के दिन के चार-पाँच दिन पहले का समय वो समय होता है जब न चाहते हुए भी नकारात्मक प्रकार के विचार हिचकोले लेने लगते है, 'अगर न....?' जैसे प्रश्न बेवजह ही मस्तिष्क कि परिक्रमा करते रहते है | परन्तु ये मानव कि प्रकति है, ऐसे समय में बड़ा से बड़ा आत्मविश्वाशी अनंत लोक में विराजमान उस अदभुत शक्ति से खुद के भाग्य पर दया दृष्टि बनाये रखने कि विनती करता है, जिससे आज पुलकि भी अछूता नही है |
(7)
आज पुलकि के इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का परिणाम आने वाला है | अन्य दिनों कि अपेक्षा वसुंधरा जी ने आज प्रातः सात बजे तक ही दैनिक कार्यो को निपटाकर रसोईघर में प्रवेश कर लिया है | उनका दिल बारम्बार प्रभु से विनती करने में लगा हुआ है कि बस 'पुलकि किसी तरह अच्छी रैंक से पास हो जाये ताकि उसे बढियां कॉलेज मिल सके |' परन्तु वहीँ पर पुलकित निश्चिंत होकर अपने बिस्तर पर सो रहा है जब कि कल ही सोमिल ने उसे इस बात कि सूचना दे दी थी | हाँ भले ही पुलकित अब इंजीनियरिंग करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गया था परन्तु अभी भी उसके दिल ने दिमाग के द्वारा लिए गये इस फैसले को स्वीकारा नही था | शायद यही कारण था कि पुलकित आज रिजल्ट के दिन भी आराम से सो रहा था | जब कि ऐसा कम ही होता है कि अपने रिजल्ट के दिन कोई विद्यार्थी प्रातः जल्दी न उठा हो | वसुंधरा जी आवाज लगाती है.''पुलकि...पुलकि...पुलकि |''
कुछ देर बाद पुलकित- ''हाँ..क्या है?''
इतने में ही सोमिल रसोई घर में आ जाता है |
वसुंधरा जी पुलकित से- ''आठ बजने वाले है, सोते ही रहोगे क्या? अरे, आज तो जल्दी उठो तुम्हारा रिजल्ट आ रहा है तुम्हे चिंता नही है क्या?''
पुलकित नींद से जगता हुआ- ''रिजल्ट...|''
पुलकित के इस प्रकार के शब्दो को सुनकर भाई सोमिल माँ वसुंधरा से- ''देखो...देखो ऐसे बोल रहा है मनो इसको होश ही न हो कि इसका आज रिजल्ट निकल रहा है |''
वसुंधरा जी तेज आवाज में पुलकित से- ''अभी तुम्हारी आँखे नही खुली है क्या?''
पुलकित- उफ़ हो ...!''
इतना कह कर पुलकि बिस्त्तर से उठ जाता है और बहार वाले कमरे में जाकर समाचार पत्र को पढने लगता है |
वसुंधरा जी सोमिल से- ''रिजल्ट कितने बजे तक आ जायेगा |''
सोमिल- ''आ जायेगा, क्यों परेशान हो |''
वसुंधरा जी बिगड़ते हुए- ''अरे, क्यों न परेशान होऊं पैसा लगता है पढाई में..|''
सोमिल- ''पता नही कहाँ कि बात कहाँ ले जा रही हो, हमने तो ये नही बोला कि पैसा नही लगता है...., दोपहर १२ बजे तक रिजल्ट आ जाएगा |
कुछ देर तक दोनों शांत रहते है कि तभी वसुंधरा जी सोमिल से कहती है कि,''लगता ही ये पुलकि अभी तक उठा नही है, जरा बगल वाले कमरे में झांक कर तो देखो |''
सोमिल कमरे में झांकते हुए- ''अरे, यहाँ पर नही है, बहार वाले कमरे में होंगे महाशय, अभी उठे है पेपर पढ़ेंगे, फिर कहीं आगे कुछ काम होगा, रिजल्ट कि चिंता ही कहाँ है इन्हे, इन्हे तो बस दुनियादारी कि फिकर है |
वसुंधरा जी- ''जाओ देखो तो जाकर ये पेपर पढ़ रहा है या सो ही गया है |''
सोमिल- ''सो रहा हो तो सो रहा हो, अब कोई जगाता थोड़े न फिरेगा इनको |''
कुछ समय बाद वसुंधरा जी सोमिल से- ''क्यों सोमिल अगर पुलकि अच्छी रैंक से पास हो गया तो फिर आगे क्या-क्या होगा ?''
सोमिल- ''अरे, जितनी अच्छी रैंक आएगी उतना अच्छा कॉलेज मिलेगा और अगर ख़राब रैंक आयी तो फिर क्या फायदा आज कल अच्छे कॉलेज कि ही बकत है वरना..|''
वसुंधरा जी- ''ये तो पता है, पर पढाई किस चीज़ कि है इसमे ?''
सोमिल- ''पढना क्या है..? ये तो लड़के कि इक्षा पर ही निर्भर करता है., कोई मकैनिकल पाठ्यक्रम चुनता है तो कोई कुछ और, वैसे अगर पुलकि को टेक्सटाइल मिल जाये तो बढियां ही है शहर में ही अच्छी खासी नौकरी मिल जाएँगी |''
वसुंधरा जी दबी हुई आवाज में - ''अब देखो क्या होता है ?''
कुछ ही देर में पुलकि भी रसोईघर में आ जाता है |
वसुंधरा जी- ''अब दिन हुआ है तुम्हारा |''
पुलकित कुछ देर शांत रहने के बाद- ''अच्छा, क्या बनाया है ?''
वसुंधरा जी- ''कुछ नही |''
पुलकित नाराज होकर रसोईघर से निकल जाता है और बहार वाले कमरे में जाकर बैठ जाता है |
थोड़ी देर बाद...
वसुंधरा जी- ''पुलकि...पुलकि...|''
पुलकि कुछ देर तो अनसुना करता है परन्तु फिर तेज आवाज में कहता है,''अब क्यों चिल्ला रही हो |''
वसुंधरा जी- ''चुपचाप से यहाँ पर आ जाओ |''
पुलकित कोई भी जवाब नही देता है...!
वसुंधरा जी- ''सुनाई नही दे रहा है, हमने क्या कहा तुमसे |''
पुलकि तेज आवाज में- ''नही पड़ रहा है..!''
वसुंधरा जी- ''पुलकि, हमें बार-बार न चिल्लाना पड़े, जल्दी से आ जाओ |''
पुलकि कुछ देर तो शांत बैठा रहता है लेकिन फिर रसोई जाने में ही भलाई समझता है और रसोई से नाश्ते कि प्लेट को लेकर आ जाता है | नाश्ता करने के बाद पुलकित पुनः से समाचार पत्र को पढ़ने लग जाता है | अब उसके मन में भी रिजल्ट को लेकर उत्सुकता जागने लगती है | एक छण जब वो घडी में देखता है तो उसे पता चलता है कि साढ़े दस बज चुके है | उन ही विचारो के साये में उछल-कूद करते-करते कब घडी में बारह बज जाते है पता ही नही चलता है | थोड़ी देर में ही वसुंधरा जी भी कमरे में आ जाती है और पुलकि के सर में हाथ रखकर कहती है,''पुलकि बारह बज गये है...!''
पुलकि- ''हाँ..हाँ पता है कोई सो थोड़े न रहे थे |''
वसुंधरा जी- ''अब जाओ देखो जाकर, पास हुए कि नही |''
पुलकि तखत से उठता है और रिजल्ट देखने जाने के लिए घर के मुख्य द्वार कि ओर बढ़ता है तो वो देखता है कि भाई सोमिल घर के मुख्य द्वार से भीतर कि ओर प्रवेश कर रहा है | सोमिल पुलकि से,''कहाँ जा रहे हो..?''
पुल्कित- ''रिजल्ट देखने जा रहे है !''
सोमिल दबी हुई आवाज में- ''रिजल्ट हम देख आयें है |''
पुलकि उत्तेजित भाव से- ''क्या हुआ ?''
सोमिल- ''माँ के पास चलो फिर बताएं !''
अब पुल्कित के ह्रदय में धक् सी मचती है, चेहरा मानो पीला सा पड़ गया हो, होंठ एकदम सूख गये हो, हाथ काँप रहे हो | ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्यों कि सोमिल के चेहरे कि मौन भाषा पुलकित को कुछ अनिष्ट घटित होने कि सूचना दे रहे थी | ह्रदय में बस यही बात चल रहे थी कि माँ क्या हाल होगा ? और जवान बस यही बड़बड़ाये जा रही थी,'बताओ तो भैया, क्या हुआ..? पास है कि नही !''
लेकिन सोमिल भी ये कह कर उसका इंतजार बढ़ा रहा था कि,''माँ के पास तो चलो अभी सब कुछ पता चल जायेगा |''
रसोई घर के बगल वाले कमरे में माँ वसुंधरा ख्यालो के वायुयान में बैठ कर सैर कर रही होती है कि तभी सोमिल और पुलकि कमरे में प्रवेश कर जाती है |
सोमिल माँ वसुंधरा से- ''माँ मिठाई का भोग-वोग लगाओ पुलकि ने अच्छी रैंक से परीक्षा पास कर ली है..|''
पुलकि ने जब इतना सुना तो तब जाकर उसे गहरा सुकून मिला | इस समय उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसने सारा जग जीत लिया हो |
आज घर के सभी सदस्यों के चेहरो पर मीठी-मीठी मुस्कान थी | मनो घर पर वसंत ऋतु का आगमन हो गया हो कोई भी इस सुखद चन को गवाना नही चाहता था | माँ वसुंधरा जी ने भी तरह-तरह के पकवान को बनाकर अपनी खुसी को जाहिर किया | घर का खुशनमा माहोल कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पुलकित स्वयं में गर्व किये बिना नही रह सका उसे इस बात कि बेहद खुशी थी कि कम से कम वो अपने रिजल्ट के माध्यम से अपने परिवार के चेहरे पर मुस्कान ला सका | अब तो पुरे परिवार कि नजर पुलकित के इंटरमीडिएट के रिजल्ट पर टिकी थी | इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा को तो वो फतह कर ही चुका था और अब बारी इंटरमीडिएट कि थी | अब विश्वास, यकीं में बदलता जा रहा था और घर के सभी सदस्यों को पूरा भरोसा था कि पुलकित जरुर ही इंटरमीडिएट कि परीक्षा में प्रथम आएगा |
(9)
आज तो सोने पर सुहागा हो गया पुलकित ने न केवल अपने विद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्त किये थे बल्कि पुरे प्रदेश में भी सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी भी वही था | कमाल कि बात तो ये थी कि उसने गणित, रसायन, भौतिक तीनो में ही शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे | आज तो चारो ओर बस पुलकित के नाम का ही डंका बज रहा था | पुलकित कि आँखे तब ख़ुशी के मरे सजल हो उठी जब संध्या के समय भाई सोमिल ने पीठ को थपथपाते हुए न केवल उसकी प्रसंशा कि बल्कि उपहार स्वरुप उसे एक हाथ घड़ी भी भेंट की |
अब तक परीक्षाओं के रिजल्ट का दौर बीत चुका था और पढाई का नया सत्र प्रारम्भ होने वाला था | तथा अब तक पुलकित की काउंसिलिंग प्रक्रिया भी समाप्त हो चुकी थी | और उम्मीदानुसार उसे अपने शहर में ही बढियां कॉलेज मिल गया | घर वालो के इच्छा के अनुरूप उसने टेक्सटाइल पाठ्यक्रम को चुना था |
और आखिर में अब वो दिन भी आ ही गया जब पुलकित को प्रथम बार कॉलेज को जाना था | कॉलेज की ऊँची-ऊँची इमारते रंगीन रंगो से रंगी हुई थी पूरा कॉलेज काफी बड़े क्षेत्रफल में फैला हुआ था, कॉलेज की विशालता पुलकित की आँखों को चकाचौंध कर रही थी | सम्भवतः उसने इतना बड़ा कॉलेज परिसर पहले कभी नही देखा था | कॉलेज परिसर में चारो ओर रंग-बिरंगे परिधानो में सजे विद्यार्थी इधर-उधर टहल रहे थे | जब पुलकित कॉलेज के लिए घर से निकला था तभी भाई सोमिल ने उससे कहाँ था की कॉलेज में बेकार मत टहलना और सीधे अपने विभाग में जाना | ठीक उन्ही बातो को ध्यान में रखकर पुलकित 'टेक्सटाइल' विभाग को ढूंड रहा था | लेकिन कहीं भी उसे अपना टेक्सटाइल विभाग नही दिख रहा था | उसने इस बारे में किसी अन्य विद्यार्थी से पूँछ लेना ही बेहतर समझा | फलस्वरूप पुलकित ने पास में ही खड़े एक विद्यार्थी से पूंछा,''हैलो, क्या आप मुझे ये बता सकते है की यहाँ पर टेक्सटाइल विभाग कहाँ पर पड़ेगा ?''
विद्यार्थी- ''नही, मुझे नही पता मेरा तो आज पहला दिन है !''
पुलकित- ''अच्छा, वैसे आपका विभाग कौन सा है |''
विद्यार्थी- ''मकैनिकल.., वही तो मैं भी ढूंढ रहा हूँ !''
पुलकित- ''मकैनिकल..अरे! मैंने अभी तो देखा था |''
अब उन दोनों ने साथ होना ही बेहतर समझा और अपनी-अपनी ब्रांच ढूंढने के लिए साथ हो लिए | आपसे बातचीत के माध्यम से पता चला कि लड़के का नाम 'प्रमोद कुमार' है जो कि पड़ोस के ही एक जिले का रहने वाला है | अब तक ये दोनों बातचीत करते-करते प्रधानाचार्य के ऑफिस के नजदीक पहुँच गये | जहाँ कुछ दुरी पर ही लगे नल को देखकर पुलकित के मन में पानी पीने कि इच्छा जाग्रत हुई तो उसने प्रमोद से भी पानी पीने के लिए आग्रह किया | जब पुलकित पानी पी रहा था तो तभी पीछे से आवाज आयी- 'ऐ हीरो!' जब पुलकित ने पीछे मुड़ कर देखा तो कुछ आठ से दस लड़के रंग-बिरंगे परिधान में सजे हुए खड़े हुए थे, उनके लम्बे उलझे हुए बाल किसी टीवी आर्टिस्ट से कम नही लग रहे थे मानो वो सब किसी पौराणिक प्रस्ठभूमि पर आधारित धारावाहिक में नकारात्मक किरदार का अभिनय कर रहे हो कि तभी उनमे से एक लड़के ने बोला- ''यहाँ क्या कर रहा है ?'' तो झट से ही प्रमोद बोला,''सर, वो..हम पानी पीने आये थे |''
लड़का- ''ये पानी पीने का समय है, कौन सी ब्रांच में पढता है ?''
प्रमोद- ''सर, आज मेरा पहला दिन है !''
लड़का- ''तो क्या तुझे अपनी ब्रांच भी नही पता है |''
प्रमोद- ''नही..नही पता है, मकैनिकल ब्रांच है |''
पुलकित शांत सा खड़ा ये सब दृश्य देख रहा था कि तभी पुलकित ने गौर किया कि उनमे से एक लड़का उसे काफी देर से घूरे जा रहा था | इसी बीच उन लड़को ने तरह-तरह के फरमान जरी करके प्रमोद को वहाँ से डांट कर भगा दिया | वो लड़का जो पुलकित को काफी देर से घूरे जा रहा था उसने पुलकित से कहाँ,''ऐ हीरो, तू इधर तो पहले |'' जब पुलकित कुछ कदम बढाकर उसके पास पहुंचा तो वो लड़का पुलकत से बोला- ''क्यों, तुझे इतना भी पता है क्या कि अपने सीनियर के सामने कैसे खड़ा हुआ जाता है, चल नजरे नीचे झुकाकर बात कर |'' तो पुलकित ने भी इन झंझटो से बचने के लिए अपनी नजरो को नीचे झुका लिया | लेकिन वो सब तो जैसे गाली-गलौज पर ही उतारू थे | स्वयं के बालो को तो वो शैतानो कि भाती बढ़ाये हुए थे परन्तु पुलकित के दो-ढाई इंच के बाल भी उन्हें बड़े प्रतीत हो रहे थे | उनकी अभद्र भाषा और अभिवृति किसी भी अपरचित को ये सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी थी कि मानो ये विद्यार्थी नही बल्कि जंगली जानवरो का कोई टोला हो | एक छड़ तो पुलकित के मन में भी विरोध का भाव जाग्रत हुआ परन्तु फिर पुलकित ने शांति भाव से खड़े रहने को ही उचित समझा और सब कुछ मूक-बाधिर कि भाती सहता गया | काफी देर तक उन छात्रो ने पुलकित को परेशान किया और अंत में पुलकित के सामने भी कई तरह के फरमानो को जारी करके उसे डांटकर भगा दिया |
इस घटना ने पुलकित को मानसिक रूप से काफी चोट पहुंचाई और वो तुरंत ही घर को लौट आया | पुलकित ने इस घटना को भूलने कि तो बहुत कोशिश कि परन्तु कहीं न कहीं ये घटना उसके दिलो दिमाग में घर कर गयी थी | अब, वो जानना चाहता था कि आखिर किस कारणवश उन छात्रो ने उसके साथ ऐसा बर्ताव किया था | पुलकित ने ये पूरी घटना अपने मित्र शुभम को बताई जो उसके मोहल्ले में ही रहता था और उससे तीन वर्ष बड़ा था परन्तु शुभम ने इसे कोई गम्भीर मामला नही समझा बल्कि ये बोलकर पुलकित के मन कि व्यथा को दूर करने कि कोशिश कि 'बड़े-बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में ये सब तो आम बातें है तथा सीनियर तो अक्सर ही जूनियर कि रैंगिंग किया करते है |' लेकिन शुभम का ये जवाब पुलकित को संतुष्ट करने के लिए नाकाफी था उसने समाचार पत्रो में रैंगिंग के दुस्प्रभावो को पढ़ रखा था | उसे पता था कि इस रैंगिंग रूपी ड्रैगन ने जेन कितने विद्यार्थियों के जीवन को निगला है लेकिन तब वो उन विद्यार्थियों को कमजोर समझता था परन्तु जब आज वो स्वयं इस घटना से रुबरूं हुआ तो तब जाकर उसे इसकी गम्भीरता का एहसास हुआ | अब उसे पता चल गया था कि किसी के स्वाभिमान पर पहुँचने वाली चोट कितनी भरी होती है | परन्तु पुलकित शांत रहने वाले लोगो में नही था | इस प्रयोजन में जब पुलकित ने अन्य लोगो से पूछा तो उसे ये बात समझ में ना आयी कि सीनियर विद्यार्थी इस कारण से रैंगिंग करते है क्यों कि पूर्व में उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ होता है |
पुलकित को स्वयं में आत्मविश्वास और ऊर्जा कि कमी नजर आ रही थी इसलिए उसने दस दिन घर पर ही रहने का ही निर्णय किया | इन्ही दस दिनों के मध्य जब एक दिन पुलकित समाचार पत्र पढ़ रहा था तो उसकी नजर एक कॉलम पर गयी, जिसमे लिखा था 'रैंगिंग रुकने का नाम नही ले रही है ...!'' जब पुलकित ने पुरे कॉलम को पढ़ा तो उसे पता चला कि ये घटना तो उसके ही कॉलेज कि थी जिसमे कुछ सीनियर छात्रो ने अपने जूनियर साथी कि इस बात पर पिटाई कर दी क्यों कि उसने उन सबके पैर चुने से इंकार कर दिया, जिसके बाद से ही उसकी हालत गम्भीर है और वो हॉस्पिटल में भर्ती है |
जब पुलकित दस दिन के बाद कॉलेज पहुँचता है तो वो पता है कि रैंगिंग कि उस घटना के कारण कॉलेज पहले से सख़त हो चूका था जिसके कारण से सीनियर छात्रो के व्यव्हार में थोडा बहुत ढीलापन अवश्य आया था परन्तु अभी भी उनकी निरंकुशता पूर्णतया समाप्त नही हुई थी |
(10)
पुलकित को कॉलेज गये हुए एक माह से अधिक का समय बीत चुक था और इतने समय अंतराल में वो रैंगिंग रूपी परदे के पीछे कि कहानी को वो कुछ हद तक अवश्य समझ गया था | पुलकित ने रैंगिंग के लिए सबसे ज्यादा दोषी कॉलेज कि शिक्षा व्यवस्था को ही ठैराया | कहीं न कहीं उसे लगा कि कॉलेज प्रशासन ने अपने शिक्षा व्यवस्था के ढांचे को इतना कमजोर कर लिया है कि जिससे जूनियर विद्यार्थियो के मन में हमेशा यही डर सताता रहता है कि अगर उन्होने सीनियरो के व्यव्हार के खिलाफ जरा सी भी आवाज उठाई तो वे उनके द्वारा मिलाने वाली पाठ्यसामग्री से वंचित हो जायेगे और अगर कहीं ऐसा हो गया तो फिर उनका पास होना तो लगभग असम्भव ही हो जायेगा |
अपने दूसरे कारण में पुलकित ने समाज के ऊपर ऊँगली उठाते हुए कहाँ कि, ''आज के इस आधुनिक युग में हर इंसान अपना 'वर्चस्व' स्थापित करना चाहता है | मानो ये मानव इस कर्मभूमि में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाहन करने कि बजाये 'वर्चस्व कि जंग' में भाग लेने आया हो, तथा स्वयं का वर्चस्व स्थापित करने के लिए दरंदगी कि किसी भी हद तक जाने को तैयार हो | झूठी प्रसंशा और सम्मान को तो जैसे आज सभी अपने गले का हार बनाना चाहते है और कुछ ऐसे ही सोच का परिणाम है हमर 'कॉलेजलोक' में फैली रैंगिंग रूपी गंदगी |
विद्वानो ने कहाँ है कि हमारे का पढ़ने का तरीका कुछ ऐसा होना चाहियें कि जिससे पढाई मनोरंजक लगे | लेकिन आज का सीखने कि बजाये खीचने में विश्वास रखता है यहाँ खीचने से मतलब 'डिग्रियों' से है | आज के समय तो मजे लेकर पढ़ने वालो कि संख्या बहुत कम रह गयी है और इसी कारण सीनियर छात्र मजे लुटाने के लिए जूनियर विद्यार्थियों को अपना निसाना बनाते है, तथा अपने भेड़ियां समूह का सरदार बनने के लिए सदैव आतुर रहते है |
कॉलेज जाते चार महीने से अधिक का समय गुजर चूका था और पुलकित के प्रथम समेस्टर कि परीक्षा भी नजदीक थी परन्तु पुलकित को अभी भी भाषा संबंधी दिक्कतो का सामना करना पड़ रहा था पुलकित ने बारविह तक कि पढाई हिंदी माध्यम स्कूल से कि थी | और एकदम से सम्पूर्ण कोर्स इंग्लिश में पाकर उसे दिक्कत होना तो स्वाभाविक ही था | वो अब समझने कि बजाये रटने के सिद्धांत पर कार्य करने लगा था और इसी शिक्षा व्यवस्था का ही प्रभाव था कि हिंदी-भाषी मेधावी छात्र के ह्रदय में अपनी सफलता को लेकर संदेह का भाव उत्पन्न हो गया था | ये विडम्बना ही है कि हमारे देश में एक भी ऐसा इंजीनियरिंग कॉलेज नही है जहाँ भारतीय भाषा में शिक्षण कार्य होता हो बल्कि विश्व में हिंदी भाषा बोलने वालो कि संख्या ११०३ मिलियन तक है | आज तक ये किसी भी भारतीय को समझ नही आया है कि किसी टेक्निकल पढाई का किसी भाषा विशेष से कौन सा सम्बन्ध है जो हर जगह अंग्रेजी भाषी इंजीनियरिंग कॉलेज ही दिखाई पड़ते है | और ऐसे ही भाषाई जाल में देश कि एक और प्रतिभा दफन हो रही थी |
यह बात बिलकुल सत्य है कि अगर बुरे से बुरे वक़्त में शुभ चिंतक मित्रो का साथ मिल जाये तो सफ़र बोझिल नही होता है परन्तु लंका में राम कि कल्पना करना तो बेईमानी ही होगा न | कॉलेज में एक भी ऐसा सहपाठी व सीनियर नही था जो पुलकित के दुखो का साथी हो | सबके सब 'अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते थे' और ऐसे माहोल में खुद को कैद करना कोई आसान कार्य नही था | अब मानो पुलकित के ह्रदय में यही पंक्तियाँ गूंजती हो-
''ये चार दिवारी दुनियां तेरी
पतझड़ पावन बहार है,
खुला आसमां प्रेम दिखाए
मगर ये सब बेकार है,
यूँ समेत ली है ये दुनिया..,
मानव ने चौखटे में,
अलग-अलग छड़ रंग दिखाए,
नए-नए भिन्न मुखौटों में..!!''
हमेशा से ईमानदार, सहयोगी और अच्छे लोगो के मध्य रहने वाला कोई व्यक्ति जब किसी ऐसे समाज में प्रवेश करता है जहाँ पर समाज कि परिभाषा कि लागु न हो तो वो व्यक्ति आत्म-कुंठा का शिकार हो जाता है आत्म-विश्वास कि कमी उसके व्यक्तित्व में साफ़ रूप से झलकने लगती है और ऐसे माहोल में किसी स्वाभिमानी व्यक्ति का रहना ठीक उसी प्रकार से असम्भव है जैसे जल-पारी मछली का भूतल पर रहना | तो कुछ ऐसा ही आत्म-सुख कि प्राप्ति तो निरंतर प्रयासरत रहने वाले पुलकित के साथ अतैव उसने फैसला लिया कि वो इस जंजाल से बहार आएगा परिणाम स्वरुप उसने इंजीनियरिंग छोड़ने का निश्चय किया | जब पुलकित ने अपने इस निर्णय को घर वालो के समक्ष रखा तो बवाल उठना तो लाजमी ही था और साथ ही साथ पुलकित कि सफलता से स्वयं को सैदेव लज्जित महसूस करने वाले उन लापरवाह छात्रो के अभिवावको को जब ये बात पता चली तो वे लोग अपने दिल में छुपी पुलकित के प्रति द्वेष कि भावना को छुपा न सके तथा कई तरह के अनर्गल आरोपो से भी पुलकित को अलंकृत करते रहे | उनमे कुछ का तो यहाँ तक कहना था कि, ''गौतम जी का लड़का तो इंजीनियरिग के लायक भी नही था हाईस्कूल, अन्तर में अच्छे नंबर क्या ले आया पाँव ही जमीं में नही थम रहे थे हमने तो पहले ही कहाँ था ये सब अकल कम नक़ल वाले ज्यादा है जिस दिन प्रतिस्पर्धा में बैठेगे उस दिन सारी सच्चाई सामने आ जायेगी, सच तो ये है कि उसने कोई कोर्स-वोर्स थोड़े न छोड़ा है, वो तो कॉलेज से निकल दिया गया है | अब कोई भला सच बताता है क्या |'' लेकिन वहीँ पुलकित अपने फैसले पर अडिग था फलस्वरूप परिवारजनो को पुलकित कि बात माननी ही पड़ी | अब न केवल पुलकि केवल अपने अधूरे ख्वाब को पूरा करना चाहता था बल्कि उसने कई और अरमानो कि लकीरे अपनी हथेली पर खींच ली थी | इस समय पुलकित एक आजाद पंक्षी कि भाति था जो किसी भी दिशा में उड़न भर सकता था परन्तु सच ही है जब किसी इंसान को आजादी मिल जाती है तो उस पर जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती है | ठीक इसी प्रकार पुलकित के कंधे पर भी जिम्मेदारियां आन पड़ी थी कि वो इस कर्म भूमि में स्वयं को साबित करे |
(11)
इंजीनियरिग कोर्स को छोडे हुए लगभग एक माह का वक़्त बीत चूका था लेकिन पुलकित के कदम अभी भी किसी सही दिशा कि और नही बढे थे शीघ्र ही पुलकित को इस बात का एहसास भी हो गया | चुकी पढाई का नया सत्र प्रारम्भ होने में अभी पञ्च से छ माह का वक़्त बाकि था अतैव पुलकित ने फैसला किया कि वो इस बचे हुए समय में वो अपने पसंदीदा विषय 'गणित' कि बारीकियों को सीखेगा और इसके लिए दरकार थी तो बस एक अच्छे अध्यापक कि जो उसे पसंदीदा विषय को और मजबूत बना सके | जब पुलकित ने इस सम्बन्ध में अपने मित्र 'शुभम' सी बात कि तो उसने किसी इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा कि तैयारी करने वाली कोचिंग में दाखिला लेने कि सलाह दी | पुलकित ने शुभम कि बात पर अमल करते हुए प्रदेश कि ही एक उत्कृष्ट कोचिंग का चयन किया | और जब पुलकित फ़ीस इत्यादि कि जानकारी हेतु वहाँ पर पहुंचा तो उसने पाया कि कोचिंग संस्थान किसी भी तरह किसी शॉपिंगमाल से कम नही दीखता था पूरी तरह एयरकण्डीशन बिल्डिंग को देखकर उसे इस बात का एहसास हो गया था कि कोचिंग कि फ़ीस जरुर ही अधिक होगी परन्तु इतना अंदाज़ा नही लगाया था कि यहाँ केवल गणित विषय कि ही फ़ीस बराह हजार रुपए होगी | वो तो सोच रहा था कि एक विषय कि अधिकतम फ़ीस चार या पञ्च हजार रुपए ही होगी परन्तु इतनी अधिक फ़ीस सुनकर तो उसके 'तोते ही उड़ गये' थे | वो तो इस जुगत में था कि ट्यूशन आदि को पढ़ा करके वो तिन या चार महीने में इतनी फ़ीस का इंतजाम कर लेगा | परन्तु इतने अधिक रुपए के संग्रह हेतु उसे कम से कम आठ या नव महीने कि आवश्यकता तो थी ही | लेकिन इन आठ या नव महीनो को कटना इतना आसान भी नही था | पुलकित तो बस जल्द से जल्द दाखिला लेना चाहता था लेकिन समस्या तो ये थी कि इतने अधिक पैसो का इंतज़ाम करे तो वो करे कहाँ से, अब वो अपने पिता जी से तो इन रूपैयों कि मांग तो कर नही सकता था, आखिर कहे भी तो किस मुँह से | आखिर वो क्या कहेगा ? कि 'पापा मुझे बारह हजार रुपियों कि जरुरत है क्यों कि मैं इंजीनियरिग कि कोचिंग में दाखिला लेना चाहता हूँ | ' अगर वो ऐसा कहता तो परिवारजनो के मध्य उसका दिवालियां घोषित होना तो लाजमी ही था | अब रास्ता एक ही था कि धैर्य रखा जाये और इन रूपैयों का इंतज़ाम स्वयं किया जाये |
यूँ ही ट्यूशन ढूंढते-ढूंढते एक महीने का समय और गुजर गया परन्तु अभी तक उसके हाथ में एक भी ट्यूशन नही लगा था | वो जिससे भी इस बारे में कहता तो बस एक ही जवाब आता कि 'भला साल के अंत में तुम्हे कौन पढने के लिए रख लेगा, इसके लिए तो बस नए सत्र का ही इन्तजार करना होगा' | अब तो और मुसीबत, पुलकित को ये समझने में ज्यादा देर न लगी जिस सफ़र को वो इतना आसान और सुखद समझ रहा था वो दरसल काँटों पर चलने से कम न था | अब तो एक ही चारा था कि पैसा कमाने के लिए किसी और विकल्प को जाये | लेकिन वो विकल्प आखिर क्या हो सकता था ? किसी बनिया कि दुकान में मुनीमी या फिर सब्जी इत्यादि का ठेला पर या क्या कोई व्यापारी का लड़का किसी दूसरे के प्रतिस्ठान में मजदूरी कर सकता था ? शायद नही ! पुलकित तो कभी नही | लेकिन उसे तो ऐसी कोई सूझ जान नही पड़ रही थी कि जिससे वो आसानी से इन रुपयो का इंतज़ाम कर सके | उसे तो बस एक ऐसे विकल्प कि तलाश थी कि जिससे 'सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे' | अंततः उसे ऐसा काम मिल ही गया जिससे वो डेढ़ हजार रूपए महीने तक कम सके | कम कुछ ऐसा था कि उसे कुछ अध्यापको के नोट्स को अपनी हैण्ड राइटिंग में लिखना होता था जिससे उसे हर पेज के लिए 'दो रुपए' मिलता था | उसकी कोशिश रहती थी कि वो कम से कम 25 पेज तो दिन भर में लिख ही दे | और ये कम भी कुछ ऐसा था कि जिसने घर वालो को कानो-कान खबर भी नही लगने दी, इसके लिए पुलकित अपने मित्र शुभम का बेहद शुक्रगुजार था जिसके सहयोग से ही उसे इस प्रकार के विकल्प कि प्राप्ति हुई थी |
(12)
देखते ही देखते चार माह तक का समय बीत चुका था तथा इतने समय के मध्य पुलकित भी 'छ हजार' रुपए कि बचत कर चुका था |
आज रविवार का दिन है यानि छुट्टी का दिन, इस दिन पुलकित कि कोशिश रहती थी कि वो इस दिन कम से कम पचास पेज तो लिख ही ले | वो इन्ही नोटसो को बनाने में लगा हुआ था कि इतने में ही उसका मित्र शुभम आ धमका और पुलकित से क्रिकेट खेलने के लिए अनुरोध करने लगा | पुलकित खुद को शुभम के सहयोग का ऋणी मानता था, तथा वो क्रिकेट का सौखीन भी था इसलिए उसने क्रिकेट खेलने के लिए हाँ कर दी | क्रिकेट का मैदान पुल्कित के घर से कुछ ही दुरी पर था इसलिए वो दोनों पैदल ही मैदान के लिए निकल लिए | बातो ही बातो में शुभम ने पुलकित को बताया कि ये क्रिकेट मैच चार हजार रुपए का है, जिसे वो किसी भी कीमत पर जितना चाहता है | क्यों कि पुलकित एक अच्छा खिलाड़ी था और शुभम इस बात को अच्छी तरह से जनता था तथा टीम का कप्तान होते होने के नाते शुभम तो बस इतना चाहता था कि पुलकित मैच में अपना सर्वश्रेस्ठ प्रदर्शन दे सके | पुलकित कुछ देर शांत शांत रहने के बाद शुभम से, ''यार, शुभम क्रिकेट में पैसे लगाकर खेलना कोई अच्छी बात नही है | क्रिकेट को हमें मनोरंजन के तौर पर लेना चाहिए न कि किसी पेशे कि तरह |'' पुलकित के इस प्रश्न का जवाब देते हुए शुभम ने पुलकित से कहा, ''मैं कौन सा तुमसे पैसा लगाने के लिए कह रहा हूँ, तुम एक अच्छे खिलाड़ी हो और मैं तो बस इतना ही चाहता हूँ कि तुम अच्छा खेल दिखाओ जिससे हैम मैच जीत सके |'' पुलकित ने भी शुभम के इस तर्क से स्व्यं को संतुस्ट पाया | अब तक दोनों मैदान में प्रवेश कर चुके थे जहाँ पर पहले से ही दोनों टीम के खिलाड़ी उपस्थित थे | मैच का टॉस हुआ जिसमे कप्तान शुभम ने बाज़ी मरी और पहले बल्लेबाज़ी करने का फैसला लिया | 15-15 ओवर के निर्धारित हुए इस मैच में पुलकित कि जानदार बल्लेबाज़ी कि बदौलत टीम ने 150 रन का लक्ष्य विरोधी टीम के समक्ष रखा जिसमे पुलकित ने 75 और शुभम ने 35 रन का योगदान दिया | जवाब में विरोधी टीम 13 ओवर में ही 110 रन बनाकर आल आउट हो गयी | और बोलिंग में कमाल करते हुए पुलकित ने चार खिलाडियों को आउट किया | मैच समाप्त हुआ तो पुलकित को पता चला कि मैच में चार हजार रुपए अकेले शुभम ने ही लगाये थे | अब वो सोचने लगा कि काश ये चार हजार रुपए उसे मिल जाते तो शायद वो कोचिंग में दाखिला लेने में सफल हो जाता | एक छड़ तो उसके मन में विचार आया कि क्यों न इन चार हजार रूपैयों को शुभम से उधार ले लिया जाये | परन्तु बाद में वो ऐसी कोई हिम्मत न जुटा सका | शुभम ने भी जीत कि खुशी में अपने टीम के सभी खिलाडियों को होटल में पार्टी दी, और उसके बाद सभी अपने-अपने घरो को चले गये |
एक सप्ताह बीत चुका था | पुलकित बहार वाले कमरे में बैठ कर नोट्स तैयार करने में लगा हुआ था कि तभी घर के मुख्या द्वार के खटकने कि आवाज सुनाई दी | पुलकित को लगा कि पक्का ही शुभम आया होगा | लेकिन जब उसने गेट खोला तो उसने देखा कि दरवाजे पर दयाल बाबू खड़े थे | पुलकित ने तुरंत ही उनके चरणो कि धूल को अपने माथे से स्पर्श किया और कमरे बैठने का निवेदन किया | पुलकित कमरे से अपने नोट्स को समेट ही रहा था कि तभी दयाल बाबू पुलकित से कहते है, ''लगता है कि पढाई चल रहे थी |'' पुलकित ने कोई जवाब न देकर बस हल्का सा मुस्कुरा दिया | कुछ देर बाद फिर दयाल बाबू पुलकित से कहते है, ''पिताजी, तो वहीं दुकान पर ही होगे | ''
पुलकित- ''हाँ...हाँ |''
कुछ देर बाद...
दयाल बाबू- ''अच्छा, माँ जी कहाँ है तुम्हारी ?''
पुलकित- ''वो बगल में चाची के घर तक गयी है, बस आती ही होगी !''
दयाल बाबू- ''अच्छा...अच्छा |''
कुछ ही देर में वसुंधरा जी भी आ गयी और दयाल बाबू को देखकर बोली- ''अरे! भाई साहब बड़े दिन बाद आना हुआ, ऐसा लगता है जैसे रास्ता ही भूल गये है घर का |''
दयाल बाबू- ''नही..नही, ऐसी कोई बात नही है |''
वसुंधरा जी पुलकित से- ''अरे! पानी-वानी के लिए पूछा कि नही |''
पुलकित- ''हाँ...हाँ, बस ला रहे |''
और ये कहता हुआ उठ कर किचन कि ओर चल देता है..
दयाल बाबू वसुंधरा जी से- ''सुना है पुलकित ने इंजीनियरिंग छोड़ दी है | ''
उनकी अभिव्यक्ति का तरीका कुछ ऐसा था कि जिससे ये ज्ञात होने में जरा भी देर नही लगी कि उनका यहाँ आने का प्रयोजन क्या था |
वसुंधरा जी अपनी नजरो को दयाल बाबू से हटाते हुए बड़े कड़े शब्दो में बोली- ''जिसको पढाई ही नही करनी है उसकी बात ही क्या करना |''
दयाल बाबू- ''पता नही, यहाँ लोगो को इतना बढियां कॉलेज भी नही मिलता है और एक ये है जिनको मिल गया तो छोड़ कर बैठ गये |''
इतने में पुलकित हाथो में मीठा और पानी को लिए हुए वहाँ पर आ पहुंचा |
दयाल बाबू पुलकित से- ''और पुलकित पढाई कैसी चल रही है इस समय |"
पुलकित उनके इस प्रश्न के जवाब में निरुत्तर था | कुछ देर बस गिलास और प्लेट कि ही आवाजे सुनाई देती है | फिर..
दयाल बाबू- ''चलो तुमने इंजीनियरिंग छोड़ी, कोई बात नही लेकिन कुछ न कुछ तो सोच कर रखा ही होगा |''
पुलकित तिरछी निगाहो से माँ कि ओर देखते हुए बोला- ''बस सरकारी नौकरी पानी है किसी तरह..|''
दयाल बाबू- ''अच्छी बात है लेकिन कहीं कोचिंग-वोचिंग कर रहे हो कि नही |''
पुलकित- ''नही अभी तो नही जा रहे है लेकिन जल्दी ही चालू कर देंगे |
दयाल बाबू- ''चलो.., वैसे किस क्षेत्र में तुम्हारा अधिक रुझान है | ''
पुलकित- ''अरे, कोई भी हो बस सरकारी नौकरी होनी चाहियें |''
दयाल बाबू मुस्कुराते हुए- ''कोई भी क्या ? सिविल कि तैयारी क्यों नही करते.., अगर कहीं भाग्य खुल गया तो समझो पीढ़ियां बैठे खाएगी |''
पुलकित दबी हुई आवाज में- ''हाँ...हाँ |''
दयाल बाबू- ''चलो जो सोच रखा हो, पर तुम्हारा कोई एक लक्ष्य नही नजर आ रहा है | अगर तुम्हे सिविल में जाना है तो कतई इसे आसान न समझो, ये हमेशा ध्यान रखना कि आजकल बिना कड़ी मेहनत के यहाँ कुछ हासिल नही होता है.., और तुम तो समझदार बच्चे हो, यार !''
पुलकित कुछ कहता कि उससे पहले ही वसुंधरा जी दयाल बाबू से- ''घर में खाने को मिल जाता है , सोने को मिल जाता है तो चिंता कहे कि होगी...अभी संघर्ष देखा कहाँ है जिस दिन मुसीबत आएगी उस दिन डिग्री का सारा महत्व पता चल जायेगा |'' और इतना कहते हुए वहाँ से उठ कर चल दी |
कुछ देर पुलकित और दयाल बाबू दोनों शांत रहते है और फिर..
पुलकित हिमम्त जुटाते हुए दयाल बाबू से- ''चाचा जी वो वो हमें सिविल में नही जाना है बल्कि एक अच्छा अध्यापक बनना है |''
दयाल बाबू- अरे भाई! अगर अच्छा अध्यापक बनना है तो पहले ग्रेजुएशन तो करो..|
पुलकित- ''हाँ..चाचा जी वही तो सोच रहे है | बस नया सत्र प्रारम्भ हो जाये |''
दयाल बाबू अपनी नजरो को पुलकित से हटते हुए - ''पता नही तुम्हारा कुछ समझ नही आ रहा है | कभी तुम सिविल कि कोचिंग कि बात कहते हो कभी अध्यापक बनने की | लगता ही अभी तक तुम अपने लक्ष्य को लेकर दुविधा में फसे हुए हो |''
ये सब बाते सुनकर पुलकित को झूठ बोलने का पछतावा तो होता है लेकिन कहीं भी उसे ऐसा प्रतीत नही होता है की उसका कोई एक लक्ष्य नही है | कुछ देर तो दोनों शांत रहते है की थोड़ी ही देर में दयाल बाबू, पुलकित से- ''चलो अच्छा तुम्हारी थोड़ी परीक्षा ले ली जाये | अच्छा ये बातो की हिंदी वर्णमाला में 'स' कितने कितने प्रकार के होते है ?''
पुलकित कुछ देर सोचने के बाद- 'तिन प्रकार के |''
दयाल बाबू- ''बहुत बढियां, अब जरा इनके नाम तो बताओ जरा |''
पुलकित आश्चर्य से- ''नाम...मतलब |''
दयाल बाबू- ''अरे, कुछ नाम तो होगा इनका |''
पुलकित दिमाग में जोर लगाने में लगा ही हुआ था की तभी दरवाजे के खटकने की आवाज सुनाई दी ...
पुलकित दयाल बाबू से- ''बस आ रहे, दरवाजा खोल आए |
दयाल बाबू अपनी स्वीकृति देते हुए- ''हाँ..हाँ |''
पुलकित जैसे ही घर का मुख्या द्वार खोलता है तो देखता है की शुभम हाथो में बैट लेकर खड़ा हुआ है | शुभम पुलकित से, ''चलो जल्दी चलो..आज फिर उन्ही लोगो से मैच है |''
पुलकित- ''चल रहे रुको तो..वो ज्ञानवादी चाचा आयें है न.., चलो अच्छा अंदर को तो आओ |''
शुभम- ''नही..नही हम यही खड़े है, तुम तैयार होकर आओ जल्दी से |''
लेकिन पुलकित जबर्दस्ती ही शुभम का हाथ पकड़कर कमरे तक उसे ले आता है |
शुभम दयाल बाबू को देखकर- ''नमस्ते दयाल चाचा !''
दयाल बाबू- ''नमस्ते..नमस्ते, और शुभम कैसे हो ?''
शुभम- ''बस चाचा जी सब सब ठीक है |''
दयाल बाबू- ''चलो बढियां है..वैसे क्या चल रहा है इस समय |''
शुभम- बस वही चावल के व्यापार में पिता जी का हाथ बता रहे है |''
दयाल बाबू- ''चलो बढियां ही है | वैसे कुछ न कुछ तो करते ही रहना चाहियें |''
पुलकित वहीँ शांत सा बैठा हुआ था की तभी शुभम पुलकित से- ''जाओ फिर जल्दी से तैयार होकर आओ |''
दयाल बाबू शुभम के बैट की ओर देखते हुए- ''लगता आज क्रिकेट खेलने का विचार है तुम दोनों का.., चलो अच्छा फिर हम चलते है |''
पुलकित उत्तेजना भरे भाव में- ''अरे! चाचा जी उत्तर तो बता दीजिये |''
दयाल बाबू के बोलने से पहले ही शुभम- ''किसका उत्तर ?''
पुलकित शुभम से- ''अरे, वो हिंदी वर्णमाला में तीनो 'स' के नाम क्या-क्या होते है |''
शुभम हॅसते हुए- ''अच्छा, हिंदी वर्णमाला में तीन 'स' भी होते है क्या !''
परन्तु उसके इस व्यंग के उत्तर में न तो पुलकित कोई प्रतिक्रिया देता है और न ही दयाल बाबू | छड़ भर बाद...
दयाल बाबू पुलकित से- ''पहले तुम कोशिश करके पता करो, फिर हम बताते है |''
और इतना कह कर दयाल बाबू वहाँ से उठ कर चल दिए | पुलकित ने भी कपडे बदले और अपने बचत किये हुए 6000 रूपैयों को जेब में डाला और शुभम के साथ मैदान की ओर चल दिया | पुलकित से शुभम से प्रथम यही पूछा कि, ''आज कितने का मैच है ?'' पुलकित का ये प्रश्न ये बताने के लिए काफी था कि उसने उन 6000 रूपैयों को किस प्रयोजन से अपने जेब में डाला था |
शुभम ने हलकी मुस्कराहट के साथ जवाब दिया- ''आज 6000 रुपए का मैच है |''
जैसे ही पुलकित ने इतना सुना तो उसने तुरंत ही शुभम से आग्रह किया कि आज के मैच में वो भी पैसा लगाना चाहता है | शुभम ने भी उसके आग्रह को स्वीकारते हुए उससे पूछा- ''चलो ठीक है, अच्छा बताओ तुम्हारे कितने पैसे लगा दिए जाये |''
पुलकित- ''पुरे 6000 रुपए |''
शुभम गुस्सा होते हुए- ''अरे बेवकूफ हो क्या.., इतने रुपए कहाँ से लाये ?''
पुलकित- ''यार, वो बचत कि है मैंने''
शुभम- ''यार! तब भी सोच लो क्रिकेट का कोई भरोसा थोड़े न है |''
लेकिन बार-बार पुलकित के आग्रह करने पर शुभम ने हामी भर ही दी | अब तक दोनों मैदान में पहुँच चुके थे | पुलकित इस मैच को लेकर कितना गम्भीर था इस बात का अंदाजा इसी बात से लगा सकते है कि पुलकित ने मैदान में पहुंचते ही सर्वप्रथम तेज दौड़कर उसके दो चक्कर लगाये और और अपने शरीर में ऊर्जा का संचार किया | आज के इस मैच को पुलकित हर कीमत पर जितना चाहता था | मैच का टॉस हुआ जिसमे पुलकित कि टीम ने बाज़ी मारी तथा आपसी विचार-विमर्श के बाद टीम ने पहले गेंदबाजी करने का फैसला लिया | मैच का पहला ओवर पुलकित के द्वारा फेका गया जो कि काफी महँगा साबित हुआ जिसमे पुलकित ने बारह रन लुटा दिए जिसके बाद तो मैच कि स्थिति ओवर दर ओवर बिगड़ती ही चली गयी | अंततः विरोधी टीम ने कुल पंद्रह ओवर में १६५ रन का विशाल स्कोर उनके समक्ष रखा | अब तो सबकी उम्मीदे पिछले मैच के हीरो रहे पुलकित और शुभम पर ही टिकी हुई थी | पुलकित मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने में लगा हुआ था कि 'हे! भगवान बस किसी भी तरह से ये वाला मैच जितवादे जिसके बाद वो कभी भी मैच में पैसे लगाकर नही खेलेगा' लेकिन कहीं न कहीं उसे इस बात कि आशंका तो हो ही गयी थी कि शायद वो इस मैच को जीत नही सकेगा | और उसकी आशंका को तो तब और भी बल मिल गया जब मात्र पंद्रह रन के स्कोर पर ही वो बोल्ड आउट हो गया | अब तो पूरी टीम कि उम्मीदे केवल और केवल शुभम पर ही टिकी हुई थी | लेकिन दसवें ओवर ने तो बची-खुची आशाओं को भी समाप्त कर दिया जब 17 रन पर शुभम अपने निजी स्कोर 63 पर आउट हो गया | अब जब कि मैच बस समाप्त ही होने वाला था कि तभी शुभम ने पुलकित के पास जाकर दबे हुए स्वर में कहा कि, ''पैसे तो लिए हो न |'' पुलकित ने बिना शुभम कि ओर देखते हुए उससे कहा कि वो पैसे लेकर ही आया था | अंततः पुलकित कि टीम ने मैच को गवां ही दिया | पुलकित ने भी 6000 रूपैयों को शुभम के हाथो में सौपा और घर के लिए चल दिया | शुभम भी पुलकित के ह्रदय कि व्यथा को समझ रहा था इसलिए वो इतनी भी हिमम्त नही जुटा पाया कि वो पुलकित को साथ चलने के लिए कह सके | अब तो पुलकित ह्रदय में तरह-तरह के बुरे विचारो का उदगम भी प्रारम्भ हो गया उसको अपने किये पर पछतावा तो बहुत हो रहा था परन्तु वो करता भी तो क्या ? अब गुजरा हुआ समय तो वो वापस ला नही सकता था | उसे ऐसा लग रहा था मानो वो फिर से वहाँ पर पहुँच गया हो जहाँ से उसने अपना सफ़र प्रारम्भ किया था वो बस यही सोचे जा रहा था कि आखिर कब उसकी जिंदगी से अँधेरा छंटेगा | मानो उसके दिल में अब यही गूंज रहा हो कि-
''मैं जब रोता हूँ अकेले में,
तो कुछ समझ में ना आता है,
मैं जब जाता हूँ उजाले में,
तो भी 'अँधेरा' ही नजर आता है !''
(13)
पढाई का नया सत्र प्रारम्भ होने वाला था इसलिए पुलकित ने अपने परिवार जनो के समक्ष ये इक्षा जाहिर कि वो अपने आगे कि पढाई को जरी रखना चाहता है | उसने बताया कि वो प्रदेश के ही किसी अच्छे महाविद्यालय से गणित में बी.ऐ करना चाहता है | जब भाई ने ये बात सुनी तो उसने अपनी नाराजगी जताते हुए कहा कि, ''दुनिया आगे कि ओर चलती है और एक ये महाशय है जो पीछे कि ओर भाग रहे है | वैसे भी जब से तुमने इंजीनियरिंग के कोर्स को छोड़ा है तब से पूरा मोहल्ला पिता जी का मजाक बनता है | अब आर्ट्स में दाखिला लेकर तुम रही-सही कसर पूरा करना चाहते हो |'' भाई के इन शब्दो के के जवाब में पुलकित कुछ नही कह पता है कि तभी उसके पिता सोमिल से कहते है, ''जो होना था वो हो चूका है अब इन बातो को उखाड़ने का कोई मतलब नही रह जाता है, अब पुलकित जो करना चाहता है उसे करने दिया जायेगा |'' परिणाम स्वरुप पुलकित प्रदेश के ही एक अच्छे महाविद्यालय में दाखिला लेने में सफल हो ही जाता है | पुलकित इस बात से भली-भाति परिचित था कि उसने जिस ख्वाब को अपने दिल में पाल रखा है वो केवल और केवल उसके ज्ञान के द्वारा ही सम्भव है इसलिए वो काफी लगन और मेहनत से बी.ऐ कि तैयारियों में जुटा हुआ था | हाँ भले ही वो कोचिंग में दाखिल होने में अभी तक सफल नही हो पाया था परन्तु उसने अभी तक श्रम से मुँह नही फेरा था वो अबी भी इस कोशिश में रहता था कि बस किसी भी तरह हर माह कम से कम १५०० रुपए तो पैदा किये ही जाये |
बी.ऐ. प्रथम वर्ष कि परीक्षा का समय नजदीक आ चूका था | पुलकित कि मेहनत इस बात का संकेत दे रही थी कि वो इसके लिए पूरी तरह से तैयार है | देखते ही देखते वो समय भी नजदीक आ गया जब उसका पहला पेपर था | पुलकित का कॉलेज उसके घर से तीस किलोमीटर कि दूरी पर स्थित था और रास्ता भी इतना ठीक न था कि परीक्षा समय से दो घंटा पूर्व ही निकला न जाये | वो अपने घर से साईकिल से ही पेपर देने जाता था | और ६० किलोमीटर साईकिल चलने के बाद जाहिर सी बात है कि कोई भी किशोर अपने आप को थका हुआ महसूस करेगा | परन्तु इस थकावट पर उसकी मानसिक थकावट ज्यादा हावी थी | वो खुद को इस सफ़र में अकेला ही महसूस करता था | अगर वो कभी एकान्त में बैठ कर पहले और अब के समय का विशलेशण करता तो स्वतः ही उसके आंसू बहने लगते थे | उसे महसूस होता कि मनो उसने अपने परिवारजनो को खो दिया है | वो अपने जो पहले उसके पेपर के समय उसकी छोटी-छोटी जरुरतो का ख्याल रखते थे और इस इन्तजार में उसकी माँ घर के मुख्या द्वार में खड़ी रहती थी कि कब उसका पुलकित पेपर दे कर वापस लौटेगा | और वो उससे पूछ सकेगी कि बेटा पेपर कैसा हुआ ? और उसके बाद गरम-गरम खाना परोसेगी और जल्दी सो जेन के लिए कहेगी | लेकिन अब तो स्थित ऐसी थी कि मनो घर वालो को ये भी पता न हो कि पुलकित का आज पेपर है भी कि नही | पुलकित को स्वयं पर विश्वास था कि वो अपने घर में खोये हुए सम्मान को वापस पा सकेगा और उसके इसी विश्वास को मजबूत करने का काम उसके अच्छे बीतते हुए पेपर कर रहे थे | उसे इसे बात कि आशा थी कि अच्छे नम्बरो से पास होकर वो पुनः पहले जैसी स्थित ला सकेगा |
आज का दिन पुलकित के लिए काफी महत्वपूर्ण है | और होना भी स्वाभाविक था क्यों कि आज उसके बी.ऐ. प्रथम वर्ष का परिणाम आने वाला है | घर पर सब कुछ सामान्य है बस केवल पुलकित को छोड़कर, आज पुलकित के चेहरे पर बेचैनी साफ़ देखी जा सकती थी | परन्तु किसी ने भी उसकी इस बेचनी को कम करने का प्रयास तक नही किया | घर पर सभी को ये पता था कि आज पुलकित का रिजल्ट आने वाला है परन्तु उनमे से किसी के भी मुख से रिजल्ट नाम का शब्द तक सुनाई नही पड़ा था | पुलकित तो बस मन ही मन ये प्रार्थना किये जा रहा था कि भगवान मैं बस किसी तरह अच्छे नम्बरो से पास हो जाऊ | समय धीरे-धीरे करवट ले रहा था और देखते ही देखते घड़ी में साढ़े बारह बज गये यानि अब कुछ ही समय के इन्तजार के बाद रिजल्ट कि प्राप्ति होनी थी | पुलकित ने भी अपनी साईकिल उठाई और रिजल्ट जानने हेतु कॉलेज कि ओर चल दिया | देखते ही देखते वो अपने विद्यालय तक जा पहुँचता है, जब वो वहाँ का दृश्य देखता है तो उसे किसी अनिष्ट कि आशंका होती है बल्कि ऐसा कुछ था जब कि वहाँ उपस्थित विद्यालय के शिक्षको का जमावड़ा पुलकित कि ही बाँट जो रहा था | प्रधानाचार्य महोदय ने पुलकित के गले में पुष्पो कि माला पहनाई और उसे इस बात से अवगत कराया कि उसने पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप किया है | इतना सुनते ही मनो पुलकित का चेहरा गुलाब कि भाति खिल उठा हो और अपने सुगंध को समस्त जगत में बिखेरने के लिए उतावला हो | वो अपनी इस खुसी को सर्वप्रथम अपने परिवार के साथ बाटना चाहता था इसलिए उसने ज्यादा देर न करते हुए घर के लिए निकलना ही उचित समझा | उसमे इस बात को लेकर उत्सुकता ज्यादा हावी थी कि वो बस जल्दी से जल्दी इस समाचार को घर वालो को सुना सके इसी कारणवश अन्य दिनों कि अपेक्षा उसकी साईकिल कि रफ़्तार भी अधिक तेज थी | मंद-मंद मुस्कान ओंठो पर पर 'जीत का गीत' इस ओर इशारा कर रहा था कि वो मन ही मन भविष्य देखने कि कोशिस कर रहा है वो देखता है कि ''जैसे ही वो अपनी खुशी को अपनी माँ वसुंधरा को बताता है तो वो पुलकित कि बात पर यकीं नही करती है और पुलकित को अपनी कसम का वास्ता देते हुए उसे सच बोलने के लिए कहती है | पुनः जब पुलकित इस बात को दोहराता है तो माँ पुलकित को अपने ह्रदय से लगा लेती है और कहती है कि मैं जानती थी कि मेरा बोटा होनहार है लेकिन वो मोहल्ले वालो कि बातो ने मुझे ऐसा बना दिया था | अब देहना तुम कि मैं कैसे उनकी खबर लेती हूँ..|'' पुलकित को महसूस होता है उसका ये रिजल्ट वर्त्तमान के गिले-सिकवे को दूर करने का काम करेगा | साथ ही साथ वो इस बात कि उम्मीद भी कर रहा था कि इससे उनके मुख पर भी ताला लगेगा जो उसका इंजीनियरिंग छोड़ने के बाद से ही मजाक उड़ाया करते थे | तथा फिर से पिता जी इन लोगो के सम्मुख छाती चौड़ी करके खड़े हो सकेगे लेकिन शायद वो व्यर्थ ही ये सब चित्रण कर रहा था कि क्यों कि गणित के शिक्षक 'आर. पी. यादव' ने उसके सूचित करने से पहले ही गौतम जी को इस बात से अवगत करा दिया था और इस तरह ये सुचना पहले ही समूचे मोहल्ले में बिखर चुकी थी |
कुछ ही देर में घर पहुँचने के बाद पुलकित सोचता है कि जब आज वो अपनी माँ को ये बात बतायेगा कि उसने पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप किया है तो आज वो पुनः अपनी माँ को वैसा खुस होता देख पायेगा जैसा कि उसने उन्हें हाईस्कूल, इंटर के रिजल्ट के समय देखा था | इसी उम्मीद और हल्की मुस्कुराहट को अपने मुख-मंडल में समेटे हुए जब वो अपनी माँ को घर में खोजता है तो वो पता है कि वो किचन में खाना बना रही है |
पुलकित किचन में अपनी माँ से- ''एक बात बताये |''
माँ- ''क्या...?''
पुलकित- ''मैंने..(दबे स्वर में)...पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप किया है ..(ऊँचे स्वर में)..|''
माँ वसुंधरा पुलकित को नजरंदाज़ करते हुए- ''इसमें इतना चिल्लाने कि जरुरत नही है कोई सरकारी नौकरी नही पा गये हो |''
पुलकित को अपनी माँ से ऐसी प्रतिक्रया कि उम्मीद बिल्कुल भी नही थी | गुलाब कि भाती खिले हुए उसके चेहरे को मुरझाने में तनिक भी देर न लगी | वो जिस नूर को अपनी आँखों में समेटे हुए माँ समक्ष गया था वो अब बिल्कुल दूर हो गया था और बचा था तो वो केवल खारा जल था | जो ये एहसास दिल रहा था कि उसके जीवन में मिठास का कोई भी स्थान नही है | उसने किसी तरह खुद को सम्भाला और बहार वाले कमरे में जा कर तखत पर औंधे मुह लेटकर रोने लगा | ऐसा नही था कि पुलकित कि इस सफलता ने वसुंधरा जी के दिल को ठंडक नही पहुंचाई थी परन्तु इस वक़्त वो दिल कि नही बल्कि अपने दिमाग कि सुन रही थी और जब भी कोई इंसान अपनी आत्मा कि आवाज, अपने दिल के द्वारा सुझाये गये रास्तो को ठुकराता है, उसके विरुद्ध जाता है तो इसमें कोई शंका नही होनी चाहिए कि वो गलत दिशा में बढ़ रहा है | लेकिन माँ का दिल तो आखिर माँ का दिल है वो कब तक अपने पुत्र कि खुशियों को साझा करने से दूर भाग सकता है | उन्हें करीब तो आना ही था | परिणाम स्वरुप उन्होने दैनिक कार्यो को विराम दिया और किचन से उठ कर बहार वाले कमरे कि ओर बढ़ गयी और वहाँ पर वो देखती है कि पुलकित तखत पर औंधे मुह लेता हुआ है | वसुंधरा जी ने स्नेह से पुलकि के सर पर हाथ फेरते हुए कहा, ''मुझे ये बात पहले से ही पता थी क्यों कि यादव सर पहले ही तुम्हारे पिता जी को ये बात बता गये थे तभी तो हमने कोई खुशी नही जाहिर कि |
साथ ही साथ उन्होने अपनी इक्षा को प्रकट करते हुए पुलकित से कहा, ''देखो, नंबर तो तुम बहुत बढियां लाये हो लेकिन अब सरकती नौकरी कि तरफ ज्यादा भागो तभी मेहनत सफल है..न जाने कितने बी.ऐ. वाले ठेला लगा रहे है |''
लेकिन पुलकित के मुह से न तो हाँ बोला जा रहा था और न ही न | मनो वो इस बात कि जानबूझकर अनसुनी कर रहा हो | लेकिन कुछ भी हो पुलकित के सफल परिणाम ने उसके परिवार कुछ हद तक तो संगठित करने का प्रयास तो किया था अब परिवार जन पुलकित के ऊपर नजर भी रखते थे और सलाह-मशवरा भी करते थे | वो कहाँ जा रहा है ? क्या कर रहा है ? इसका भी घर वाले ध्यान रखने लगे थे | लेकिन पुलकित को तब भी बुरा लगता था जब सब लोगो ने उससे दुरी बना राखी थी और अब भी बुरा लगता है जब सब कोई उस पर नजर रखने लगे थे | जहाँ पुलकित कि नजरे इंजीनियरिंग कि कोचिंग में दाखिला लेने को लेकर थी | वहीँ परिवारजन चाहते थे कि वो किसी सरकारी नौकरी कि तैयारी करने वाली कोचिंग संस्थान में दाखिला ले इतने समय के मध्य पुलकित ने इतने रुपए कि बचत कर ली थी कि वो इंजीनियरिंग कि कोचिंग में दाखिला ले सके | परन्तु दिक्क़त ये थी कि वो परिवार वालो को ये बात कैसे बताये ? काफी कुछ सोचने के बाद उसे एक ही सूझ नजर आ रही थी और वो थी 'झूठ' | लेकिन क्या झूठ बोलना सही होगा ? इस बात का आकलन पुलकित नही कर पा रहा था | यह सच ही कि सच बोलने से युधिष्ठर धर्मराज कहलाये लेकिन यह भी सत्य है कि झूठ बोलने से भगवान कृष्ण कोई अधर्मराज नही बन गये | तात्पर्य यह ही कि कभी-कभी झूठ बोलना ही उचित होता है बशर्ते तब जब आपका उद्देश्य कल्याणकारी और मानवहित कि रक्षा हेतु हो | और पुलकित ने यही सब सोच कर घर वालो से झूठ बोलने का फैसला लिया | पुलकित ने दाखिला तो इंजीनियरिंग कि कोचिंग में लिया परन्तु घर वालो से झूठ बोला दिया कि उसने सिविल कि तैयारी करने वाली कोचिंग में दाखिला लिया है | जब वो अपने घर वालो के समक्ष इस बात को बोल रहा था तो उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मनो वो कोई अपराधी हो | परन्तु सच बोल कर उनके उद्देश्य कि पूर्ति भी तो नही होनी थी |
(14)
आज पुलकित का कोचिंग में पहला दिन है | जब पुलकित ने कक्षा में प्रवेश किया तो उसने देखा कि कक्षा काफी विशाल है, जिसमे लगभग 1000 विद्यार्थी आराम से बैठ सकते है | उत्तेजना इतनी अधिक थी कि वह कक्षा प्रारम्भ होने कि आधे घंटे पहले ही वहाँ पर पहुँच गया | जैसे-जैसे कक्षा प्रारम्भ होने का समय नजदीक आता जा रहा था वैसे-वैसे कक्षा में विद्यार्थियों कि संख्या भी बढ़ती जा रही थी | धीरे-धीरे लगभग पूरी कक्षा भर गयी | काली जींस पैंट और सफ़ेद टीशर्ट को पहने हुए जब कोचिंग के डायरेक्टर अमित शर्मा जो कि गणित के अध्यापक थे ने प्रवेश किया तो मानो दो घंटे कि कक्षा मालूम ही न पड़ी |
पुलकित को कोचिंग जाते हुए लगभग 15 दिन बीत चुके थे | परन्तु यहाँ भी अंग्रेजी भाषा ने उसका साथ नही छोड़ा था लेकिन इसका हल निकलना भी तो आवश्यक था वरना वो जो सोच रहा था वो सच कैसे होता | पुलकित ने इसका हल निकला...और वो हल था कड़ी मेहनत तथा स्वाध्याय | 'स्व' अर्थात आत्मा और 'अध्याय' अर्थात चिंतन, कहने का मतलब है आत्म चिंतन | यानि अध्यापक के ऊपर से अत्यधिक निर्भरता को समाप्त कर कड़ी मेहनत और आत्मचिंतन पर जोर दिया जाये | जब अगर किसी को व्यवस्था बदलनी है तो सबसे पहले उस व्यवस्थ को समझा तो जाये, फिर उसमे परिवर्तन को सोचा जाये | और इस समय व्यवस्थ को समझना ही पुलकित के लिए ज्यादा जरुरी था | वो परिवर्तन का बीज जो इंजीनियरिंग कोर्से के समय ही पुलकित में बोया जा चूका था वो अब पौधा बन कर तैयार था बस जरुरत थी तो अब उसकी अच्छे से देखभाल करने कि ताकि आगे चल कर वो औरो को लाभ दे सके | फलस्वरूप पुलकित ने भी स्वयं से वादा किया कि वो देश कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाएगा | लोगो को इस बात के लिए जागरूक करेगा कि भारतीय भाषाओ में पढ़ कर भी इंजिनियर और वैज्ञानिक बना जा सकता है | उसे यह कतई समझ में नही आता था कि हमें उच्च शिक्षा अपनी पसंद कि भाषा क्यों उपलब्ध नही करायी जाती है ? आखिर कब तक यही ढर्रा चलता रहेगा ? बल्कि सच तो यह है कि अपने पसंद कि भाषा में अगर विद्यार्थी को उच्च शिक्षा मिलने लगे तो इस देश को सफलता के क्षितिज पर पहुंचने से कोई नही रोक सकता है | इसलिए वो वो सपना जो कुछ धुंधला सा था वो अब साफ़ हो चुका था | और पुलकित ने इस बात का प्रण किया कि वो एक ऐसा इंजीनियरिंग कॉलेज खोलेगा कि जिसमे विद्यार्थी को उसकी रूचि कि भाषा में पढ़ने कि आजादी हो |
दो माह का वक़्त बीत चुका था | और इतने समय के मध्य पुलकित ने अपनी कड़ी मेहनत, आत्म चिंतन और त्याग के बलबूते काफी हद तक अपनी व्यक्तिगत दिक्कतो को दूर कर लिया था | और अब तो कोचिंग टेस्टो का दौर भी प्रारम्भ हो गया था | आज पुलकित का कोचिंग में पहला टेस्ट है | और वो आश्वस्त था कि वो टेस्ट में बेहतर करेगा, यह सर्वविदित था कि टेस्ट में आने वालो नम्बरो से ही तय होगा कि वो 'उजाले' कि ओर बढ़ रहा है या 'अँधेरे' कि ओर | उसकी आँखों ने जिस सपने को दिन के उजाले में देखा था उसके लिए जरुरी था कि वो अपने ज्ञान कि आभा को दिन प्रति दिन बढता ही रहे | इसलिए वो कोचिंग टेस्ट के लिए भी कड़ी मेहनत करने से पीछे नही हट रहा था | पुलकित अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटा हुआ था | समय कि ख़ामोशी भी पुलकित को कोचिंग जाने के लिए इशारा कर रही थी | पुलकित ने अपने बैग को कंधे पर टांगा और साईकिल पर बैठ कर कोचिंग के लिए निकल लिया | रास्ते में पुलकित को जाम से भी जूझना पड़ा जिसके कारण उसे कोचिंग पहुँचने में 15 मिनट कि देरी हो गयी | और जब पुलकित ने कक्षा में प्रवेश किया तो देखा कि सभी छात्र कक्षा में उपस्थित है तथा टेस्ट पेपर में व्यस्त है | जिनकी निगरानी हेतु 'अमित' सर ने सहायक अध्यापक 'सूरज पाल सर' को लगा रखा है |
सूरज सर पुलकित को दरवाजे में खड़ा देखकर- ''कहाँ बेटा..?''
पुलकित- ''सर वो टेस्ट पेपर दे दीजिये |''
सूरज सर- ''टेस्ट पेपर.., लेकिन अब क्या करोगे देकर ?''
पुलकित- ''सर वो रास्ते में जाम लग गया था इसलिए देर हो गयी |''
सूरज सर- ''ये बहाने मुझे मत समझाओ और हाँ अगर टेस्ट देना है तुम्हे तो जाओ और डायरेक्टर सर से बात करो जाकर |''
पुलकित थोड़ी देर तो खड़ा रहता है | जब देखता है कि यहाँ पर 'दाल गलने वाली नही है' तो फिर वो अमित सर के ऑफिस कि ओर बढ़ना ही बेहतर समझता है |
अमित सर के ऑफिस के बहार खड़ा होकर पुलकित- ''सर! क्या मैं अंदर आ सकता हूँ |''
अमित सर- ''हाँ...हाँ, आइयें |''
पुलकित- ''सर वो सूरज सर टेस्ट में बैठने नही दे रहे है |''
अमित सर आश्चर्य से- ''टेस्ट में नही बैठने दे रहे है...क्यों ?''
पुलकित धीमी आवाज में - ''सर वो जाम कि वजह से थोड़ी सी देर हो गयी थी | इसलिए...|''
अमित सर- ''थोड़ी देर, तुम्हे पता है अब केवल एक घंटा ही शेष बचा है, आधे घंटे तो तुमने यूँ ही बर्बाद कर दिए | अब भला टेस्ट में क्या अच्छा करोगे ?''
पुलकित तर्क-वितर्क करने कि बजाये शांत खड़े रहना ही हितकर समझता है | कुछ छड़ो बाद...
अमित सर- ''अब जाओ भी अच्छा..दो जाकर टेस्ट पेपर, यहाँ सर लटकाकर क्यों खड़े हो |''
पुलकित- ''धन्यवाद सर!''
और इतना कह कर भाग कर कक्षा में चला जाता है | तथा टेस्ट पेपर को प्राप्त कर उसे करने में जुट जाता है | उसकी मेहनत यहाँ पर सार्थक सिद्ध होती है और एक घंटे में ही वो सम्पूर्ण पेपर को हल करने में सफल हो जाता है | टेस्ट पेपर हल हो जाने के उपरांत उल्कित को इस बात कि प्रबल सम्भावना दिख रही थी कि वो शतप्रतिशत अंक लेन में सफल हो जायेगा |
क्लास टेस्ट के रिजल्ट ने आज पुलकित के ह्रदय को खासा गौरवान्वित होने का अवसर दिया था | क्यों कि वो क्लास का पहला ऐसा बच्चा था जिसने पुरे में पुरे अंको को प्राप्त किया था | इसी ख़ुशी में तब और चार चाँद लग गये जब पुलकित के सभी साथियों ने उसके सम्मान में तालिया बजाई तथा कोचिंग प्रसाशन ने भी उसे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया | पुलकित को मिले इस उपहार ने उसे ना केवल गर्व का अनुभव कराया बल्कि उसकी मेहनत को और बल प्रदान किया |
अब पुलकित लगभग हर एक टेस्ट में अविरत बेहतर प्रदर्शन करता जा रहा था | उसकी काबिलियत का ही एक उदाहरण था कि आज उसे कक्षा का हर एक विद्यार्थी जनता था और अमित सर का मानो वो एक पसंदीदा छात्र बन चुका था | अमित सर को अक्सर ही ऐसा महसूस होता था कि पुलकित में कुछ अलग ही बात है | वो मानते थे कि पुलकित अब तक उनके द्वारा पढ़ाये हुए छात्रो में से सर्वश्रेस्ठ है | एक दिन क्लास छूटने के बाद अमित सर पुलकित से, ''पुलकित, घर जाने से पहले मुझसे मिल के जाना |'' पुलकित, ''जी सर!''
जब पुलकित अमित सर के ऑफिस में पहुँचता है तो-
अमित सर- ''आओ..आओ..,पुलकित बैठो | और पढाई कैसी चल रही है |''
पुलकित- ''जी सर बढियां चल रही है |''
अमित सर- ''बढियां ही चलनी चाहियें...अच्छा ये बताओ तुम गणित के आलावा बाकि सरे विषय कहाँ पढ़ते हो |
पुलकित शांत सा बैठा रहता है | और महसूस करता है कि उसे झूठ बोलकर अमित सर को अँधेरे में नही रखना चाहियें |
अमित सर क्या हुआ ? शांत क्यों हो ? कोई पैसो-वैसो कि दिक्कत हो तो बताओ, कोचिंग संस्था तुम्हारे साथ है !''
पुलकित- ''नही सर ऐसी कोई बात नही है..|''
अमित सर- ''नही...नही कोई बात तो है, तुम जरुर कुछ छुपा रहे हो |''
पुलकित आत्मविश्वास के साथ- ''सर, दरसल बात ये है कि मैं इंजीनियरिंग कि तैयारी ही नही कर रहा हूँ |''
अमित सर बड़े ही जिज्ञासु भाव में- ''मैं कुछ समझा नही..!''
पुलकित उन सारी घटनाओं को एक-एक कर के अमित सर को बताता है जिसने उसके ह्रदय में परिवर्तन रूपी बीज़ को बोने का काम किया था | जिस छड़ पुलकित अपने अतीत को अमित सर के साथ साझा कर रहा था उस छड़ उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो समय सा थम गया हो | उन्हें पुलकित कि आँखों में एक अजीब सी चमक दिख रही थी, उसकी बातो में कुछ कर गुजरने कि मंशा साफ जाहिर हो रही थी | अमित सर खुद को बेहद भाग्यशाली समझ रहे थे कि उन्हें एक ऐसी सोच को रखने वाले छात्र को पढने का मौका मिला है जो ज्ञान के प्रकाश को और अधिक चमकीला बनाना चाहता है | उन्होने न केवल पुलकित को ये विश्वास दिलाया कि वो उसकी हर सम्भव मदद करेंगे बल्कि स्वयं से भी इसके लिए वायदा किया |
(15)
पुलकित शिक्षा के क्षेत्र में लगातार ही बेहतर प्रदर्शन करता जा रहा था | अब तक वो अपनी ग्रेजुएशन कि पढाई को पूरा कर चुका था | एक तरह अब उसके जीवन के दूसरे अध्याय का आरम्भ हो चुका था क्यों कि वो अब 'अमित सर' के साथ बतौर सहायक अध्यापक, अध्यापन के कार्य में लगा हुआ था |
पुलकित को अमित सर के साथ पढते हुए लगभग दो वर्ष का समय बीत चुका था | अब उसके मन में इस बात कि इच्छा बहुत तेजी से बढ़ रही थी कि वो एक ऐसी कोचिंग का शुभारम्भ कर सके जिसमे इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा कि तैयारी को हिंदी भाषा में कराया जाये | क्यों कि कहीं न कहीं पुलकित अंग्रेजी भाषा में पढ़ा-पढ़ा कर उब चुका था और स्वयं में आनंद कि कमी को महसूस कर रहा था | अंततः पुलकित अमित सर के सहयोग और अपनी इच्छा शक्ति के बल पर ऐसी कोचिंग का शुभारम्भ करने में सफल हो ही गया | परन्तु क्या वर्षो से सोई हुई इस आवाम को जगाना क्या आसान काम था ? नही इतना आसान तो न था | इसके लिए कोई साधारण नही बल्कि किसी विशेष प्रयाश कि जरुरत थी | और इसका अहसास पुलकित को 'अँधेरे' में जी रहे युवा वर्ग ने करा दिया था क्यों कि पुलकित को कोई भी अकेला ऐसा छात्र नही मिला था जो कि इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा कि तैयारी को हिंदी भाषा में करना चाहे क्यों कि कहीं न कहीं युवाओ के मन में इस बात को लेकर आशंका थी कि क्या वे हिंदी भाषा में 'इंजीनियरिंग' जैसी टेक्निकल पढाई को पढ़कर अपने आप को स्थापित कर पायेगे ? जहाँ विदेशी कंपनियों का साम्राज्य पुरे देश में फैला हुआ है, क्या वहां किसी हिंदी भाषी छात्र को रोजगार मिल सकेगा | लेकिन युवा वर्ग इतनी छोटी सी बात नही सोच पा रहा था कि आखिर क्यों विदेशी कंपनी हमारे देश में पैर जमाये हुए है | कौन इसका अपराधी है ? किसके कारण से हमारी ये दशा हुई है ? हाला कि पुलकित ने मीडिया, बैनरो, टीवी विज्ञापनों इत्यादि के माध्यम से तो बहुत कोशिश की कि लोग जागरूक हो और इस बात को समझे कि अपनी भाषा में भी पढ़ कर तरक्की पायी जा सकती है परन्तु किसी एक ने भी उसका साथ नही दिया | तब पुलकित को ये समझने में देर न लगी कि युवाओ के आँखों में बंधी पट्टी को उतारना इंतना आसान काम न होगा | फलस्वरूप पुलकित ने फैसला किया कि वो तब तक अंग्रेजी भाषा में ही पढ़ाता रहेगा जब तक कि वो इतने धन को इकठ्ठा न कर ले कि वो अपने सपनो का इंजीनियरिंग कॉलेज खोल सके | और फिर वो कोई ऐसी लोकलुभावनी सूझ सोचेगा जिससे युवाओ के दिमाग में व्याप्त 'अंधरे' को छांटा जा सके |
समय गुजरते वक़्त कहाँ लगता है | और यूँ ही देखते-देखते सात वर्ष बीत चुके थे | इन सात वर्षो के मध्य पुलकित कि निजी एवं पारिवारिक जिंदगी में काफी बदलाव आ चुके थे | लेकिन देश कि शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल भी नही बदली थी | और अब तो और भी तीव्र गति से देश का युवा इस अंग्रेजी भाषा के चक्रव्यूह में फसा जा रहा था | लोगो में भारतीय भाषाओ के विस्तार के लिए तो कोई आगे नही आ रहा था परन्तु अंग्रेजी भाषा का गुणगान कर युवाओ को भ्रमित करने वालो कि संख्या अवश्य बढ़ गयी थी | पुलकित अब तक तीस वर्ष का हो चुका था और इन्ही सात वर्षो के मध्य में उसके बड़े भाई सोमिल कि शादी भी हो चुकी थी तथा अब तक उन्हें एक 'पुत्री रत्न' कि प्राप्ति भी हो चुकी थी जिसका नामकरण स्वयं पुलकित ने 'प्रतीक्षा' को रख कर किया था | चाचा, भतीजी में गजब का स्नेह था | शायद इसका एक कारण ये भी था कि प्रतीक्षा के जन्म के बाद से ही पुलकित के धन और यश में काफी बढ़ोत्तरी हो रही थी, तथा अब उसकी गिनती प्रदेश के सबसे बेहतरीन अध्यापको में होने लगी थी | पुलकित कि इसी सफलता का ही परिणाम था कि अब उसके परिवारजन उसकी व्यक्तिगत जिंदगी को लेकर लगभग निश्चिंत हो चुके थे, बस अब एक ही चिंता थी जो परिवार जानो को सताए जा रही थी कि किसी भी तरह उनका प्यारा पुलकित विवाह के बंधन में बांध जाये | लेकिन तो पुलकित तो बस अपने सपनो के कॉलेज खयालो में ही खोया रहता था उसको इस बात कि बड़ी ही जल्दी थी कि बस वो किसी तरह इस कॉलेज का निर्माण कार्य पूरा करा सके |
दो वर्षो की कड़ी मेहनत और मशक्कत के बाद आखिरकार उसके सपनो का कालेज बन कर तैयार था | जिसके लिए वो अमित सर और शुभम के सहयोग को सर्वोपरि मानता था | ये अमित सर के ही सहयोग का ही परिणाम था जो उसे बीस शिक्षको की ऐसी टीम मिल चुकी थी जो न केवल हिंदी भाषा में पढाने के इच्छुक हो बल्कि कालेज की शिक्षा व्यवस्था वो सुचारू रूप से चलने में समर्थ हो |
पुलकित ने कालेज के प्रचार में कोई भी कमी नही छोड़ी, देश के इस पहले हिंदी भाषी कालेज ने युवाओ के मध्य काफी चर्चाएँ तो बनायीं परन्तु इतना सब नाकाफी था क्यों की अब भी युवा इस कालेज में प्रवेश लेने हेतु उत्साह नही दिखा रहा था | लेकिन अब किसी भी कीमत पर पुलकित अपने कदम को पीछे नही खीचना चाहता था | और उसके इसी अडिगपन और जुझारूपन का ही परिणाम था कि उसे एक 'नायब' सूझ जान पड़ी कि क्यों न अपने कालेज में पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को बीस हजार रुपए मासिक दिया तथा प्रवेश भी निशुल्क हो | जब मीडिया इत्यादि के माध्यम से पुलकित कि इस योजना ने पाँव पसारे तो इसने न केवल देश के भीतर चर्चा बटोरी बल्कि विदेशो में भी इसने काफी सुर्खियां बटोरी | यहाँ तक कि कुछ मीडिया चैनलों ने इसे एक अनोखी जॉब का तगमा भी दे डाला | लालचवश ही सही परन्तु अब देश का युवा उत्साह अवश्य दिखा रहा था | लेकिन यूँ ही निठल्लो कि फ़ौज़ तैयार करने से क्या फ़ायदा जिसमे न तो काबिलियत हो और न ही कुछ कर गुजरने का जज्बा | इसलिए पुलकित ने कालेज में प्रवेश लेने हेतु एक प्रवेश परीक्षा का आयोजन करवाया | देश में बने एक सकारात्मक माहोल का ही प्रभाव था कि काफी बड़ी संख्याओं में युवाओं ने इस प्रवेश परीक्षा में भाग लिया और जिसमे से कुल पचास छात्रों का चयन पुलकित कि टीम द्वारा किया गया | क्यों कि पुलकित कोचिंग पढ़ा कर इतने अधिक रुपयों को नही कम सकता था कि वो इससे ज्यादा विद्यार्थियों का खर्च वहन कर सके | साथ ही साथ पुलकित ने एक और फैसला भी लिया था कि वो तब तक किसी अन्य छात्रों को प्रवेश नही देगा जब तक कि वो अपने इस अनूठे प्रयोग कि सफलता या असफलता को नही देख लेता | दरसल इन सब चीज़ो के पीछे पुलकित का एक बहुत बड़ा उद्देश्य छुपा हुआ था | वो चाहता था कि लोगो में जागरूकता फैले, वो इस बात को भी समझे कि विज्ञान का सम्बन्ध ज्ञान से होता है न कि भाषा से | उसे पूरी-पूरी उम्मीद थी कि उसके द्वारा शुरू कि गयी ये पहल देश में एक सकारात्मक माहोल बना सकेगी | और शायद तब अन्य भारतीय भाषाओ के भी कालेज खुले और हो सकता है कि तब युवा भी इन कालेज में प्रवेश लेने हेतु उत्साह दिखाए न कि अंग्रेजी भाषी कालेजो में |
पुलकित इस बात से भली-भाँती परचित था कि इन पचास छात्रों कि सफलता या असफलता ही उसके भविष्य का निर्धारण करेगी इसलिए पुलकित ने अपने प्रथम व्याख्यान में युवाओं के हृदय में इस बात कि अलख जगाने कि पुरजोर कोशिश की, कि अपने उद्देश्य से पचित हो सके, वे ये भी समझ सके कि उनका लक्ष्य क्या है, उनका सपना क्या है और सम्भवता वो इस कोशिश में कामयाब भी रहा |
पुलकित का प्रथम व्याख्यान:
समस्त विद्यार्थियों,
उम्मीद करता हूँ कि आप सभी ने यहाँ तक पहुचने के लिए काफी मेहनत कि होगी | मुझे लगता ही कि आप सभी को ये बताने कि कोई जरुरत नही है कि इस कालेज के निर्माण के पीछे मेरा कोई निजी स्वार्थ नही छुपा है...लेकिन उद्देशय तो अवश्य ही है और मुझे लगता है कि आपको भी अपने इस उद्देश्य से परचित करा दिया जाये | लेकिन इन सब बातो से पहले मैं आप से कुछ पूछना चाहता हूँ | और उम्मीद करता हूँ कि आप सब बड़ी ईमानदारी से इसका उत्तर देंगे | मेरा प्रश्न यहां बैठे हर एक विद्यार्थी से है मैं बस इतनी सी बात पूछूंगा कि ये बताएं,'' क्या अंग्रेजी भाषी व्यक्ति किसी अन्य भाषा के ज्ञान को रखने वाले व्यक्ति कि अपेक्षा अधिक बुद्धिमान होता है ?
'नही', सभी ने एक स्वर में जवाब दिया |
तो फिर हम पर ये भाषा जबरदस्ती क्यों थोपी जा रही है | आप जानते है ? आज जापान, रूस, और चीन आदि देशो के शोधार्थी अपने देश कि भाषा में शोध करके डिग्री ले रहे है जब कि इसके विपरीत हम आज भी अंग्रेजो कि भाषा के चक्रव्यूह में फसे हुए है | आप कि जानकारी कि लिए मैं बता दूँ कि अंग्रेजी में मूल शब्द मात्र देश हजार है जब कि हिंदी में ढाई लाख से भी अधिक है | और विश्व में लगभग ११०३ मिलियन लोग हिंदी को बोल सकते है और यहाँ तक कि विदेश में भी हिंदी बोलने और समझने वाले लोग २ करोड़ के करीब है |
आज जहाँ हम अंग्रेजी को सभ्य और उन्नति कि भाषा समझते है वहीँ हम हिंदी को असभ्य और अनपढो कि भाषा समझते है | यहाँ तक हमारे समाज के बहुतेरे माँ-बाप केवल इस वजह से अपने बच्चो को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा रहे है क्यों कि उनमे इस बात कि भ्रान्ति फैली हुई है कि हिंदी भाषा में पढ़ कर उनका बच्चा कभी अपना भविष्य नही बना सकेगा | लेकिन इसका दोषी कौन है ? इसका दोषी है 'हमारा सिस्टम' और हम सब | आज हिंदी भाषा के उत्थान के लिए तो कोई आगे नही आता है लेकिन अंग्रेजी भाषा को जन-साधारण के बीच लोकप्रिय बनने के लिए न जाने कितने कोचिंग, कालेज खुल गए है | दुःख कि बात तो ये है कि हिन्दुस्तान में ही हिंदी का ऐसा अपमान हो रहा है |
हमारे देश कि पहचान हमारे संस्कारो से है, हमारी संस्कृति से है और हमारे प्रभावशाली इतिहास से है | जहाँ सम्पूर्ण विश्व हमरे अभिवादन के तौर-तरीको का दीवाना है वहीँ हम वेस्टर्न तरीको को शामिल किये जा रहे है | जहाँ पहले शिष्य अपने शिक्षको का पैर छू कर उनका अभिवादन करते थे वहीँ आज अधिकांश विद्यार्थी 'गुड मॉर्निंग' और 'गुड आफ्टरनून' प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते है |
काली अँधेरी रात, चारो ओर पसरा सन्नाटा उस पर गरजते बादल 'पुष्पेन्द्र नाथ गौतम' के दिल की धड़कनो को तीव् कर रहे थे | वो मन ही मन में यही बड़बड़ाये जा रहे थे ,''पता नही वो कौन सा बुरा वक़्त था जब मैंने 'वसुंधरा' से शादी की, अजीब बेवकूफ औरत है इतनी रात गए भला कोई अपने पति को घर से बहार भेजता है | अरे! पैसे ही तो चाहियें थे, सुबह दुकान से लाकर दे देता, पता नही रात भर में जैसे दुगना कर देगी, कसम से बेवकूफ है..महा बेवकूफ | जैसे ही बदलो की गड़गड़ाहट तेज होती वैसे ही गौतम जी की साईकिल की रफतार भी तेज होती जाती | गौतम जी तेज रफ़्तार से दुकान की ओर बढ़े जा रहे थे, कि तभी साईकिल की चैन उतर गयी, एक तो इतनी रात ऊपर से काले छाये हुए बादल इस ओर ईशारा कर रहे थे कि कुछ ही देर में बारिश प्रारम्भ होने वाली है | अब और मुसीबत, गौतम जी आगे कि चैन चढ़ाएं तो पिछले पहियें कि चैन उत्तर जाये और पीछे कि चढ़ाये तो अगले पहियें की | एक तो वो पहले से ही इतनी रात गये घर से निकलना नही चाहते थे और ऊपर से साईकिल की चैन ने तो उनका ही चैन ही चैन छीन लिया | उन्होने 'आव देखा न ताव' और सड़क के किनारे की ओर पड़े पत्थर को बेढंगी रूप से साईकिल की चैन के पास मारने लगे| बेचारा उनका क्रोध उन्हे ही ले डूबा अभी चार-पाँच छोटे ही पड़ी थी की साईकिल की चैन ही टूट गयी और उनका सारा क्रोध पसीने की बूंदो के रूप में माथे पर आ गया, दिल में घबराहट सी होने लगी, जब उन्होने अपनी हाथ घडी में समय देखा तो रात्रि के साढ़े ग्यारह बज चुके थे | उन्हे ये विश्वास हो गया की वो किसी भी कीमत पर एक बजे से पहले घर नही पहुँच सकेंगे | अब तो उन्हें उलझन सी हो रही थी, सारा शारीर अकड़ा जा रहा था और मुँह बस यही निकल रहा था,''बेवकूफ औरत है..महा बेवकूफ | मन अनर्गल ही विचारो में मग्न था,''भगवान पत्थर बरसाओ पत्थर, इतने बड़े-बड़े की सर फट जाये मेरा और प्राण निकल जाये तब पता चले उस बेढंगी औरत को कि पति का मूल्य क्या होता है |'' यही सब अनर्गल तथ्य सोचते-सोचते वो मार्केट तक पहुँच गये जहाँ पर उन्होने अपनी किराने कि दुकान खोल रखी थी | मार्केट का चौकीदार वहाँ उपस्थित नही था और ऐसा लगा जैसे मार्केट कि सुरक्षा भगवान के भरोसे ही थी | चौकीदार जसवंत को अनुपस्थित पाकर उनकी बुद्धि और भी ख़राब हो गयी और वो यही बड़बड़ाने लगे ,''कमीना पैसा एक भी नही छोड़ता है, हरामखोरी तो देखो डूयटी भी सही से नही बजता है| कल ही इसको भगाता हूँ |'' उन्होने दुकान के पास ही अपनी साईकिल खड़ी की और जल्दी दिखाते हुए अपनी दुकान का शटर उठया और गोलक में रखे हुए पैसो को बटोरने लगे | उधर चौकीदार जसवंत एक हाथ में चाय का गिलास और बगल में फसे डंडे के साथ मस्त धीमे-धीमे चल से चला आ रहा था उसने जब देखा कि गौतम जी कि दुकान का शटर उठा हुआ है तो उसके तो होश ही उड़ गये | उसने वहीँ चाय के गिलास को फेका और डंडे को अपने हाथो में कस कर जकड़े हुए दुकान के शटर की ओर बढ़ा, तो देखा की कोई व्यक्ति गोलक से पैसो को बीनने में लगा हुआ है | तो चौकीदार ने 'आव देखा न ताव' और तुरंत ही डंडे की बरसात गौतम जी पर कर दी और उनके मुँह से बरबस यही निकला,''मर गया...मार डाला...बचाओ और ये कहते हुए वो वहीँ पर गिर पड़े |'' जब चौकीदार जसवंत ने देखा कि यह कोई चोर-वोर नही बल्कि गौतम जी है तो मानो उसके पैरो के नीचे से जमीं ही खिसक गयी और डंडा उसके हाथ से छूट गया|
(2)
दयाल जोशी कचहरी में दलाल थे, दलालो वाले सरे गुण उनमे विद्यमान थे | उनका कार्य ही कुछ ऐसा था कि लोगो से मेल जोल बनाकर तो रखना ही पड़ता था, पता नही कब कहाँ कोई नया ग्राहक फँस जाये | कभी किसी कार्य के लिए दयाल जोशी से कहा जाये तो न नही होती थी| पक्के बातूनी थे और हमेशा ही लोगो को कोई न कोई ज्ञान बाट ही दिया करते थे | लोगो ने उनकी इसी आदत के कारण उन्हे ज्ञानवाणी कहना शुरू कर दिया था|
मोहल्ले में दयाल जोशी का सबसे अधिक आना जाना गौतम जी के ही यहाँ पर था आखिर हो भी क्यों न दोनों के गुणो में समानता जो थी | जहाँ दयाल जोशी बातो के राजा थे तो वहीँ पर गौतम जी भी कुछ कम न थे, हमेशा ही अपनी जिंदगी के पन्नो को दुसरो को पढ़ाते हुए नजर आते थे | जब दयाल जोशी को पता चला कि चौकीदार ने चोर समझकर गौतम जी को पीट दिया और और लहूलुहान कर दिया तो दयाल जोशी को ये बात समझ में न आयी | वो बस यही सोचने लगे कि आखिर ऐसा कौन सा काम गौतम जी ने कर दिया कि उनके ही चौकीदार ने उन्हें चोर समझ कर पीट दिया |
जब इस घटना कि जानकारी तथा गौतम जी का हाल जानने के लिए वो गौतम जी के घर पहुंचे तो उन्होने देखा कि गौतम जी पलंग पर लेते हुए आराम फरमा रहे है, क्या सर क्या पैर हर जगह पट्टी बंधी हुई है | जैसे ही दयाल जोशी को गौतम जी के लड़के ने देखा तो वो तुरंत ही तेजी से भागकर अंदर कि और चला गया और अपनी माँ वसुन्धरा के पास जाकर धीरे से बोला,'' मम्मी ज्ञानवाणी चाचा आये है |'' ये तो और आये है जले में नमक छिड़कने,''वसुंधरा जी बोली''
दयाल जोशी तेज आवाज में- ''क्या हुआ गौतम साहब |''
गौतम जी- ''अरे! तुम कब आये दयाल, इतना कहकर उठने लगे |''
दयाल बाबू- ''लेते रहो गौतम भाई क्यों तकलीफ दे रहे हो | मैं सुना है कि तुम्हारे चौकीदार ने ही तुम्हे चोर समझकर तुम्हारी पिटाई कर दी क्यों गौतम भाई ऐसा क्या घटित हो गया जो तुम्हारा चौकीदार ही तुम्हे चोर समझ बैठा?''
गौतम जी- ''अब क्या बताये तुम्हे, जिस घर कि औरत ही जिद्दी हो तो ऐसा बंटाधार तो होना स्वाभाविक ही है न..|
दयाल बाबू- ''क्या कहँ रहे हो गौतम भाई, तो ये सब क्या भाभी कि वजह से हुआ है? नही...नही वो तो बड़ी समझदार और सुशील है "
गौतम जी- '' पता है कितनी समझदार है, 'बेवकूफ औरत' अब तुम ही बताओ दयाल बाबू कोई औरत अपने पति को रात ग्यारह बजे घर से बाहर भेजेगी
गौतम जी अपनी पत्नी 'वसुंधरा' कि बुराइयों का बिगुल बजाने में ही मस्त थे कि उतने में ही वसुंधरा जी मीठा और पानी लेकर वहाँ आ पहुंची और पास रखी मेज़ को खिसकाकर मीठा और पानी उस पर रख दिया |
दयाल बाबू- ''बुरा न मानियेगा, एक बात कहते है 'इतनी रात गए अपने पति को घर के बाहर भेजना कोई अच्छे संस्कारो का प्रतीक नही है |'
वसुंधरा जी- ''दयाल भैया आपको पूरी बात तो इन्होने बताई न होगी..?''
दयाल बाबू- ''हाँ गौतम भाई ये तो बताया ही नही कि इतनी रात गये आपको घर से बाहर जाने कि कौन सी जरुरत पड़ गयी?''
गौतम जी- ''अरे इनसे पूछो, दुनियां कि सबसे समझदार महिला, पैसो के आगे पति कहाँ पर टिकता है | सुबह तक का इंतज़ार तो कर नही सकती थी , पता नही जैसे पैसो को दुगना करने कि मशीन लगा रखी है जो रात भर में दुगना कर देगी
दयाल बाबू- ''अरे...अरे, क्यों गुस्सा होते हो गौतम भाई |''
वसुंधरा जी- '' अपनी गलती कौन मानता ही यहाँ पर, तीन दिन से बेचारे दोनों बेटे फीस न जमा होने कि वजह से स्कूल में लज्जित हो रहे थे, परुन्तु इनको कहाँ फर्क पड़ता है , कभी बड़े स्कूल में पढ़े हो तो पता चले वहाँ के नियम कायदे क्या होते है | जब भी पैसा मांगो तो एक ही बहाना,'अरे! वो दुकान में भूल गया, सुबह दे दूंगा |' इनसे पूछो कि कब इनकी सुबह हुई है | तीन दिन से यही बहाना सुन रही थी, क्या करती इतनी रात को दुकान भेजना ही पड़ा |''
दयाल बाबू- ''ये तो गलत बात है गौतम भाई, बच्चो कि पढाई के मामले में तो हर माता पिता को गम्भीर रहना चाहियें | आज इस विज्ञान के युग में शिक्षा से बढ़कर भला क्या है |''
गौतम जी- ''हमें चिंता है दयाल बाबू कोई दिमाग से पैदल नही हूँ | मात्रा १६ साल का ही था जब घर से चला आया, कितनी मुसीबत झेली है ये मेरा ही दिल जनता है | अपने गाँव से जब मैं यहाँ 'कानपुर' आया तो मेरे जेब में मात्र दस रूपए ही थे | आज इस बड़े शहर में मेरा खुद का मकान है हैम अच्छे से जी रहे है, मेरे बच्चे भी अच्छे खासे स्कूल में ही पढ रहे है अगर यूँ ही अकल का तुंद होता कहीं चौराहे पर खड़ा भीख मांग रहा होता |''
दयाल बाबू- ''अरे! गौतम भाई हम आप पर कोई उंगली थोड़े न उठा रहे है, क्या हमें पता नही है आप कितने मेहनती और समझदार है | मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि शायद ही कोई मोहल्ले में होगा जो आपसा मेहनती हो|''
गौतम जी(कुछ देर शांत रहने के बाद)- ''अच्छा, भाई पानी तो पियो |''
दयाल बाबू- ''हाँ...हाँ क्यों नही, तुम भी कुछ मीठा ले लो , वैसे गौतम भाई चोट ज्यादा गहरी तो नही आयी |''
गौतम जी- ''नही...नही कोई भी अंदरूनी चोट नही आयी, वो तो शुक्र है भगवान का जो सर में डंडा नही पड़ा वरना तो लेने के देने पद जाते |''
दयाल बाबू- ''फिर भी गौतम भाई दो-तीन दिन घर पर ही आराम करना |''
और इतना कह कर दयाल बाबू गौतम जी के घर से विदा ले लेते है...!
गौतम जी वसुंधरा से,''तुम यहाँ बैठे क्या कर रही हो जाओ खाना-वाना बनाओ बच्चे भूखे होगे| ये पुलकित और सोमिल आज स्कूल क्यों नही गये? अभी फीस नही जमा कि है क्या?''
वसुंधरा जी- ''क्या तुम्हे नही पता है हम तो आज सारा दिन से घर पर ही है तो फीस कैसे जमा होगी..अब कल ही जमा हो पायेगी |''
(3)
पुलकित और सोमिल भले ही सगे भाई थे परन्तु किसी भी प्रकार से उनमे समानता नही थी | सोमिल पुलकित से यही कुछ तीन साल बड़ा था और इस समय ग्यारह वर्ष कि आयु का था | जहाँ सोमिल रुखा-रुखा सा रहता था वहीँ पुलकित अत्यंत प्रभावशाली था | बाते तो इस प्रकार से करता था कि सुनने वाले का दिल जीत लेता था| मुख मंडल ऐसी चमक थी मानो किसी देवता कि छत्रछाया उस पर हो| जो भी उसे देख ले तो तो उसे बार बार देखने का जी करता था | जहाँ सोमिल खूब पढाई करने के बाद भी परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नही कर पता था वहीँ पुलकित थोडा सा ही पढ़ कर अच्छे नम्बरो से पास हो जाता था | भले ही पुलकित अभी मात्र आठ वर्ष का ही था, परन्तु उसका बौद्धिक ज्ञान किसी भी प्रकार से सोला वर्ष कि आयु के किशोर से कम न था |
(4)
एक बार दयाल बाबू गौतम जी कि दुकान गये तो उन्होने देखा कि पुलकित भी वहाँ पर बैठा हुआ है तो उन्हे ये बात शोभा न दी उन्होने तुरंत ही गौतम जी से पूछा,''गौतम भाई आगे चल कर अपने बच्चे को दुकान ही सौपना है क्या?''
गौतम जी- ''नही..नही दयाल बाबू, ये कोई अच्छा काम थोड़े न है, बड़ी मेहनत है भैया इसमें, अच्छी सरकारी नौकरी पा जाये हमारे बच्चे बस इतनी ही प्रार्थना है भगवान से |''
दयाल बाबू- ''तो फिर अभी से इस पुलकी को दुकान क्यों लेन लगे |''
गौतम जी- ''क्या बताएं दयाल बाबू, सुबह-सुबह ही ये मुझसे जिद करने लगा हैम भी दुकान चलेंगे, अब तुम ही बताओ दयाल बाबू, बालहट के सामने कौन नही नतमष्तक हुआ है |''
दयाल बाबू पुलकित से- '' इधर आओ पुलकी, ये बताओ आज तुम स्कूल क्यों नही गये |''
पुलकित- ''ओह..हो! दयाल अंकल आज रविवार है, क्या अखिल भैया रविवार को भी स्कूल जाते है |''
दयाल बाबू- ''यह मोड़ा बहुत चंट है गौतम, अच्छा पुलकी एक सवाल का जवाब दो,'यदि पैंच पेंसिल दस रुपए कि है तो दस रुपए कि कितनी पेंसिल मिलेगी' अगर तुमने इसका सही जवाब दिया तो मैं अभी तुमको दो टॉफ़ी खिलाऊंगा |
पुलकित- ''ये तो सरल है, आप गोल-गोल घुमा रहे हो, दस रुपए कि पाँच पेंसिल ही तो मिलेगी |''
दयाल बाबू गौतम जी से- ''पुलकी बहुत कुशाग्र बुद्धि का है| इस पर अच्छे से ध्यान दो ये तुम्हारे कुल और प्रदेश का नाम जरुर रोशन करेंगा |''
गौतम जी- ''पता नही, बुद्धि पलटते देर थोड़े न लगाती है |''
दयाल बाबू- ''चलो भैया दो टॉफ़ी दे दो वरना ये मोड़ा तो दिमाग ही चट डालेगा |''
पुलकी- ''नमस्ते अंकल !''
दयाल बाबू- ''अच्छा! बेटा टॉफ़ी मिल गयी तो नमस्ते, अच्छा गौतम भाई निकला जाए कचहरी के लिए देर हो रही है |''
गौतम जी- ''हाँ..हाँ अवश्य , अच्छा भइया नमस्कार |''
इस प्रकार हँसते खेलते हुए ६ वर्ष व्यतीत हो गये भले ही ६ वर्ष बीत चुके थे परन्तु अब पुलकित के स्वभाव में अब भी वैसी ही नम्रता बरक़रार थी| वो न केवल पढाई में तेज दिमाग था बल्कि खेल में भी उसे महारत हासिल थी क्रिकेट तो ऐसे खेलता था मानो जैसे कोई पेशेवर खिलाडी हो | वो अब विचारो से काफी परिपक्व हो चूका था | वो अन्य बच्चो कि भांति न था उसे कहानी, चुटकलों से अच्छा समाचार पत्र पढना लगता था वो बस यही सोचता कि वो जल्दी से बड़ा हो जाये और अपने जीवन को सामाजिक गतिविधियों में लिप्त कर दे | दया और करुणा उसके ह्रदय में गंगा और यमुना कि तरह निवास करती थी उसकी एक खास आदत थी कि वो धुन का बड़ा पक्का था और एक ऐसा इंसान था जो सदा ही आत्म संतुस्टी कि खोज में रहता था | समाचार पढने के शौक को लेकर तो जैसे उसका पूरा मोहल्ला ही परचित था | पुलकी का विद्यालय प्रातः सात बजे का था इसलिए उसने अच्छे से पता करके एक ऐसा पेपर वाला लगवा रखा था जो उसे तड़के पांच से साढ़े पांच बजे तक पेपर पहुंचा सके जिससे वो समय पर विद्यालय पहुँच सके | और जब कभी भी पेपर वाला न आये तो उसके चेहरे पर बेचैनी साफ़ दिखाई पड़ती थी | और वो घर के भीतर बहार चक्कर लगाया करता था कि शायद कोई दूसरा पेपर वाला दिख जाये जिससे वह उसे छुट्टा पैसे दे कर पेपर ले सके | हमेशा कि तरह उसे उस दिन विद्यालय पहुँचने में देर हो जाया करती थी | लेकिन कक्षा का सबसे मेधावी बच्च होने के कारण उसे किसी भी प्रकार का दंड नही मिलाता था | ऐसा वर्ष में ६ या ७ बार ही होता थ
अब तक पुलकित हाईस्कूल कि परीक्षा में प्रवेश कर चुका था तथा उसकी वार्षिक परीक्षा भी काफी नजदीक थी पूरे परिवार को काफी अपेक्षाए थी, सभी लोग उसकी जरुरतो का खास ध्यान रख रहे थे | माँ वसुंधरा ने खेलने कूदने में पाबन्दी लगा दी थी | सोते, उठते और बैठते पुलकित से एक ही बात कहती,''हाईस्कूल है पुलकि अच्छे से परीक्षा देना तुम्हारे हाईस्कूल परीक्षा का परिणाम ही तुम्हारे आगे के भविष्य को निर्धारित करेंगा |''
वसुंधरा जी पुलकित को सुबह चार बजे ही पढने के लिए बैठाल देती थी | पुलकित शुरू से पढने में काफी तेज़ था और निरंतर ही अच्छा प्रदर्शन करता आ रहा था, परन्तु अभी तक उसने अपनी माँ को स्वयं कि पढाई के प्रति इतना चिंतित नही पाया था | जितना कि वह अब देख रहा था | भाई सोमिल जो रात दिन पढने के बावजूद हाईस्कूल कि परीक्षा में द्वितीय श्रेणी को प्राप्त कर पाया था वो भी पुलकित को सदा हाईस्कूल परीक्षा के महत्त्व को बतलाया करता था | वो स्वयं इस समय इंटरमीडिएट में था परन्तु सारी नज़ारे पुलकित पर ही टिकी थी | घर वालो कि बातो और उनके व्यवहार ने पुलकित के मन में असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर दी थी | उसकी तैयारी युद्ध स्तर पर चल रही थी परन्तु फिर भी उसे ऐसा प्रतीत होता की जैसे उसे कुछ तैयार ही नही है |
''ये दिमाग भी बड़ी संवेदनशील वस्तु है | ये भले की मानव के सम्पूर्ण शरीर पर नियंत्रण रखता है परन्तु हैम अपने विचारो और सोचने के तरीके के बल पर इसे नियंत्रित रख सकते है | हमारे आस-पास का माहौल हमारे मष्तिक पर गहरा प्रभाव डालता है | नकारात्मक विचार हमारे मस्तिक की कार्य क्षमता को घटाते है तथा सकारात्मक विचार उसे ऊर्जावान बनाते है |'
''एक बार एक व्यक्ति की आँख में काली पट्टी को बांध कर उसे चूहे से कटवाया गया परन्तु उसे ये बताया की उसे सांप ने काट लिया है तो इसका परिणाम ये हुआ की कुछ ही देर के उपरांत उस व्यक्ति ने अपने प्राणो को ही त्याग दिया | ये घटना हमारे मष्तिक की संवेदनशीलता को प्रकट करने के लिए काफी है | सच में वह मानव चूहे के कटाने से नही बल्कि ह्रदय गति के रुक जाने के कारण से मारा था | यदि हम नकारात्मक माहौल में रहेंगे, नकारात्मक सोचेंगे तो फिर हम कैसे उम्मीद कर सकते है कि हमारे जीवन में सकारात्मक चीज़ो का प्रवेश हो |''
परीक्षाये समाप्ति कि और अग्रसर थी | ये पूरा परीक्षा सत्र जो अपनी पूर्ति कि ओर बढ़ रहा था वो अब तक के सभी परीक्षा सत्रो से भिन्न था | सूरज भी इस तरह ढलता, इस तरह उगता मनो दिन और रात्रि अपने मिलन को बेहद उतावले हो पुलकित के लिए ये समय जिस तरह गुजर रह था वो एक नया एवं विशिस्ट अनुभव था | रात्रि के तीन बजे उठना और सुबह के 6 बजे तक पढना फिर ७:३० से बोर्ड के एग्जाम और उसके बाद दूसरे पेपर कि तैयारी में एक योद्धा कि तरह जुट जाना | इन सब चीज़ो ने उसे बेहद थका दिया था | परीक्षा कोई युद्ध नही होती है ये तो पुलकित भी मनाता था लेकिन घर पर माहौल तो कुछ ऐसा ही था कि उसे युद्ध न मानो तो शायद न्याय न हो | परन्तु इस तरह कि थकाऊ एवं उबाऊ प्रकार कि रुपरेखा को अपनाकर क्या शिक्षा कि रोचकता को जीवन्त रखा जा सकता था?
युद्ध समाप्त हुआ! परन्तु कितने धराशायी हुए और कितने विजय हुए इसका निर्णय आना अभी बाकी था| हाँ इतना अवश्य था कि मंदिरो, मस्जिदो इत्यादि धार्मिक स्थलो पर युवाओं कि संख्या अब बढ़ने लगी थी | शायद धर्म के इन स्थलो पर अब सावन ने दस्तक दे दी थी | नयी-नयी उम्र के लड़के-लडकियां अव्यवहारिक रूप से इन पवित्र स्थलो कि चौखट पर माथे टेकते और हाथ जोड़े हुए दिख ही जाते थे | और इन युवाओ से कुछ वर्ष ही बड़े युवक-युवतियां जो स्वयं भी कभी ऐसे ही सावन में सक्रिय भागीदारी निभा चुके थे वो अब भला कैसे चुटकी लेने से पीछे छूट सकते थे |
लेकिन पुलकित इन सब से अलग था उसकी आत्मा में अभी ऐसे कार्यो के लिए रज़ामंदी नही दी थी | वो अपना वक्त अपने प्रिय खेलो में व्यतीत कर रहा था और उस ऊर्जा को पाने कि जद्दोजहद में था जो फिर से उसे मानसिक मजबूती प्रदान कर सके परन्तु पुलकित ऐसा भी नही था जो ईश्वर द्वारा प्रदत्त इन चौबीस घंटो को खेल-कूद में ही गवां दे | हाँ भले ही उसकी आत्मा धार्मिक स्थलो पर जाने कि अनुमति न प्रदान कर रही हो और बार-बार निजी स्वार्थ का हवाला देकर उसके कदम पीछे खींच रही हो लेकिन कही न कही पुलकित कि इसी आत्मा ने उसे परमात्मा से जुड़ने का सन्देश भी दे ही दिया था| जिसके प्रभाव से ही उसने गीता, रामायण एवं अन्य प्रकार कि धार्मिक पुस्तको के अध्यन में अपनी रूचि बना ली थी तथा ज्ञान के इस अथाह सागर में वो हर रोज़ डुबकी लगाने के लिए उत्सुक भी रहता था |
दैनिक समाचार पत्र इत्यादि के माध्यम से ज्ञात हुआ कि इंटरमीडिएट का रिजल्ट आगामी पन्द्रह जून एवं हाईस्कूल का रिजल्ट दस जून को घोसित किया जायेगा यानि गौतम जी के दोनों बेटो में प्रथम नंबर सोमिल का था | वे एक-एक दिन जो सीढ़ी के जीने के भाती परीक्षा कि तारीख के नजदीक पहुँच रहे थे वो अपने आप में विशेष बनते जा रहे थे| घर कि दीवारो पर एकान्त रूप रूप से टंगे रहने वाले कलेंडरों को भी सम्मान मिलने लगा था तथा गली मोहल्लो में ये जुमला तो आम ही बनता जा रहा था कि यार 'रिजल्ट कब आ रहा है |'
(5)
आज का दिन पुलकित के लिए बड़ा विशेष था क्यों कि आज के दिन ही उसके बड़े भाई सोमिल का रिजल्ट आने वाला था | सोमिल भले ही हाईस्कूल में द्वितीय श्रेणी से पास हुआ था परन्तु इस बार सब यही आशा कर रहे थे कि सोमिल प्रथम श्रेणी से पास होएगा | जीतनी बेचैनी सोमिल को हो रही थी कुछ उतनी ही पुलकित के मन में भाई के परिणाम को लेकर थी | एक-एक मिनट कटना मुश्किल हो रहा था उत्सुकता भी काफी हावी थी| अब तो प्रार्थनाओ का दौर प्रारम्भ हो गया था | माँ वसुंधरा ने सोमिल का परिणाम आने से पहेले उसे भगवान के समक्ष मत्था टेकने को कहा तथा ग्यारह रुपए और नारियल चढ़ाकर प्रभु से स्वयं और अपने बेटे पर दया दृष्टि बनाये रखने कि विनती की |
परिणाम जानने के सोमिल घर से विद्यालय के लिए निकल लिया | दिल बेचैन था, चेहरे का रंग उदा हुआ था, हाथ काँप रहे थे और जबान निरंतर ही प्रभु का नाम जपे जा रही थी | वो शीघ् ही विद्यालय के बाहर था अब तक दिल की धड़कने तीव्र हो चुकी थे मानो और विलम्ब हुआ तो ये शारीर के बाहर ही आ जायेगा| मन में बेचैनी और परिणाम का दर इस कदर छाया था कि सोमिल ने विद्यालय में प्रवेश से पहेले उसके मुंडेर कि धूल को अपने माथे से लगाया |
परन्तु परिणाम चौकाने वाला रहा| सोमिल इंटरमीडिएट कि परीक्षा को पास नही कर पाया था | दिल कि धड़कने मंद पड़ गयी थी, माथे पर पसीना था, कदम काँप रहे थे और मष्तिस्क पुरे शारीर को ढांढस बंधाते हुए कह रहा था कि,''पढाई ही सब कुछ थोड़े न है इसकी इतर भी तो कोई जिंदगी है वो व्यापार कर के भी तो अपने जीवन को संभाल सकता है | क्या पिताजी कोई इंटर पास है, क्या वो अच्छे से नही जी रहे है?''
सोमिल के परिणाम ने तो जैसे गौतम जी के घर पर पत्थर ही बरसा दिए| घर का माहौल बिल्कुल बदला सा था कोई एक-दूसरे से बात नही कर रहा था | भाई के इस परीक्षा फल ने तो पुलकि के मन में भी संका उत्पन्न कर दी कि 'क्या वो हाईस्कूल पास हो पायेगा?'' जब पुष्पेन्द्र नाथ गौतम जी को ये पता चला कि सोमिल फेल हो गया है तो वो एकदम से सोमिल के ऊपर तिलमिला उठे परन्तु वसुंधरा जी ने उसे ये कह कर शांत कर दिया कि इस समय सोमिल पर गुस्सा करना ठीक नही है, कही ऐसा न हो कि कहीं ऐसा वैसा कदम उठा ले कि जिससे हमें सारे जीवन अपने मुँह कि खानी पड़े | अभी कोई जीवन समाप्त थोड़े न हुआ है, दुबारा पढ़ाएंगे अगर मेहनत करेगा तो जरुर पास हो जायेंगा |
गौतम जी- ''दोबारा पढने कि कोई जरुरत नही है | जहाँ मोहल्ले भर के लड़के पास हुए जा रहे है वहीँ हमारे घर के लड़को कि अक्ल तो जैसे घास चरने गयी है | पास हो कर कुछ नही होने वाला कम से कम प्रथम श्रेणी में पास हो तब तो कुछ भला है वरना यूँ ही सारा जीवन भटकते रहेंगे इससे बढियां तो घर के व्यापर में ध्यान दे कम से कम जीवन तो सही ढंग से चलेंगा |
वसुंधरा जी- ''अगर सोमिल पढना चाहता है तो हम उसे जरुर पढ़ाएगे |''
गौतम जी- ''चाहने न चाहने से कुछ नही होता, पढाई के लक्षण भी तो दिखने चाहिए | अब दयाल बाबू के लड़के को ही देखो प्रथम श्रेणी में पास हुआ है...,ये होते है पढने वाले बच्चे |''
वसुंधरा जी आश्चर्य से- '' अखिल प्रथम श्रेणी में पास हुआ है?''
गौतम जी क्रोध में- ''अभी हम कोई बाते बना रहे थे क्या? अब जाओ यहाँ से आराम करने दो ''
वसुंधरा जी वहाँ से उठ कर चली जाती है और सोमिल पास जाकर बैठ जाती है, वहीँ नजदीक में पुलकित भी बैठा हुआ है | वसुंधरा जी एक समझदार महिला थी वो जानती थी कि इस समय सोमिल पर गुस्सा करना अच्छा नही होगा बल्कि ये समय तो उसके मन के अकेले पैन को भरने का है ये वो समय होता है जब छोटी सी बात भी बड़ी चुभन का एहसास देती है इंद्रियां बस में नही होती है मष्तिस्क व्यर्थ ही विचारो में डूबा रहता है और ऐसे में यदि कोई उसके दिल कि व्यथा को समझने वाला मिल जाये तो उसका ये साथ किसी संजीवनी से कम नही होता | तो इस समय कुछ ऐसा ही एहसास दिलाने कि कोशिश में जुटी थी वसुंधरा जी | उनकी इक्षा थी कि सोमिल दुबारा से इंटर में दाखिला ले ले परन्तु सोमिल ने ये कह कर बात को विराम देना चाहा कि अब वो पढ़ना नही चाहता है | पुत्र के मुँह से निकली ये बात वसुंधरा जी को बलकुल नही जचती है और दिल में जमा गुस्से का गुबार फुट पड़ा| उन्होने सोमिल पर चिल्लाते हुए कहा,''अगर पहले पता होता कि तू पढना नही चाहता है तो तुझे पढ़ाती ही न, पैसे का पैसा डूबा ऊपर से पूरे मोहल्ले में नाक कट गयी सो अलग | उसको देखो प्रथम आया है और एक तुम हो जो पास तक नही हो पाये, हिम्मत तो देखो कह रहा है कि पढना नही है | बड़ा गर्व महसूस हो रहा होगा ये बोलकर |''
सोमिल- '' मुझे आगे नही पढना है, मैं दुबारा इंटर नही करना चाहता हूँ |''
पुलकित पास में ही बैठा ये सब सुन रहा था | उसे इस समय माँ का चिल्लाना अच्छा नही लगा और वो बोल पड़ा कि,''क्यों चिल्ला रही हो माँ, जो होना था वो तो हो गया, अभी ये सब कहना जरुरी है क्या?'' वसुंधरा जी नियंतरण में नही थी और पुलकित कि ये बात सुनकर वो उस पर ही भड़क उठी और चेतावनी भरे शब्दो में बोली कि,'' तू मुझे अक्ल न सिखा, अभी कुछ दिन बाद तुम्हारा भी परीक्षाफल आ रहा है, देखते है तुम कौन सा गुल खिलाते हो |'' और इतना कह कर वो बहार वाले कमरे में जाकर तख़त पर लेट गयी | उन्होने ने महसूस किया कि वो व्यर्थ ही इतना सब बोल गयी बल्कि ऐसी कोई आवश्यकता नही थी |
'वो कभी-कभी इंसान मानसिक रूप से इतना भारीपन महसूस करने लगता है कि यदि एक बार जबान कि लगाम छूट जाये तो फिर उस नियंत्रण करना लगभग असम्भव हो जाता है | तो कुछ ऐसी ही स्थित वसुंधर जी कि भी थी |
सोमिल के बाद अब नम्बर गौतम जी के छोटे बेटे पुलकित के रिजल्ट का था जहाँ सोमिल के रिजल्ट ने सबको निराशा के दरिया में धकेल कर रख दिया था वहीँ सब यही आशा भी कर रहे थे कि पुलकित अवश्य ही अच्छे नम्बरो से पास होएगा| उम्मीदे पूरी भी हुई परन्तु वो छात्र जो हमेशा ही कक्षा का सर्वश्रेस्थ छात्र चुना जाता था उसे आज केवल प्रथम श्रेणी से ही संतुष्ट होना पड़ा था| हाला कि उसका प्रथम आना घर वालो के लिए तो हर्ष का विषय अवश्य था परन्तु ये पुलकित और उसके गुरजनो के लिए तो चौकाने वाला रहा था| वो भले ही ७०% नम्बरो से पास हुआ था| परन्तु पुलकित कि मेहनत को देखते हुए ये काफी कम था उसे उस प्रकार का परीक्षाफल नही मिला था जिसकी वो स्वं से अपेक्षा कर रहा था| बल्कि उससे कोशो दूर रहने वाले छात्र आज उससे अधिक नम्बरो से पास हुए थे| हाँ ये सर्वथा सत्य है कि मेहनत का कोई दूसरा विकल्प नही है, परन्तु केवल कड़ी मेहनत ही सफलता कि गारंटी नही हो सकती| बल्कि मायने ये रखता है कि हमारी मेहनत सही दिशा और योजना में हो रही है या नही| अगर किसी कार्य को करने में आनंद नही आ रहा है तो ये कैसे मान लिया जाये कि उसका फल आपको आनंदित करेंगे| पुलकित के परीक्षाफल ने उसे इस बात का एहसास करा दिया था कि उसने बेवजह ही इस परीक्षा को एक युद्ध कि भाति लिया था अगर उसने इसे अन्य परीक्षा कि तरह ही समझा होता तो शायद आज वो पुन से कक्षा का सर्व्श्रेस्थ छात्र घोसित होता|
पुलकित के प्रथम आने कि खुशी घर के सभी सदस्यों को थी परन्तु गौतम जी कि खुशी तो देखते ही बनती थी| उन्हे अपने छोटे बेटे पर बेहद गर्व हो रहा था और इसी खुशी में उन्होने लगभग पांच किलो लड्डू पुरे मोहल्ले में बटवा दिए थे| लेकिन पिता जी कि इतनी ख़ुशी पुलकित को कही से भी जँच नही रही थी उसे लग रहा था कि पिता जी व्यर्थ में ही इतना खुश हो रहे है| उसे खुद में बड़ा ही दुःख हो रहा था कि हर बार कि तरह ही वो इस बार सर्व्श्रेस्थ छात्र नही बन पाया| वो इस समय एक घायल शेर कि भांति था और अपनी सारी कसर आगे कि पढाई में निकलना चाहता था| उसके भाई सोमिल ने पुन से उसे ये कह कर डराया कि,''देखो पुलकि, तुम भले ही हाईस्कूल प्रथम श्रेणी से पास हो गये हो लेकिन मेरी एक बात जरुर ध्यान रखना कि इंटर और हाईस्कूल में जमीं आसमान का फर्क है, इसको कतई हल्के में न लेने मेरा परिणाम तो तुम देख ही चुके हो| बस इंटर और प्रथम श्रेणी से पास हो जाओ बाँकी आगे तो मज़ा ही मज़ा है|''
अभी १५ दिन ही बीते थे परन्तु पुलकित ने कक्षा ग्यारह कि पढाई को प्रारम्भ कर दिया था| वो नही चाहता था कि आगे कि पढाई किसी दर और नकारात्मक विचारो के साथ हो परिणाम स्वरुप उसने अपने आगे कि पढाई बिना किसी भय और सकारात्मक विचारो के साथ प्रारम्भ कि अब उसमे आत्मविश्वास भी पहेले से बढ़ा था| अब न केवल उसे पढ़ने में आनंद आने लगा था बल्कि उसकी स्मरण शक्ति में भी गजब का इजाफा हुआ था| एकाग्रता बढ़ी थी हर पल को आन्नद के साथ जीने कि चाहत सी उत्पन्न हो गयी थी| मष्तिस्क में बने इस सकारात्मक माहौल का प्रभाव ये हुआ कि कक्षा ११ में उसने पूरे स्कूल में टॉप किया| और विद्यालय कि योजना के अनुसार उसकी इंटरमीडिएट परीक्षा कि पढ़ाई मुफ्त हो गयी | बेटे कि इस सफलता ने घर वालो के दिल में आशा कि एक लौ जला दी थी अब सभी लोग उसका बेहद ध्यान रखने लगे थे घर का कोई भी सदस्य उसे रत्ती भर कार्य भी नही सौपता था | घर वालो का ये व्यवहार पुलकि को बिल्कुल भी नही पसंद नही था उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो वो घर का राजा हो और बाकि सब उसकी प्रजा |
इंटरमीडिएट कि पढाई को पुलकित हाईस्कूल कि तरह बिल्कुल भी ले रहा था | वह हर छण इसी कोशिश में था कि वह अपने दिमाग में किसी भी प्रकार से इंटर का भूत न चढ़ने दे जिससे पढाई कि रोचकता और आकर्षण दोनों बरक़रार रहे | हर विषय को पढ़ने का तरीका उसने कुछ इस प्रकार का बना रखा था कि अब किताबे उसे आनंदित करती थी, शायद ये सब सकारात्मक माहोल का ही प्रभाव था जो परीक्षा तिथि घोषित होने के बाद भी वो बिल्कुल मस्त था | कार्य में निरंतरता पूर्वता ही बरक़रार थी | सब कुछ सामान्य था तथा पुलकित का मानसिक माहोल कुछ इस प्रकार का बन चुका था कि ये परीक्षा अब युध न होकर अब एक आनंद का सफ़र बन चुकी थी जिसका पुलकित पूरी ईमानदारी के साथ स्वागत को बेक़रार था |
देखते ही देखते इंटरमीडिएट कि परीक्षा भी प्रारम्भ हो गयी | वसुंधरा जी कि भगवान पर गहरी आस्था थी वो सब कुछ भूल सकती थी परन्तु किसी भी तरह ये अवश्य ध्यान रखती थी कि पुलकित रोली-तिलक लगाकर पेपर देने अवश्य जाये | पुलकित लगभग १०-१२ सालो से ये सब देख रहा था परन्तु उसने कभी भी अपनी माँ से इस बारे में नही पूछा था लेकिन उसे मन ही मन बुरा भी लगता था कि हम हर कार्य को भगवान को ही क्यों सौप देते है? पुलकित कि भी भगवान पर गहरी आस्था थी परन्तु उसकी नज़र में भगवान कोई जिन्न नही थे जिन्हे केवल जरुरत के समय ही याद किया जाये बल्कि उसका मानना था कि ईश्वर तो एक शक्ति है जो हर सजीव और निर्जीव में निवास करती है बस जरुरत है तो उस शक्ति को पहचाने कि | तिलक लगाने, माला जपने से कुछ नही होता बस जरुरत है तो हर व्यक्ति का अपनी आत्मा को संतुस्ट एवं पवित्र रखना | जब पुलकित ने इस बारे में माँ 'वसुंधरा' से पूछा तो उन्होने ये कह कर बात को विराम दे दिया कि ये तिलक भगवान का आशीर्वाद है जो तुम्हारी रक्षा करेगा | माँ के दिए गये इस जवाब के बाद पुलकित को कोई और सवाल करने कि इच्छा न हुई |
(७)
अब तक इंटरमीडिएट कि परीक्षाये समाप्त हो चुकी थी | उम्मीदानुसार उसके सभी पेपर अच्छे ही बीते थे | घर के सभी सदस्यों को उसके रिजल्ट को लेकर उत्सुकता बनी हुई थी | इस बात कि बेहद उम्मीद थी कि पुलकित फिर से प्रथम आएगा | अक्सर ही घर पर ये बाते उठती थी कि पुलकि को आगे क्या करवाया जाये | भाई सोमिल तो यही चाहता था कि पुलकि आगे चल कर एक बड़ा इंजिनियर बने जब कि पुलकि कि माँ उसे एक बड़ा सरकारी अफसर बनते हुए देखना चाहती थी | ऐसी ही कुछ इक्षा 'पुस्पेंद्र नाथ गौतम' जी कि भी थी | जब कि इन सब बातो से अनजान पुलकित तो बस एक अच्छा अध्यापक बनना चाहता था | इंटरमीडिएट कि परीक्षा को समाप्त हुए अभी कुछ दिन ही बीते थे कि अब उसे एक और परीक्षा कि तैयारी के लिए जुट जाना था | यह इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश कि परीक्षा थी जिसका फॉर्म पुलकित ने घर वालो कि इच्छा का सम्मान करते हुए डाला था | पुलकित के भाई कि तो ये दिली ख्वाहिस है कि पुलकित इस प्रवेश परीक्षा को किसी भी तरह से पास कर ले परन्तु इस समय पुलकित के रवैये को देख कर सोमिल को कहीं से भी ऐसा प्रतीत होता नही दिख रहा है कि वो इस प्रवेश परीक्षा को लेकर ज्यादा गम्भीर है |
सन्धया का समय, सूरज वृक्षो के पीछे छिपने को बेताब है, पछी रास्ता भटकने के डर से झुण्ड बनाकर घरो को लौट रहे है और पुलकित चटाई में आसमान कि ओर सर करके लेता हुआ उनकी गिनती करने में लगा हुआ है | वो कल्पनाओ के समंदर में डुबकी लगाने वाला ही होता है कि उसका भाई सोमिल आ जाता है | सोमिल पुलकित से- ''ऊपर क्या कर रहे हो?''
पुलकित- '' कुछ नही, बस यूँ ही लेते थे |''
सोमिल कुछ कहता कि उससे पहले ही पुलकित सोमिल से- ''भैया ये शाम का वक्त भी कितना अजीब सा होता है न मन करता है कि बस आसमान कि ओर ही देखते रहे | भगवन ने इन पंक्षियों को उड़ने के लिए खुला आस्मां तो दिया है लेकिन कहीं न सन्धया को भी बनाया है जो उनको इशारो ही इशारो में ये सूचित करती है कि तुम्हारा परम मित्र रवि अब थक चूका है और वो अपनी आँखों को बंद करने के लिए बेताब है और मानो घरो से सूरज कि किरणो का जाता हुआ प्रकाश उनको अपने-अपने घरो को लौट जाने का सन्देश....
पुलकित अपने बात को पूरी करता कि उससे पहले ही सोमिल उसकी वाणी को विराम देता हुआ बोलता है- ''यह समय कल्पनाओं के समंदर में गोते लगाने का नही तुम्हे पता है कि कुछ दिन बाद में ही तुम्हारी इंजीनियरिंग कि प्रवेश परीक्षा लगी हुई है | लेकिन मुझे कहीं से भी ऐसा प्रतीत नही हो रहा है कि तुम इसके लिए थोडा सा भी गम्भीर हो | कुछ दिन कि ही तो बात है अच्छे से पढाई कर कहीं अगर ये परीक्षा अच्छी रैंक से पास हो गये तो तुम्हे इस बात का अंदाज़ा भी नही है कि आगे का सफ़र कितना आसान हो जायेगा |''
...भाई के मुख से ये बात सुन कर पुलकि कि स्थिति उस कवि के समान थी कि जिसने अचानक ही किसी सुन्दर पंक्ति कि रचना कर दी हो परन्तु उसके पास उसे नोट करने के लिए कोई कलम न हो |
पुलकित भाई कि इस सलाह के जवाब में चुप रहना ही बेहतर समझता है |
सोमिल- ''क्या सोच रहे हो? क्या तुम्हे पेपर देने का मन नही है?''
पुलकित- ''मन तो है, लेकिन...''
सोमिल- ''लेकिन क्या..?''
पुलकित- ''नही कुछ नही |''
सोमिल- ''ऐसे-कैसे कुछ नही |''
पुलकित झल्लाते हुए- ''अरे! पेपर ही तो देना है, बोल तो रहे है पेपर देंगे, और कैसे कहे |''
सोमिल- ''अच्छा.., बहुत घमंड आ गया है न तुम्हे | अरे! जब रावण का घमंड न चला तो तुम क्या चीज़ हो |''
पुलकित- ''..अब पता नही इसमे घमंड कि बात कहाँ से आ गयी |''
सोमिल- ''...कहाँ से आ गयी...वो हम देख रहे है कि जब से तुम हाईस्कूल में प्रथम आ गये हो तब से तुम्हारे दिमाग ज्यादा ही ख़राब है |''
पुलकित अपने सर को दायीं ओर घुमाते हुए- ''ठीक है.."
उनका वार्तालाप खिचता ही जा रहा था और पुलकित हर बार यूँही जवाब दिए जा रहा था मानो उसको इस बात का पता हो जैसे वो स्वयं में कुछ गलत नही कर रहा हो | वो इंजिनियर नही बनना चाहता था लेकिन अभी तक उसने अपने इस फैसले को किसी के सामने जाहिर नही किया था | वहीं सोमिल अपने शब्दो को विराम नही दे रहा था अतः पुलकित ने वहाँ से उठ कर जाना ही बेहतर समझा और छत से निचे उतर कर बहार वाले कमरे में जाकर तख़्त पर लेट गया |
पल्कित का ये व्यवहार सोमिल को अपने चहरे पर किसी तमाचे से कम नही लगा और वो भी झल्लाता हुआ सीधे माँ वसुंधरा के पास पहुँच गया और लगभग चिल्लाते हुए बोला,''आज-कल इस पुलकि के दिमाग कितने ख़राब हो गये है, सीधे मुँह तो बात ही नही करता है, चार दिन बाद पेपर है लेकिन महाशय सारा समय आराम ही करते है |''
माँ वसुंधरा गुस्से से,''ये है कहाँ?''
सोमिल- ''देखो यही-कहीं आराम फरमा रहा होगा |''
वसुंधरा जी आँगन से बहार वाले कमरे कि ओर बढ़ती है तो वो पाती है कि पुलकित बहार वाले कमरे में तखत पर आराम से लेता हुआ है |
वसुंधरा जी पुलकित से- '' क्यों तुम्हे चिंता नही है जरा सी भी, अभी चार दिन बाद पेपर लगा हुआ है और तुम यहाँ पर आराम से लेते हुए हो?''
पुलकित उठ कर तो बैठ जाता है परन्तु माँ कि इस बात का कोई जवाब नही देता है | पुलकित के चहरे का रंग वसुंधरा जी को ये सूचित करने के लिए काफी था कि मानो पुलकित कुछ छुपा रहा हो | वसुंधरा जी वहीँ पुलकि के बगल में बैठ जाती है और पुलिकी के सर में हाथ फेरते हुए कहती है कि,''क्या..? बात क्या है आखिर, क्यों पढाई नही कर रहे हो ?'' स्नेह पूर्वक पूछे गये इस सवाल के जवाब में पुलकित अपने दिल कि बात को छुपा नही पता है और अपनी माँ से कह ही देता है कि वो इंजिनियर बनना नही चाहता है | लेकिन क्यों के सवाल में वो अपनी नजरो को नीचे कर के खामोश ही रहता है | वसुंधरा जी कुछ देर तो शांत रहती है लेकिन पुनः से,'' मेरी बात का जवाब तो दो पुलकि, आखिर क्या कारण है जो तुम इंजिनियर नही बनना नही चाहते हो?''
पुलकि- ''माँ मुझे इंजीनियरिंग में लगाव नही है | मैं शुरुआत से ही एक अध्यापक बनना चाहता हूँ |''
वसुंधरा जी दबी हुई आवाज में- ''यानि, तुमने सोच ही लिया है कि तू अपने माँ और बापू को ६-७ साल यूँ ही और रगड़ने देगा, तुम्हे पता है तुम्हारे पिताजी जब सोलह साल के थे तब से कमा रहे है | उनका शरीर अब थक आया है अब वो भी आराम करना चाहते है | अब व्यापार में इतनी कमाई नही बची है लेकिन लगता है हमारी किस्मत में तो सब बंजर ही है |
पुलकित- ''लेकिन, माँ तुम भी तो मुझे सरकारी नौकरी करते हुए देखना चाहती थी..!''
वसुंधरा जी- '' अभी भी चाहती हूँ लेकिन हर व्यक्ति को अपने जीवन में थोडा बहुत टेक्निकल तो होना ही चाहियें | अब कोई पक्का थोडा न है कि तुम एक सरकारी नौकर बन ही जाओ, ये तो किस्मत कि बात है अब मान लो तुम्हारी किस्मत ने साथ न दिया तो फिर क्या करोगे...केवल हाथ मलते ही रह जाओगे | और उस वक़्त यही सोचोगे कि काश मेरे पास इंजीनियरिंग कि डिग्री होती तो मैं यूँ ही बेकार न घूम रहा होता | बेटा, मैंने तुमसे ज्यादा जिंदगी देखी है इसलिए ही तो तुम्हे सलाह दे रही हूँ कि इस मौके को हाथ से न जाने दो |
पुलकित- ''लेकिन, माँ अगर एक बार मैंने इस क्षेत्र में कदम रख दिया तो सरकारी नौकरी का ख्वाब तो ख्वाब ही रह जायेगा |
वसुंधरा जी- ''तुम्हे कुछ मालूम भी है...पता है दयाल बाबू का लड़का सरकारी नौकर बन गया है | अभी दो साल भी नही हुए थे उसे इंजीनियरिंग करते हुए लेकिन हुनर तो देखो उसका अच्छा ख़ासा बैंक में नौकरी लग गयी |''
पुलकित माँ के इस उदाहरण के समक्ष निशब्द था |
वसुंधरा जी- ''क्या सोच रहे हो? तुम क्या उससे कोई कम हो...बोलो आज से अच्छे से तैयारी करोगे न...बोलो?''
पुलकित साँसों को अंदर खीचते हुए बड़े विश्वास के साथ कहता है,''हाँ..बिलकुल, जरुर..!''
यह शब्द पुलकित ने इस तरह बोले मानो उसे प्रकति से कोई ऊर्जा मिल गयी हो जिसने उसकी मस्तिस्क कि प्रवृति को बदल कर रख दिया हो और अचानक से उसका रुझान इंजीनियरिंग कि और बढ़ा दिया हो |
आज पुलकित कि इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का पेपर है | पुलकित खुद को काफी दबाव में महसूस कर रहा है और हो भी क्यों न आखिर कार उसने अपनी माँ से इंजीनियरिंग बनने का वादा जो किया है | संभवता इतना दबाव उसे इंटरमीडिएट कि परीक्षा को देते हुए ना रहा होगा | परन्तु इतने अधिक दबाव के बावजूद वो अपने दिमाग में नकारात्मक विचारो को हावी होने नही दे रहा है शायद ईश्वर भी आज उसके साथ में था तभी तो प्रश्नपत्र उसकी उम्मीद से काफी सरल आया, अतः उसे इसको हल करने में कोई विशेष परेशानी ना हुई | परीक्षा केंद्र से निकलते समय ही उसको यकीं हो गया था कि वो अवश्य ही एक अच्छी रैंक के साथ पास होगा | रास्ते में जाम आदि में फसे रहने के कारण पुलकित घर पहुचने में काफी देर हो गयी और जब उसने घर कि दहलीज़ के पार कदम रखा तो उसने देखा कि घर का दृश्य ऐसा था मानो कोई भूखा शेर अपने शिकार के इंतज़ार में बैठा हो | पुलकित परीक्षा को देकर रात आठ बजे घर पर पहुँच था अतः इस समय उसके पिता का उपस्थित होना भी लाज़मी ही था | पुलकित ने जैसे ही कक्ष में प्रवेश किया तो सबके मुँह से एक साथ यही निकल पड़ा कि 'पुलकित पेपर कैसा हुआ' परन्तु किसी ने देर से आने का कारण जानना जरुरी ना समझा, अंततः गौतम जी पुलकित से पूछ ही बैठे कि इंतनी देर कैसे हो गयी |'' पुलकित भी जवाब देते हुए बोला,''पिताजी..,वो रास्ते में जाम लग गया था इस लिए आने में देर हो गयी |''
गौतम जी- ''ठीक है, अच्छा अब जाओ और हाथ पैर धोलो और कहना खा लो जाकर | और हाँ, अब जल्दी सो जाया करो यही कुछ समय ही बचा है आराम करने का और फिर आगे कि पढाई प्रारम्भ हो जायेगी |''
पुलकित दबे स्वर में- ''ठीक है..!''
थका हुआ पुलकित जल्दी से खाना खता है और वहीँ तखत पर बिस्तर को लगा कर सो जाता है |
दैनिक समाचार पत्र कि एक हैडिंग ने सिथिल पड़ चुके माहोल में बिजली से एक तेजी ला दी | आखिर ऐसा हो भी क्यों न जब पुलकित कि इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के परिणाम कि तिथि घोसित हो गयी हो शायद ही ऐसा कोई दिन बीत रहा हो जब भाई सोमिल, पुलकित से ये न पूछे कि 'पास तो हो जाओगे न...तुम्हे क्या लगता है?'' और पुलकित भी रोज़ कि तरह नजरे चुराता हुआ निरुत्तर ही रहता है |
रिजल्ट के दिन के चार-पाँच दिन पहले का समय वो समय होता है जब न चाहते हुए भी नकारात्मक प्रकार के विचार हिचकोले लेने लगते है, 'अगर न....?' जैसे प्रश्न बेवजह ही मस्तिष्क कि परिक्रमा करते रहते है | परन्तु ये मानव कि प्रकति है, ऐसे समय में बड़ा से बड़ा आत्मविश्वाशी अनंत लोक में विराजमान उस अदभुत शक्ति से खुद के भाग्य पर दया दृष्टि बनाये रखने कि विनती करता है, जिससे आज पुलकि भी अछूता नही है |
(7)
आज पुलकि के इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का परिणाम आने वाला है | अन्य दिनों कि अपेक्षा वसुंधरा जी ने आज प्रातः सात बजे तक ही दैनिक कार्यो को निपटाकर रसोईघर में प्रवेश कर लिया है | उनका दिल बारम्बार प्रभु से विनती करने में लगा हुआ है कि बस 'पुलकि किसी तरह अच्छी रैंक से पास हो जाये ताकि उसे बढियां कॉलेज मिल सके |' परन्तु वहीँ पर पुलकित निश्चिंत होकर अपने बिस्तर पर सो रहा है जब कि कल ही सोमिल ने उसे इस बात कि सूचना दे दी थी | हाँ भले ही पुलकित अब इंजीनियरिंग करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गया था परन्तु अभी भी उसके दिल ने दिमाग के द्वारा लिए गये इस फैसले को स्वीकारा नही था | शायद यही कारण था कि पुलकित आज रिजल्ट के दिन भी आराम से सो रहा था | जब कि ऐसा कम ही होता है कि अपने रिजल्ट के दिन कोई विद्यार्थी प्रातः जल्दी न उठा हो | वसुंधरा जी आवाज लगाती है.''पुलकि...पुलकि...पुलकि |''
कुछ देर बाद पुलकित- ''हाँ..क्या है?''
इतने में ही सोमिल रसोई घर में आ जाता है |
वसुंधरा जी पुलकित से- ''आठ बजने वाले है, सोते ही रहोगे क्या? अरे, आज तो जल्दी उठो तुम्हारा रिजल्ट आ रहा है तुम्हे चिंता नही है क्या?''
पुलकित नींद से जगता हुआ- ''रिजल्ट...|''
पुलकित के इस प्रकार के शब्दो को सुनकर भाई सोमिल माँ वसुंधरा से- ''देखो...देखो ऐसे बोल रहा है मनो इसको होश ही न हो कि इसका आज रिजल्ट निकल रहा है |''
वसुंधरा जी तेज आवाज में पुलकित से- ''अभी तुम्हारी आँखे नही खुली है क्या?''
पुलकित- उफ़ हो ...!''
इतना कह कर पुलकि बिस्त्तर से उठ जाता है और बहार वाले कमरे में जाकर समाचार पत्र को पढने लगता है |
वसुंधरा जी सोमिल से- ''रिजल्ट कितने बजे तक आ जायेगा |''
सोमिल- ''आ जायेगा, क्यों परेशान हो |''
वसुंधरा जी बिगड़ते हुए- ''अरे, क्यों न परेशान होऊं पैसा लगता है पढाई में..|''
सोमिल- ''पता नही कहाँ कि बात कहाँ ले जा रही हो, हमने तो ये नही बोला कि पैसा नही लगता है...., दोपहर १२ बजे तक रिजल्ट आ जाएगा |
कुछ देर तक दोनों शांत रहते है कि तभी वसुंधरा जी सोमिल से कहती है कि,''लगता ही ये पुलकि अभी तक उठा नही है, जरा बगल वाले कमरे में झांक कर तो देखो |''
सोमिल कमरे में झांकते हुए- ''अरे, यहाँ पर नही है, बहार वाले कमरे में होंगे महाशय, अभी उठे है पेपर पढ़ेंगे, फिर कहीं आगे कुछ काम होगा, रिजल्ट कि चिंता ही कहाँ है इन्हे, इन्हे तो बस दुनियादारी कि फिकर है |
वसुंधरा जी- ''जाओ देखो तो जाकर ये पेपर पढ़ रहा है या सो ही गया है |''
सोमिल- ''सो रहा हो तो सो रहा हो, अब कोई जगाता थोड़े न फिरेगा इनको |''
कुछ समय बाद वसुंधरा जी सोमिल से- ''क्यों सोमिल अगर पुलकि अच्छी रैंक से पास हो गया तो फिर आगे क्या-क्या होगा ?''
सोमिल- ''अरे, जितनी अच्छी रैंक आएगी उतना अच्छा कॉलेज मिलेगा और अगर ख़राब रैंक आयी तो फिर क्या फायदा आज कल अच्छे कॉलेज कि ही बकत है वरना..|''
वसुंधरा जी- ''ये तो पता है, पर पढाई किस चीज़ कि है इसमे ?''
सोमिल- ''पढना क्या है..? ये तो लड़के कि इक्षा पर ही निर्भर करता है., कोई मकैनिकल पाठ्यक्रम चुनता है तो कोई कुछ और, वैसे अगर पुलकि को टेक्सटाइल मिल जाये तो बढियां ही है शहर में ही अच्छी खासी नौकरी मिल जाएँगी |''
वसुंधरा जी दबी हुई आवाज में - ''अब देखो क्या होता है ?''
कुछ ही देर में पुलकि भी रसोईघर में आ जाता है |
वसुंधरा जी- ''अब दिन हुआ है तुम्हारा |''
पुलकित कुछ देर शांत रहने के बाद- ''अच्छा, क्या बनाया है ?''
वसुंधरा जी- ''कुछ नही |''
पुलकित नाराज होकर रसोईघर से निकल जाता है और बहार वाले कमरे में जाकर बैठ जाता है |
थोड़ी देर बाद...
वसुंधरा जी- ''पुलकि...पुलकि...|''
पुलकि कुछ देर तो अनसुना करता है परन्तु फिर तेज आवाज में कहता है,''अब क्यों चिल्ला रही हो |''
वसुंधरा जी- ''चुपचाप से यहाँ पर आ जाओ |''
पुलकित कोई भी जवाब नही देता है...!
वसुंधरा जी- ''सुनाई नही दे रहा है, हमने क्या कहा तुमसे |''
पुलकि तेज आवाज में- ''नही पड़ रहा है..!''
वसुंधरा जी- ''पुलकि, हमें बार-बार न चिल्लाना पड़े, जल्दी से आ जाओ |''
पुलकि कुछ देर तो शांत बैठा रहता है लेकिन फिर रसोई जाने में ही भलाई समझता है और रसोई से नाश्ते कि प्लेट को लेकर आ जाता है | नाश्ता करने के बाद पुलकित पुनः से समाचार पत्र को पढ़ने लग जाता है | अब उसके मन में भी रिजल्ट को लेकर उत्सुकता जागने लगती है | एक छण जब वो घडी में देखता है तो उसे पता चलता है कि साढ़े दस बज चुके है | उन ही विचारो के साये में उछल-कूद करते-करते कब घडी में बारह बज जाते है पता ही नही चलता है | थोड़ी देर में ही वसुंधरा जी भी कमरे में आ जाती है और पुलकि के सर में हाथ रखकर कहती है,''पुलकि बारह बज गये है...!''
पुलकि- ''हाँ..हाँ पता है कोई सो थोड़े न रहे थे |''
वसुंधरा जी- ''अब जाओ देखो जाकर, पास हुए कि नही |''
पुलकि तखत से उठता है और रिजल्ट देखने जाने के लिए घर के मुख्य द्वार कि ओर बढ़ता है तो वो देखता है कि भाई सोमिल घर के मुख्य द्वार से भीतर कि ओर प्रवेश कर रहा है | सोमिल पुलकि से,''कहाँ जा रहे हो..?''
पुल्कित- ''रिजल्ट देखने जा रहे है !''
सोमिल दबी हुई आवाज में- ''रिजल्ट हम देख आयें है |''
पुलकि उत्तेजित भाव से- ''क्या हुआ ?''
सोमिल- ''माँ के पास चलो फिर बताएं !''
अब पुल्कित के ह्रदय में धक् सी मचती है, चेहरा मानो पीला सा पड़ गया हो, होंठ एकदम सूख गये हो, हाथ काँप रहे हो | ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्यों कि सोमिल के चेहरे कि मौन भाषा पुलकित को कुछ अनिष्ट घटित होने कि सूचना दे रहे थी | ह्रदय में बस यही बात चल रहे थी कि माँ क्या हाल होगा ? और जवान बस यही बड़बड़ाये जा रही थी,'बताओ तो भैया, क्या हुआ..? पास है कि नही !''
लेकिन सोमिल भी ये कह कर उसका इंतजार बढ़ा रहा था कि,''माँ के पास तो चलो अभी सब कुछ पता चल जायेगा |''
रसोई घर के बगल वाले कमरे में माँ वसुंधरा ख्यालो के वायुयान में बैठ कर सैर कर रही होती है कि तभी सोमिल और पुलकि कमरे में प्रवेश कर जाती है |
सोमिल माँ वसुंधरा से- ''माँ मिठाई का भोग-वोग लगाओ पुलकि ने अच्छी रैंक से परीक्षा पास कर ली है..|''
पुलकि ने जब इतना सुना तो तब जाकर उसे गहरा सुकून मिला | इस समय उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसने सारा जग जीत लिया हो |
आज घर के सभी सदस्यों के चेहरो पर मीठी-मीठी मुस्कान थी | मनो घर पर वसंत ऋतु का आगमन हो गया हो कोई भी इस सुखद चन को गवाना नही चाहता था | माँ वसुंधरा जी ने भी तरह-तरह के पकवान को बनाकर अपनी खुसी को जाहिर किया | घर का खुशनमा माहोल कुछ ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पुलकित स्वयं में गर्व किये बिना नही रह सका उसे इस बात कि बेहद खुशी थी कि कम से कम वो अपने रिजल्ट के माध्यम से अपने परिवार के चेहरे पर मुस्कान ला सका | अब तो पुरे परिवार कि नजर पुलकित के इंटरमीडिएट के रिजल्ट पर टिकी थी | इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा को तो वो फतह कर ही चुका था और अब बारी इंटरमीडिएट कि थी | अब विश्वास, यकीं में बदलता जा रहा था और घर के सभी सदस्यों को पूरा भरोसा था कि पुलकित जरुर ही इंटरमीडिएट कि परीक्षा में प्रथम आएगा |
(9)
आज तो सोने पर सुहागा हो गया पुलकित ने न केवल अपने विद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्त किये थे बल्कि पुरे प्रदेश में भी सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी भी वही था | कमाल कि बात तो ये थी कि उसने गणित, रसायन, भौतिक तीनो में ही शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे | आज तो चारो ओर बस पुलकित के नाम का ही डंका बज रहा था | पुलकित कि आँखे तब ख़ुशी के मरे सजल हो उठी जब संध्या के समय भाई सोमिल ने पीठ को थपथपाते हुए न केवल उसकी प्रसंशा कि बल्कि उपहार स्वरुप उसे एक हाथ घड़ी भी भेंट की |
अब तक परीक्षाओं के रिजल्ट का दौर बीत चुका था और पढाई का नया सत्र प्रारम्भ होने वाला था | तथा अब तक पुलकित की काउंसिलिंग प्रक्रिया भी समाप्त हो चुकी थी | और उम्मीदानुसार उसे अपने शहर में ही बढियां कॉलेज मिल गया | घर वालो के इच्छा के अनुरूप उसने टेक्सटाइल पाठ्यक्रम को चुना था |
और आखिर में अब वो दिन भी आ ही गया जब पुलकित को प्रथम बार कॉलेज को जाना था | कॉलेज की ऊँची-ऊँची इमारते रंगीन रंगो से रंगी हुई थी पूरा कॉलेज काफी बड़े क्षेत्रफल में फैला हुआ था, कॉलेज की विशालता पुलकित की आँखों को चकाचौंध कर रही थी | सम्भवतः उसने इतना बड़ा कॉलेज परिसर पहले कभी नही देखा था | कॉलेज परिसर में चारो ओर रंग-बिरंगे परिधानो में सजे विद्यार्थी इधर-उधर टहल रहे थे | जब पुलकित कॉलेज के लिए घर से निकला था तभी भाई सोमिल ने उससे कहाँ था की कॉलेज में बेकार मत टहलना और सीधे अपने विभाग में जाना | ठीक उन्ही बातो को ध्यान में रखकर पुलकित 'टेक्सटाइल' विभाग को ढूंड रहा था | लेकिन कहीं भी उसे अपना टेक्सटाइल विभाग नही दिख रहा था | उसने इस बारे में किसी अन्य विद्यार्थी से पूँछ लेना ही बेहतर समझा | फलस्वरूप पुलकित ने पास में ही खड़े एक विद्यार्थी से पूंछा,''हैलो, क्या आप मुझे ये बता सकते है की यहाँ पर टेक्सटाइल विभाग कहाँ पर पड़ेगा ?''
विद्यार्थी- ''नही, मुझे नही पता मेरा तो आज पहला दिन है !''
पुलकित- ''अच्छा, वैसे आपका विभाग कौन सा है |''
विद्यार्थी- ''मकैनिकल.., वही तो मैं भी ढूंढ रहा हूँ !''
पुलकित- ''मकैनिकल..अरे! मैंने अभी तो देखा था |''
अब उन दोनों ने साथ होना ही बेहतर समझा और अपनी-अपनी ब्रांच ढूंढने के लिए साथ हो लिए | आपसे बातचीत के माध्यम से पता चला कि लड़के का नाम 'प्रमोद कुमार' है जो कि पड़ोस के ही एक जिले का रहने वाला है | अब तक ये दोनों बातचीत करते-करते प्रधानाचार्य के ऑफिस के नजदीक पहुँच गये | जहाँ कुछ दुरी पर ही लगे नल को देखकर पुलकित के मन में पानी पीने कि इच्छा जाग्रत हुई तो उसने प्रमोद से भी पानी पीने के लिए आग्रह किया | जब पुलकित पानी पी रहा था तो तभी पीछे से आवाज आयी- 'ऐ हीरो!' जब पुलकित ने पीछे मुड़ कर देखा तो कुछ आठ से दस लड़के रंग-बिरंगे परिधान में सजे हुए खड़े हुए थे, उनके लम्बे उलझे हुए बाल किसी टीवी आर्टिस्ट से कम नही लग रहे थे मानो वो सब किसी पौराणिक प्रस्ठभूमि पर आधारित धारावाहिक में नकारात्मक किरदार का अभिनय कर रहे हो कि तभी उनमे से एक लड़के ने बोला- ''यहाँ क्या कर रहा है ?'' तो झट से ही प्रमोद बोला,''सर, वो..हम पानी पीने आये थे |''
लड़का- ''ये पानी पीने का समय है, कौन सी ब्रांच में पढता है ?''
प्रमोद- ''सर, आज मेरा पहला दिन है !''
लड़का- ''तो क्या तुझे अपनी ब्रांच भी नही पता है |''
प्रमोद- ''नही..नही पता है, मकैनिकल ब्रांच है |''
पुलकित शांत सा खड़ा ये सब दृश्य देख रहा था कि तभी पुलकित ने गौर किया कि उनमे से एक लड़का उसे काफी देर से घूरे जा रहा था | इसी बीच उन लड़को ने तरह-तरह के फरमान जरी करके प्रमोद को वहाँ से डांट कर भगा दिया | वो लड़का जो पुलकित को काफी देर से घूरे जा रहा था उसने पुलकित से कहाँ,''ऐ हीरो, तू इधर तो पहले |'' जब पुलकित कुछ कदम बढाकर उसके पास पहुंचा तो वो लड़का पुलकत से बोला- ''क्यों, तुझे इतना भी पता है क्या कि अपने सीनियर के सामने कैसे खड़ा हुआ जाता है, चल नजरे नीचे झुकाकर बात कर |'' तो पुलकित ने भी इन झंझटो से बचने के लिए अपनी नजरो को नीचे झुका लिया | लेकिन वो सब तो जैसे गाली-गलौज पर ही उतारू थे | स्वयं के बालो को तो वो शैतानो कि भाती बढ़ाये हुए थे परन्तु पुलकित के दो-ढाई इंच के बाल भी उन्हें बड़े प्रतीत हो रहे थे | उनकी अभद्र भाषा और अभिवृति किसी भी अपरचित को ये सोचने पर मजबूर करने के लिए काफी थी कि मानो ये विद्यार्थी नही बल्कि जंगली जानवरो का कोई टोला हो | एक छड़ तो पुलकित के मन में भी विरोध का भाव जाग्रत हुआ परन्तु फिर पुलकित ने शांति भाव से खड़े रहने को ही उचित समझा और सब कुछ मूक-बाधिर कि भाती सहता गया | काफी देर तक उन छात्रो ने पुलकित को परेशान किया और अंत में पुलकित के सामने भी कई तरह के फरमानो को जारी करके उसे डांटकर भगा दिया |
इस घटना ने पुलकित को मानसिक रूप से काफी चोट पहुंचाई और वो तुरंत ही घर को लौट आया | पुलकित ने इस घटना को भूलने कि तो बहुत कोशिश कि परन्तु कहीं न कहीं ये घटना उसके दिलो दिमाग में घर कर गयी थी | अब, वो जानना चाहता था कि आखिर किस कारणवश उन छात्रो ने उसके साथ ऐसा बर्ताव किया था | पुलकित ने ये पूरी घटना अपने मित्र शुभम को बताई जो उसके मोहल्ले में ही रहता था और उससे तीन वर्ष बड़ा था परन्तु शुभम ने इसे कोई गम्भीर मामला नही समझा बल्कि ये बोलकर पुलकित के मन कि व्यथा को दूर करने कि कोशिश कि 'बड़े-बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में ये सब तो आम बातें है तथा सीनियर तो अक्सर ही जूनियर कि रैंगिंग किया करते है |' लेकिन शुभम का ये जवाब पुलकित को संतुष्ट करने के लिए नाकाफी था उसने समाचार पत्रो में रैंगिंग के दुस्प्रभावो को पढ़ रखा था | उसे पता था कि इस रैंगिंग रूपी ड्रैगन ने जेन कितने विद्यार्थियों के जीवन को निगला है लेकिन तब वो उन विद्यार्थियों को कमजोर समझता था परन्तु जब आज वो स्वयं इस घटना से रुबरूं हुआ तो तब जाकर उसे इसकी गम्भीरता का एहसास हुआ | अब उसे पता चल गया था कि किसी के स्वाभिमान पर पहुँचने वाली चोट कितनी भरी होती है | परन्तु पुलकित शांत रहने वाले लोगो में नही था | इस प्रयोजन में जब पुलकित ने अन्य लोगो से पूछा तो उसे ये बात समझ में ना आयी कि सीनियर विद्यार्थी इस कारण से रैंगिंग करते है क्यों कि पूर्व में उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ होता है |
पुलकित को स्वयं में आत्मविश्वास और ऊर्जा कि कमी नजर आ रही थी इसलिए उसने दस दिन घर पर ही रहने का ही निर्णय किया | इन्ही दस दिनों के मध्य जब एक दिन पुलकित समाचार पत्र पढ़ रहा था तो उसकी नजर एक कॉलम पर गयी, जिसमे लिखा था 'रैंगिंग रुकने का नाम नही ले रही है ...!'' जब पुलकित ने पुरे कॉलम को पढ़ा तो उसे पता चला कि ये घटना तो उसके ही कॉलेज कि थी जिसमे कुछ सीनियर छात्रो ने अपने जूनियर साथी कि इस बात पर पिटाई कर दी क्यों कि उसने उन सबके पैर चुने से इंकार कर दिया, जिसके बाद से ही उसकी हालत गम्भीर है और वो हॉस्पिटल में भर्ती है |
जब पुलकित दस दिन के बाद कॉलेज पहुँचता है तो वो पता है कि रैंगिंग कि उस घटना के कारण कॉलेज पहले से सख़त हो चूका था जिसके कारण से सीनियर छात्रो के व्यव्हार में थोडा बहुत ढीलापन अवश्य आया था परन्तु अभी भी उनकी निरंकुशता पूर्णतया समाप्त नही हुई थी |
(10)
पुलकित को कॉलेज गये हुए एक माह से अधिक का समय बीत चुक था और इतने समय अंतराल में वो रैंगिंग रूपी परदे के पीछे कि कहानी को वो कुछ हद तक अवश्य समझ गया था | पुलकित ने रैंगिंग के लिए सबसे ज्यादा दोषी कॉलेज कि शिक्षा व्यवस्था को ही ठैराया | कहीं न कहीं उसे लगा कि कॉलेज प्रशासन ने अपने शिक्षा व्यवस्था के ढांचे को इतना कमजोर कर लिया है कि जिससे जूनियर विद्यार्थियो के मन में हमेशा यही डर सताता रहता है कि अगर उन्होने सीनियरो के व्यव्हार के खिलाफ जरा सी भी आवाज उठाई तो वे उनके द्वारा मिलाने वाली पाठ्यसामग्री से वंचित हो जायेगे और अगर कहीं ऐसा हो गया तो फिर उनका पास होना तो लगभग असम्भव ही हो जायेगा |
अपने दूसरे कारण में पुलकित ने समाज के ऊपर ऊँगली उठाते हुए कहाँ कि, ''आज के इस आधुनिक युग में हर इंसान अपना 'वर्चस्व' स्थापित करना चाहता है | मानो ये मानव इस कर्मभूमि में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाहन करने कि बजाये 'वर्चस्व कि जंग' में भाग लेने आया हो, तथा स्वयं का वर्चस्व स्थापित करने के लिए दरंदगी कि किसी भी हद तक जाने को तैयार हो | झूठी प्रसंशा और सम्मान को तो जैसे आज सभी अपने गले का हार बनाना चाहते है और कुछ ऐसे ही सोच का परिणाम है हमर 'कॉलेजलोक' में फैली रैंगिंग रूपी गंदगी |
विद्वानो ने कहाँ है कि हमारे का पढ़ने का तरीका कुछ ऐसा होना चाहियें कि जिससे पढाई मनोरंजक लगे | लेकिन आज का सीखने कि बजाये खीचने में विश्वास रखता है यहाँ खीचने से मतलब 'डिग्रियों' से है | आज के समय तो मजे लेकर पढ़ने वालो कि संख्या बहुत कम रह गयी है और इसी कारण सीनियर छात्र मजे लुटाने के लिए जूनियर विद्यार्थियों को अपना निसाना बनाते है, तथा अपने भेड़ियां समूह का सरदार बनने के लिए सदैव आतुर रहते है |
कॉलेज जाते चार महीने से अधिक का समय गुजर चूका था और पुलकित के प्रथम समेस्टर कि परीक्षा भी नजदीक थी परन्तु पुलकित को अभी भी भाषा संबंधी दिक्कतो का सामना करना पड़ रहा था पुलकित ने बारविह तक कि पढाई हिंदी माध्यम स्कूल से कि थी | और एकदम से सम्पूर्ण कोर्स इंग्लिश में पाकर उसे दिक्कत होना तो स्वाभाविक ही था | वो अब समझने कि बजाये रटने के सिद्धांत पर कार्य करने लगा था और इसी शिक्षा व्यवस्था का ही प्रभाव था कि हिंदी-भाषी मेधावी छात्र के ह्रदय में अपनी सफलता को लेकर संदेह का भाव उत्पन्न हो गया था | ये विडम्बना ही है कि हमारे देश में एक भी ऐसा इंजीनियरिंग कॉलेज नही है जहाँ भारतीय भाषा में शिक्षण कार्य होता हो बल्कि विश्व में हिंदी भाषा बोलने वालो कि संख्या ११०३ मिलियन तक है | आज तक ये किसी भी भारतीय को समझ नही आया है कि किसी टेक्निकल पढाई का किसी भाषा विशेष से कौन सा सम्बन्ध है जो हर जगह अंग्रेजी भाषी इंजीनियरिंग कॉलेज ही दिखाई पड़ते है | और ऐसे ही भाषाई जाल में देश कि एक और प्रतिभा दफन हो रही थी |
यह बात बिलकुल सत्य है कि अगर बुरे से बुरे वक़्त में शुभ चिंतक मित्रो का साथ मिल जाये तो सफ़र बोझिल नही होता है परन्तु लंका में राम कि कल्पना करना तो बेईमानी ही होगा न | कॉलेज में एक भी ऐसा सहपाठी व सीनियर नही था जो पुलकित के दुखो का साथी हो | सबके सब 'अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते थे' और ऐसे माहोल में खुद को कैद करना कोई आसान कार्य नही था | अब मानो पुलकित के ह्रदय में यही पंक्तियाँ गूंजती हो-
''ये चार दिवारी दुनियां तेरी
पतझड़ पावन बहार है,
खुला आसमां प्रेम दिखाए
मगर ये सब बेकार है,
यूँ समेत ली है ये दुनिया..,
मानव ने चौखटे में,
अलग-अलग छड़ रंग दिखाए,
नए-नए भिन्न मुखौटों में..!!''
हमेशा से ईमानदार, सहयोगी और अच्छे लोगो के मध्य रहने वाला कोई व्यक्ति जब किसी ऐसे समाज में प्रवेश करता है जहाँ पर समाज कि परिभाषा कि लागु न हो तो वो व्यक्ति आत्म-कुंठा का शिकार हो जाता है आत्म-विश्वास कि कमी उसके व्यक्तित्व में साफ़ रूप से झलकने लगती है और ऐसे माहोल में किसी स्वाभिमानी व्यक्ति का रहना ठीक उसी प्रकार से असम्भव है जैसे जल-पारी मछली का भूतल पर रहना | तो कुछ ऐसा ही आत्म-सुख कि प्राप्ति तो निरंतर प्रयासरत रहने वाले पुलकित के साथ अतैव उसने फैसला लिया कि वो इस जंजाल से बहार आएगा परिणाम स्वरुप उसने इंजीनियरिंग छोड़ने का निश्चय किया | जब पुलकित ने अपने इस निर्णय को घर वालो के समक्ष रखा तो बवाल उठना तो लाजमी ही था और साथ ही साथ पुलकित कि सफलता से स्वयं को सैदेव लज्जित महसूस करने वाले उन लापरवाह छात्रो के अभिवावको को जब ये बात पता चली तो वे लोग अपने दिल में छुपी पुलकित के प्रति द्वेष कि भावना को छुपा न सके तथा कई तरह के अनर्गल आरोपो से भी पुलकित को अलंकृत करते रहे | उनमे कुछ का तो यहाँ तक कहना था कि, ''गौतम जी का लड़का तो इंजीनियरिग के लायक भी नही था हाईस्कूल, अन्तर में अच्छे नंबर क्या ले आया पाँव ही जमीं में नही थम रहे थे हमने तो पहले ही कहाँ था ये सब अकल कम नक़ल वाले ज्यादा है जिस दिन प्रतिस्पर्धा में बैठेगे उस दिन सारी सच्चाई सामने आ जायेगी, सच तो ये है कि उसने कोई कोर्स-वोर्स थोड़े न छोड़ा है, वो तो कॉलेज से निकल दिया गया है | अब कोई भला सच बताता है क्या |'' लेकिन वहीँ पुलकित अपने फैसले पर अडिग था फलस्वरूप परिवारजनो को पुलकित कि बात माननी ही पड़ी | अब न केवल पुलकि केवल अपने अधूरे ख्वाब को पूरा करना चाहता था बल्कि उसने कई और अरमानो कि लकीरे अपनी हथेली पर खींच ली थी | इस समय पुलकित एक आजाद पंक्षी कि भाति था जो किसी भी दिशा में उड़न भर सकता था परन्तु सच ही है जब किसी इंसान को आजादी मिल जाती है तो उस पर जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती है | ठीक इसी प्रकार पुलकित के कंधे पर भी जिम्मेदारियां आन पड़ी थी कि वो इस कर्म भूमि में स्वयं को साबित करे |
(11)
इंजीनियरिग कोर्स को छोडे हुए लगभग एक माह का वक़्त बीत चूका था लेकिन पुलकित के कदम अभी भी किसी सही दिशा कि और नही बढे थे शीघ्र ही पुलकित को इस बात का एहसास भी हो गया | चुकी पढाई का नया सत्र प्रारम्भ होने में अभी पञ्च से छ माह का वक़्त बाकि था अतैव पुलकित ने फैसला किया कि वो इस बचे हुए समय में वो अपने पसंदीदा विषय 'गणित' कि बारीकियों को सीखेगा और इसके लिए दरकार थी तो बस एक अच्छे अध्यापक कि जो उसे पसंदीदा विषय को और मजबूत बना सके | जब पुलकित ने इस सम्बन्ध में अपने मित्र 'शुभम' सी बात कि तो उसने किसी इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा कि तैयारी करने वाली कोचिंग में दाखिला लेने कि सलाह दी | पुलकित ने शुभम कि बात पर अमल करते हुए प्रदेश कि ही एक उत्कृष्ट कोचिंग का चयन किया | और जब पुलकित फ़ीस इत्यादि कि जानकारी हेतु वहाँ पर पहुंचा तो उसने पाया कि कोचिंग संस्थान किसी भी तरह किसी शॉपिंगमाल से कम नही दीखता था पूरी तरह एयरकण्डीशन बिल्डिंग को देखकर उसे इस बात का एहसास हो गया था कि कोचिंग कि फ़ीस जरुर ही अधिक होगी परन्तु इतना अंदाज़ा नही लगाया था कि यहाँ केवल गणित विषय कि ही फ़ीस बराह हजार रुपए होगी | वो तो सोच रहा था कि एक विषय कि अधिकतम फ़ीस चार या पञ्च हजार रुपए ही होगी परन्तु इतनी अधिक फ़ीस सुनकर तो उसके 'तोते ही उड़ गये' थे | वो तो इस जुगत में था कि ट्यूशन आदि को पढ़ा करके वो तिन या चार महीने में इतनी फ़ीस का इंतजाम कर लेगा | परन्तु इतने अधिक रुपए के संग्रह हेतु उसे कम से कम आठ या नव महीने कि आवश्यकता तो थी ही | लेकिन इन आठ या नव महीनो को कटना इतना आसान भी नही था | पुलकित तो बस जल्द से जल्द दाखिला लेना चाहता था लेकिन समस्या तो ये थी कि इतने अधिक पैसो का इंतज़ाम करे तो वो करे कहाँ से, अब वो अपने पिता जी से तो इन रूपैयों कि मांग तो कर नही सकता था, आखिर कहे भी तो किस मुँह से | आखिर वो क्या कहेगा ? कि 'पापा मुझे बारह हजार रुपियों कि जरुरत है क्यों कि मैं इंजीनियरिग कि कोचिंग में दाखिला लेना चाहता हूँ | ' अगर वो ऐसा कहता तो परिवारजनो के मध्य उसका दिवालियां घोषित होना तो लाजमी ही था | अब रास्ता एक ही था कि धैर्य रखा जाये और इन रूपैयों का इंतज़ाम स्वयं किया जाये |
यूँ ही ट्यूशन ढूंढते-ढूंढते एक महीने का समय और गुजर गया परन्तु अभी तक उसके हाथ में एक भी ट्यूशन नही लगा था | वो जिससे भी इस बारे में कहता तो बस एक ही जवाब आता कि 'भला साल के अंत में तुम्हे कौन पढने के लिए रख लेगा, इसके लिए तो बस नए सत्र का ही इन्तजार करना होगा' | अब तो और मुसीबत, पुलकित को ये समझने में ज्यादा देर न लगी जिस सफ़र को वो इतना आसान और सुखद समझ रहा था वो दरसल काँटों पर चलने से कम न था | अब तो एक ही चारा था कि पैसा कमाने के लिए किसी और विकल्प को जाये | लेकिन वो विकल्प आखिर क्या हो सकता था ? किसी बनिया कि दुकान में मुनीमी या फिर सब्जी इत्यादि का ठेला पर या क्या कोई व्यापारी का लड़का किसी दूसरे के प्रतिस्ठान में मजदूरी कर सकता था ? शायद नही ! पुलकित तो कभी नही | लेकिन उसे तो ऐसी कोई सूझ जान नही पड़ रही थी कि जिससे वो आसानी से इन रुपयो का इंतज़ाम कर सके | उसे तो बस एक ऐसे विकल्प कि तलाश थी कि जिससे 'सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे' | अंततः उसे ऐसा काम मिल ही गया जिससे वो डेढ़ हजार रूपए महीने तक कम सके | कम कुछ ऐसा था कि उसे कुछ अध्यापको के नोट्स को अपनी हैण्ड राइटिंग में लिखना होता था जिससे उसे हर पेज के लिए 'दो रुपए' मिलता था | उसकी कोशिश रहती थी कि वो कम से कम 25 पेज तो दिन भर में लिख ही दे | और ये कम भी कुछ ऐसा था कि जिसने घर वालो को कानो-कान खबर भी नही लगने दी, इसके लिए पुलकित अपने मित्र शुभम का बेहद शुक्रगुजार था जिसके सहयोग से ही उसे इस प्रकार के विकल्प कि प्राप्ति हुई थी |
(12)
देखते ही देखते चार माह तक का समय बीत चुका था तथा इतने समय के मध्य पुलकित भी 'छ हजार' रुपए कि बचत कर चुका था |
आज रविवार का दिन है यानि छुट्टी का दिन, इस दिन पुलकित कि कोशिश रहती थी कि वो इस दिन कम से कम पचास पेज तो लिख ही ले | वो इन्ही नोटसो को बनाने में लगा हुआ था कि इतने में ही उसका मित्र शुभम आ धमका और पुलकित से क्रिकेट खेलने के लिए अनुरोध करने लगा | पुलकित खुद को शुभम के सहयोग का ऋणी मानता था, तथा वो क्रिकेट का सौखीन भी था इसलिए उसने क्रिकेट खेलने के लिए हाँ कर दी | क्रिकेट का मैदान पुल्कित के घर से कुछ ही दुरी पर था इसलिए वो दोनों पैदल ही मैदान के लिए निकल लिए | बातो ही बातो में शुभम ने पुलकित को बताया कि ये क्रिकेट मैच चार हजार रुपए का है, जिसे वो किसी भी कीमत पर जितना चाहता है | क्यों कि पुलकित एक अच्छा खिलाड़ी था और शुभम इस बात को अच्छी तरह से जनता था तथा टीम का कप्तान होते होने के नाते शुभम तो बस इतना चाहता था कि पुलकित मैच में अपना सर्वश्रेस्ठ प्रदर्शन दे सके | पुलकित कुछ देर शांत शांत रहने के बाद शुभम से, ''यार, शुभम क्रिकेट में पैसे लगाकर खेलना कोई अच्छी बात नही है | क्रिकेट को हमें मनोरंजन के तौर पर लेना चाहिए न कि किसी पेशे कि तरह |'' पुलकित के इस प्रश्न का जवाब देते हुए शुभम ने पुलकित से कहा, ''मैं कौन सा तुमसे पैसा लगाने के लिए कह रहा हूँ, तुम एक अच्छे खिलाड़ी हो और मैं तो बस इतना ही चाहता हूँ कि तुम अच्छा खेल दिखाओ जिससे हैम मैच जीत सके |'' पुलकित ने भी शुभम के इस तर्क से स्व्यं को संतुस्ट पाया | अब तक दोनों मैदान में प्रवेश कर चुके थे जहाँ पर पहले से ही दोनों टीम के खिलाड़ी उपस्थित थे | मैच का टॉस हुआ जिसमे कप्तान शुभम ने बाज़ी मरी और पहले बल्लेबाज़ी करने का फैसला लिया | 15-15 ओवर के निर्धारित हुए इस मैच में पुलकित कि जानदार बल्लेबाज़ी कि बदौलत टीम ने 150 रन का लक्ष्य विरोधी टीम के समक्ष रखा जिसमे पुलकित ने 75 और शुभम ने 35 रन का योगदान दिया | जवाब में विरोधी टीम 13 ओवर में ही 110 रन बनाकर आल आउट हो गयी | और बोलिंग में कमाल करते हुए पुलकित ने चार खिलाडियों को आउट किया | मैच समाप्त हुआ तो पुलकित को पता चला कि मैच में चार हजार रुपए अकेले शुभम ने ही लगाये थे | अब वो सोचने लगा कि काश ये चार हजार रुपए उसे मिल जाते तो शायद वो कोचिंग में दाखिला लेने में सफल हो जाता | एक छड़ तो उसके मन में विचार आया कि क्यों न इन चार हजार रूपैयों को शुभम से उधार ले लिया जाये | परन्तु बाद में वो ऐसी कोई हिम्मत न जुटा सका | शुभम ने भी जीत कि खुशी में अपने टीम के सभी खिलाडियों को होटल में पार्टी दी, और उसके बाद सभी अपने-अपने घरो को चले गये |
एक सप्ताह बीत चुका था | पुलकित बहार वाले कमरे में बैठ कर नोट्स तैयार करने में लगा हुआ था कि तभी घर के मुख्या द्वार के खटकने कि आवाज सुनाई दी | पुलकित को लगा कि पक्का ही शुभम आया होगा | लेकिन जब उसने गेट खोला तो उसने देखा कि दरवाजे पर दयाल बाबू खड़े थे | पुलकित ने तुरंत ही उनके चरणो कि धूल को अपने माथे से स्पर्श किया और कमरे बैठने का निवेदन किया | पुलकित कमरे से अपने नोट्स को समेट ही रहा था कि तभी दयाल बाबू पुलकित से कहते है, ''लगता है कि पढाई चल रहे थी |'' पुलकित ने कोई जवाब न देकर बस हल्का सा मुस्कुरा दिया | कुछ देर बाद फिर दयाल बाबू पुलकित से कहते है, ''पिताजी, तो वहीं दुकान पर ही होगे | ''
पुलकित- ''हाँ...हाँ |''
कुछ देर बाद...
दयाल बाबू- ''अच्छा, माँ जी कहाँ है तुम्हारी ?''
पुलकित- ''वो बगल में चाची के घर तक गयी है, बस आती ही होगी !''
दयाल बाबू- ''अच्छा...अच्छा |''
कुछ ही देर में वसुंधरा जी भी आ गयी और दयाल बाबू को देखकर बोली- ''अरे! भाई साहब बड़े दिन बाद आना हुआ, ऐसा लगता है जैसे रास्ता ही भूल गये है घर का |''
दयाल बाबू- ''नही..नही, ऐसी कोई बात नही है |''
वसुंधरा जी पुलकित से- ''अरे! पानी-वानी के लिए पूछा कि नही |''
पुलकित- ''हाँ...हाँ, बस ला रहे |''
और ये कहता हुआ उठ कर किचन कि ओर चल देता है..
दयाल बाबू वसुंधरा जी से- ''सुना है पुलकित ने इंजीनियरिंग छोड़ दी है | ''
उनकी अभिव्यक्ति का तरीका कुछ ऐसा था कि जिससे ये ज्ञात होने में जरा भी देर नही लगी कि उनका यहाँ आने का प्रयोजन क्या था |
वसुंधरा जी अपनी नजरो को दयाल बाबू से हटाते हुए बड़े कड़े शब्दो में बोली- ''जिसको पढाई ही नही करनी है उसकी बात ही क्या करना |''
दयाल बाबू- ''पता नही, यहाँ लोगो को इतना बढियां कॉलेज भी नही मिलता है और एक ये है जिनको मिल गया तो छोड़ कर बैठ गये |''
इतने में पुलकित हाथो में मीठा और पानी को लिए हुए वहाँ पर आ पहुंचा |
दयाल बाबू पुलकित से- ''और पुलकित पढाई कैसी चल रही है इस समय |"
पुलकित उनके इस प्रश्न के जवाब में निरुत्तर था | कुछ देर बस गिलास और प्लेट कि ही आवाजे सुनाई देती है | फिर..
दयाल बाबू- ''चलो तुमने इंजीनियरिंग छोड़ी, कोई बात नही लेकिन कुछ न कुछ तो सोच कर रखा ही होगा |''
पुलकित तिरछी निगाहो से माँ कि ओर देखते हुए बोला- ''बस सरकारी नौकरी पानी है किसी तरह..|''
दयाल बाबू- ''अच्छी बात है लेकिन कहीं कोचिंग-वोचिंग कर रहे हो कि नही |''
पुलकित- ''नही अभी तो नही जा रहे है लेकिन जल्दी ही चालू कर देंगे |
दयाल बाबू- ''चलो.., वैसे किस क्षेत्र में तुम्हारा अधिक रुझान है | ''
पुलकित- ''अरे, कोई भी हो बस सरकारी नौकरी होनी चाहियें |''
दयाल बाबू मुस्कुराते हुए- ''कोई भी क्या ? सिविल कि तैयारी क्यों नही करते.., अगर कहीं भाग्य खुल गया तो समझो पीढ़ियां बैठे खाएगी |''
पुलकित दबी हुई आवाज में- ''हाँ...हाँ |''
दयाल बाबू- ''चलो जो सोच रखा हो, पर तुम्हारा कोई एक लक्ष्य नही नजर आ रहा है | अगर तुम्हे सिविल में जाना है तो कतई इसे आसान न समझो, ये हमेशा ध्यान रखना कि आजकल बिना कड़ी मेहनत के यहाँ कुछ हासिल नही होता है.., और तुम तो समझदार बच्चे हो, यार !''
पुलकित कुछ कहता कि उससे पहले ही वसुंधरा जी दयाल बाबू से- ''घर में खाने को मिल जाता है , सोने को मिल जाता है तो चिंता कहे कि होगी...अभी संघर्ष देखा कहाँ है जिस दिन मुसीबत आएगी उस दिन डिग्री का सारा महत्व पता चल जायेगा |'' और इतना कहते हुए वहाँ से उठ कर चल दी |
कुछ देर पुलकित और दयाल बाबू दोनों शांत रहते है और फिर..
पुलकित हिमम्त जुटाते हुए दयाल बाबू से- ''चाचा जी वो वो हमें सिविल में नही जाना है बल्कि एक अच्छा अध्यापक बनना है |''
दयाल बाबू- अरे भाई! अगर अच्छा अध्यापक बनना है तो पहले ग्रेजुएशन तो करो..|
पुलकित- ''हाँ..चाचा जी वही तो सोच रहे है | बस नया सत्र प्रारम्भ हो जाये |''
दयाल बाबू अपनी नजरो को पुलकित से हटते हुए - ''पता नही तुम्हारा कुछ समझ नही आ रहा है | कभी तुम सिविल कि कोचिंग कि बात कहते हो कभी अध्यापक बनने की | लगता ही अभी तक तुम अपने लक्ष्य को लेकर दुविधा में फसे हुए हो |''
ये सब बाते सुनकर पुलकित को झूठ बोलने का पछतावा तो होता है लेकिन कहीं भी उसे ऐसा प्रतीत नही होता है की उसका कोई एक लक्ष्य नही है | कुछ देर तो दोनों शांत रहते है की थोड़ी ही देर में दयाल बाबू, पुलकित से- ''चलो अच्छा तुम्हारी थोड़ी परीक्षा ले ली जाये | अच्छा ये बातो की हिंदी वर्णमाला में 'स' कितने कितने प्रकार के होते है ?''
पुलकित कुछ देर सोचने के बाद- 'तिन प्रकार के |''
दयाल बाबू- ''बहुत बढियां, अब जरा इनके नाम तो बताओ जरा |''
पुलकित आश्चर्य से- ''नाम...मतलब |''
दयाल बाबू- ''अरे, कुछ नाम तो होगा इनका |''
पुलकित दिमाग में जोर लगाने में लगा ही हुआ था की तभी दरवाजे के खटकने की आवाज सुनाई दी ...
पुलकित दयाल बाबू से- ''बस आ रहे, दरवाजा खोल आए |
दयाल बाबू अपनी स्वीकृति देते हुए- ''हाँ..हाँ |''
पुलकित जैसे ही घर का मुख्या द्वार खोलता है तो देखता है की शुभम हाथो में बैट लेकर खड़ा हुआ है | शुभम पुलकित से, ''चलो जल्दी चलो..आज फिर उन्ही लोगो से मैच है |''
पुलकित- ''चल रहे रुको तो..वो ज्ञानवादी चाचा आयें है न.., चलो अच्छा अंदर को तो आओ |''
शुभम- ''नही..नही हम यही खड़े है, तुम तैयार होकर आओ जल्दी से |''
लेकिन पुलकित जबर्दस्ती ही शुभम का हाथ पकड़कर कमरे तक उसे ले आता है |
शुभम दयाल बाबू को देखकर- ''नमस्ते दयाल चाचा !''
दयाल बाबू- ''नमस्ते..नमस्ते, और शुभम कैसे हो ?''
शुभम- ''बस चाचा जी सब सब ठीक है |''
दयाल बाबू- ''चलो बढियां है..वैसे क्या चल रहा है इस समय |''
शुभम- बस वही चावल के व्यापार में पिता जी का हाथ बता रहे है |''
दयाल बाबू- ''चलो बढियां ही है | वैसे कुछ न कुछ तो करते ही रहना चाहियें |''
पुलकित वहीँ शांत सा बैठा हुआ था की तभी शुभम पुलकित से- ''जाओ फिर जल्दी से तैयार होकर आओ |''
दयाल बाबू शुभम के बैट की ओर देखते हुए- ''लगता आज क्रिकेट खेलने का विचार है तुम दोनों का.., चलो अच्छा फिर हम चलते है |''
पुलकित उत्तेजना भरे भाव में- ''अरे! चाचा जी उत्तर तो बता दीजिये |''
दयाल बाबू के बोलने से पहले ही शुभम- ''किसका उत्तर ?''
पुलकित शुभम से- ''अरे, वो हिंदी वर्णमाला में तीनो 'स' के नाम क्या-क्या होते है |''
शुभम हॅसते हुए- ''अच्छा, हिंदी वर्णमाला में तीन 'स' भी होते है क्या !''
परन्तु उसके इस व्यंग के उत्तर में न तो पुलकित कोई प्रतिक्रिया देता है और न ही दयाल बाबू | छड़ भर बाद...
दयाल बाबू पुलकित से- ''पहले तुम कोशिश करके पता करो, फिर हम बताते है |''
और इतना कह कर दयाल बाबू वहाँ से उठ कर चल दिए | पुलकित ने भी कपडे बदले और अपने बचत किये हुए 6000 रूपैयों को जेब में डाला और शुभम के साथ मैदान की ओर चल दिया | पुलकित से शुभम से प्रथम यही पूछा कि, ''आज कितने का मैच है ?'' पुलकित का ये प्रश्न ये बताने के लिए काफी था कि उसने उन 6000 रूपैयों को किस प्रयोजन से अपने जेब में डाला था |
शुभम ने हलकी मुस्कराहट के साथ जवाब दिया- ''आज 6000 रुपए का मैच है |''
जैसे ही पुलकित ने इतना सुना तो उसने तुरंत ही शुभम से आग्रह किया कि आज के मैच में वो भी पैसा लगाना चाहता है | शुभम ने भी उसके आग्रह को स्वीकारते हुए उससे पूछा- ''चलो ठीक है, अच्छा बताओ तुम्हारे कितने पैसे लगा दिए जाये |''
पुलकित- ''पुरे 6000 रुपए |''
शुभम गुस्सा होते हुए- ''अरे बेवकूफ हो क्या.., इतने रुपए कहाँ से लाये ?''
पुलकित- ''यार, वो बचत कि है मैंने''
शुभम- ''यार! तब भी सोच लो क्रिकेट का कोई भरोसा थोड़े न है |''
लेकिन बार-बार पुलकित के आग्रह करने पर शुभम ने हामी भर ही दी | अब तक दोनों मैदान में पहुँच चुके थे | पुलकित इस मैच को लेकर कितना गम्भीर था इस बात का अंदाजा इसी बात से लगा सकते है कि पुलकित ने मैदान में पहुंचते ही सर्वप्रथम तेज दौड़कर उसके दो चक्कर लगाये और और अपने शरीर में ऊर्जा का संचार किया | आज के इस मैच को पुलकित हर कीमत पर जितना चाहता था | मैच का टॉस हुआ जिसमे पुलकित कि टीम ने बाज़ी मारी तथा आपसी विचार-विमर्श के बाद टीम ने पहले गेंदबाजी करने का फैसला लिया | मैच का पहला ओवर पुलकित के द्वारा फेका गया जो कि काफी महँगा साबित हुआ जिसमे पुलकित ने बारह रन लुटा दिए जिसके बाद तो मैच कि स्थिति ओवर दर ओवर बिगड़ती ही चली गयी | अंततः विरोधी टीम ने कुल पंद्रह ओवर में १६५ रन का विशाल स्कोर उनके समक्ष रखा | अब तो सबकी उम्मीदे पिछले मैच के हीरो रहे पुलकित और शुभम पर ही टिकी हुई थी | पुलकित मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने में लगा हुआ था कि 'हे! भगवान बस किसी भी तरह से ये वाला मैच जितवादे जिसके बाद वो कभी भी मैच में पैसे लगाकर नही खेलेगा' लेकिन कहीं न कहीं उसे इस बात कि आशंका तो हो ही गयी थी कि शायद वो इस मैच को जीत नही सकेगा | और उसकी आशंका को तो तब और भी बल मिल गया जब मात्र पंद्रह रन के स्कोर पर ही वो बोल्ड आउट हो गया | अब तो पूरी टीम कि उम्मीदे केवल और केवल शुभम पर ही टिकी हुई थी | लेकिन दसवें ओवर ने तो बची-खुची आशाओं को भी समाप्त कर दिया जब 17 रन पर शुभम अपने निजी स्कोर 63 पर आउट हो गया | अब जब कि मैच बस समाप्त ही होने वाला था कि तभी शुभम ने पुलकित के पास जाकर दबे हुए स्वर में कहा कि, ''पैसे तो लिए हो न |'' पुलकित ने बिना शुभम कि ओर देखते हुए उससे कहा कि वो पैसे लेकर ही आया था | अंततः पुलकित कि टीम ने मैच को गवां ही दिया | पुलकित ने भी 6000 रूपैयों को शुभम के हाथो में सौपा और घर के लिए चल दिया | शुभम भी पुलकित के ह्रदय कि व्यथा को समझ रहा था इसलिए वो इतनी भी हिमम्त नही जुटा पाया कि वो पुलकित को साथ चलने के लिए कह सके | अब तो पुलकित ह्रदय में तरह-तरह के बुरे विचारो का उदगम भी प्रारम्भ हो गया उसको अपने किये पर पछतावा तो बहुत हो रहा था परन्तु वो करता भी तो क्या ? अब गुजरा हुआ समय तो वो वापस ला नही सकता था | उसे ऐसा लग रहा था मानो वो फिर से वहाँ पर पहुँच गया हो जहाँ से उसने अपना सफ़र प्रारम्भ किया था वो बस यही सोचे जा रहा था कि आखिर कब उसकी जिंदगी से अँधेरा छंटेगा | मानो उसके दिल में अब यही गूंज रहा हो कि-
''मैं जब रोता हूँ अकेले में,
तो कुछ समझ में ना आता है,
मैं जब जाता हूँ उजाले में,
तो भी 'अँधेरा' ही नजर आता है !''
(13)
पढाई का नया सत्र प्रारम्भ होने वाला था इसलिए पुलकित ने अपने परिवार जनो के समक्ष ये इक्षा जाहिर कि वो अपने आगे कि पढाई को जरी रखना चाहता है | उसने बताया कि वो प्रदेश के ही किसी अच्छे महाविद्यालय से गणित में बी.ऐ करना चाहता है | जब भाई ने ये बात सुनी तो उसने अपनी नाराजगी जताते हुए कहा कि, ''दुनिया आगे कि ओर चलती है और एक ये महाशय है जो पीछे कि ओर भाग रहे है | वैसे भी जब से तुमने इंजीनियरिंग के कोर्स को छोड़ा है तब से पूरा मोहल्ला पिता जी का मजाक बनता है | अब आर्ट्स में दाखिला लेकर तुम रही-सही कसर पूरा करना चाहते हो |'' भाई के इन शब्दो के के जवाब में पुलकित कुछ नही कह पता है कि तभी उसके पिता सोमिल से कहते है, ''जो होना था वो हो चूका है अब इन बातो को उखाड़ने का कोई मतलब नही रह जाता है, अब पुलकित जो करना चाहता है उसे करने दिया जायेगा |'' परिणाम स्वरुप पुलकित प्रदेश के ही एक अच्छे महाविद्यालय में दाखिला लेने में सफल हो ही जाता है | पुलकित इस बात से भली-भाति परिचित था कि उसने जिस ख्वाब को अपने दिल में पाल रखा है वो केवल और केवल उसके ज्ञान के द्वारा ही सम्भव है इसलिए वो काफी लगन और मेहनत से बी.ऐ कि तैयारियों में जुटा हुआ था | हाँ भले ही वो कोचिंग में दाखिल होने में अभी तक सफल नही हो पाया था परन्तु उसने अभी तक श्रम से मुँह नही फेरा था वो अबी भी इस कोशिश में रहता था कि बस किसी भी तरह हर माह कम से कम १५०० रुपए तो पैदा किये ही जाये |
बी.ऐ. प्रथम वर्ष कि परीक्षा का समय नजदीक आ चूका था | पुलकित कि मेहनत इस बात का संकेत दे रही थी कि वो इसके लिए पूरी तरह से तैयार है | देखते ही देखते वो समय भी नजदीक आ गया जब उसका पहला पेपर था | पुलकित का कॉलेज उसके घर से तीस किलोमीटर कि दूरी पर स्थित था और रास्ता भी इतना ठीक न था कि परीक्षा समय से दो घंटा पूर्व ही निकला न जाये | वो अपने घर से साईकिल से ही पेपर देने जाता था | और ६० किलोमीटर साईकिल चलने के बाद जाहिर सी बात है कि कोई भी किशोर अपने आप को थका हुआ महसूस करेगा | परन्तु इस थकावट पर उसकी मानसिक थकावट ज्यादा हावी थी | वो खुद को इस सफ़र में अकेला ही महसूस करता था | अगर वो कभी एकान्त में बैठ कर पहले और अब के समय का विशलेशण करता तो स्वतः ही उसके आंसू बहने लगते थे | उसे महसूस होता कि मनो उसने अपने परिवारजनो को खो दिया है | वो अपने जो पहले उसके पेपर के समय उसकी छोटी-छोटी जरुरतो का ख्याल रखते थे और इस इन्तजार में उसकी माँ घर के मुख्या द्वार में खड़ी रहती थी कि कब उसका पुलकित पेपर दे कर वापस लौटेगा | और वो उससे पूछ सकेगी कि बेटा पेपर कैसा हुआ ? और उसके बाद गरम-गरम खाना परोसेगी और जल्दी सो जेन के लिए कहेगी | लेकिन अब तो स्थित ऐसी थी कि मनो घर वालो को ये भी पता न हो कि पुलकित का आज पेपर है भी कि नही | पुलकित को स्वयं पर विश्वास था कि वो अपने घर में खोये हुए सम्मान को वापस पा सकेगा और उसके इसी विश्वास को मजबूत करने का काम उसके अच्छे बीतते हुए पेपर कर रहे थे | उसे इसे बात कि आशा थी कि अच्छे नम्बरो से पास होकर वो पुनः पहले जैसी स्थित ला सकेगा |
आज का दिन पुलकित के लिए काफी महत्वपूर्ण है | और होना भी स्वाभाविक था क्यों कि आज उसके बी.ऐ. प्रथम वर्ष का परिणाम आने वाला है | घर पर सब कुछ सामान्य है बस केवल पुलकित को छोड़कर, आज पुलकित के चेहरे पर बेचैनी साफ़ देखी जा सकती थी | परन्तु किसी ने भी उसकी इस बेचनी को कम करने का प्रयास तक नही किया | घर पर सभी को ये पता था कि आज पुलकित का रिजल्ट आने वाला है परन्तु उनमे से किसी के भी मुख से रिजल्ट नाम का शब्द तक सुनाई नही पड़ा था | पुलकित तो बस मन ही मन ये प्रार्थना किये जा रहा था कि भगवान मैं बस किसी तरह अच्छे नम्बरो से पास हो जाऊ | समय धीरे-धीरे करवट ले रहा था और देखते ही देखते घड़ी में साढ़े बारह बज गये यानि अब कुछ ही समय के इन्तजार के बाद रिजल्ट कि प्राप्ति होनी थी | पुलकित ने भी अपनी साईकिल उठाई और रिजल्ट जानने हेतु कॉलेज कि ओर चल दिया | देखते ही देखते वो अपने विद्यालय तक जा पहुँचता है, जब वो वहाँ का दृश्य देखता है तो उसे किसी अनिष्ट कि आशंका होती है बल्कि ऐसा कुछ था जब कि वहाँ उपस्थित विद्यालय के शिक्षको का जमावड़ा पुलकित कि ही बाँट जो रहा था | प्रधानाचार्य महोदय ने पुलकित के गले में पुष्पो कि माला पहनाई और उसे इस बात से अवगत कराया कि उसने पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप किया है | इतना सुनते ही मनो पुलकित का चेहरा गुलाब कि भाति खिल उठा हो और अपने सुगंध को समस्त जगत में बिखेरने के लिए उतावला हो | वो अपनी इस खुसी को सर्वप्रथम अपने परिवार के साथ बाटना चाहता था इसलिए उसने ज्यादा देर न करते हुए घर के लिए निकलना ही उचित समझा | उसमे इस बात को लेकर उत्सुकता ज्यादा हावी थी कि वो बस जल्दी से जल्दी इस समाचार को घर वालो को सुना सके इसी कारणवश अन्य दिनों कि अपेक्षा उसकी साईकिल कि रफ़्तार भी अधिक तेज थी | मंद-मंद मुस्कान ओंठो पर पर 'जीत का गीत' इस ओर इशारा कर रहा था कि वो मन ही मन भविष्य देखने कि कोशिस कर रहा है वो देखता है कि ''जैसे ही वो अपनी खुशी को अपनी माँ वसुंधरा को बताता है तो वो पुलकित कि बात पर यकीं नही करती है और पुलकित को अपनी कसम का वास्ता देते हुए उसे सच बोलने के लिए कहती है | पुनः जब पुलकित इस बात को दोहराता है तो माँ पुलकित को अपने ह्रदय से लगा लेती है और कहती है कि मैं जानती थी कि मेरा बोटा होनहार है लेकिन वो मोहल्ले वालो कि बातो ने मुझे ऐसा बना दिया था | अब देहना तुम कि मैं कैसे उनकी खबर लेती हूँ..|'' पुलकित को महसूस होता है उसका ये रिजल्ट वर्त्तमान के गिले-सिकवे को दूर करने का काम करेगा | साथ ही साथ वो इस बात कि उम्मीद भी कर रहा था कि इससे उनके मुख पर भी ताला लगेगा जो उसका इंजीनियरिंग छोड़ने के बाद से ही मजाक उड़ाया करते थे | तथा फिर से पिता जी इन लोगो के सम्मुख छाती चौड़ी करके खड़े हो सकेगे लेकिन शायद वो व्यर्थ ही ये सब चित्रण कर रहा था कि क्यों कि गणित के शिक्षक 'आर. पी. यादव' ने उसके सूचित करने से पहले ही गौतम जी को इस बात से अवगत करा दिया था और इस तरह ये सुचना पहले ही समूचे मोहल्ले में बिखर चुकी थी |
कुछ ही देर में घर पहुँचने के बाद पुलकित सोचता है कि जब आज वो अपनी माँ को ये बात बतायेगा कि उसने पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप किया है तो आज वो पुनः अपनी माँ को वैसा खुस होता देख पायेगा जैसा कि उसने उन्हें हाईस्कूल, इंटर के रिजल्ट के समय देखा था | इसी उम्मीद और हल्की मुस्कुराहट को अपने मुख-मंडल में समेटे हुए जब वो अपनी माँ को घर में खोजता है तो वो पता है कि वो किचन में खाना बना रही है |
पुलकित किचन में अपनी माँ से- ''एक बात बताये |''
माँ- ''क्या...?''
पुलकित- ''मैंने..(दबे स्वर में)...पूरी यूनिवर्सिटी में टॉप किया है ..(ऊँचे स्वर में)..|''
माँ वसुंधरा पुलकित को नजरंदाज़ करते हुए- ''इसमें इतना चिल्लाने कि जरुरत नही है कोई सरकारी नौकरी नही पा गये हो |''
पुलकित को अपनी माँ से ऐसी प्रतिक्रया कि उम्मीद बिल्कुल भी नही थी | गुलाब कि भाती खिले हुए उसके चेहरे को मुरझाने में तनिक भी देर न लगी | वो जिस नूर को अपनी आँखों में समेटे हुए माँ समक्ष गया था वो अब बिल्कुल दूर हो गया था और बचा था तो वो केवल खारा जल था | जो ये एहसास दिल रहा था कि उसके जीवन में मिठास का कोई भी स्थान नही है | उसने किसी तरह खुद को सम्भाला और बहार वाले कमरे में जा कर तखत पर औंधे मुह लेटकर रोने लगा | ऐसा नही था कि पुलकित कि इस सफलता ने वसुंधरा जी के दिल को ठंडक नही पहुंचाई थी परन्तु इस वक़्त वो दिल कि नही बल्कि अपने दिमाग कि सुन रही थी और जब भी कोई इंसान अपनी आत्मा कि आवाज, अपने दिल के द्वारा सुझाये गये रास्तो को ठुकराता है, उसके विरुद्ध जाता है तो इसमें कोई शंका नही होनी चाहिए कि वो गलत दिशा में बढ़ रहा है | लेकिन माँ का दिल तो आखिर माँ का दिल है वो कब तक अपने पुत्र कि खुशियों को साझा करने से दूर भाग सकता है | उन्हें करीब तो आना ही था | परिणाम स्वरुप उन्होने दैनिक कार्यो को विराम दिया और किचन से उठ कर बहार वाले कमरे कि ओर बढ़ गयी और वहाँ पर वो देखती है कि पुलकित तखत पर औंधे मुह लेता हुआ है | वसुंधरा जी ने स्नेह से पुलकि के सर पर हाथ फेरते हुए कहा, ''मुझे ये बात पहले से ही पता थी क्यों कि यादव सर पहले ही तुम्हारे पिता जी को ये बात बता गये थे तभी तो हमने कोई खुशी नही जाहिर कि |
साथ ही साथ उन्होने अपनी इक्षा को प्रकट करते हुए पुलकित से कहा, ''देखो, नंबर तो तुम बहुत बढियां लाये हो लेकिन अब सरकती नौकरी कि तरफ ज्यादा भागो तभी मेहनत सफल है..न जाने कितने बी.ऐ. वाले ठेला लगा रहे है |''
लेकिन पुलकित के मुह से न तो हाँ बोला जा रहा था और न ही न | मनो वो इस बात कि जानबूझकर अनसुनी कर रहा हो | लेकिन कुछ भी हो पुलकित के सफल परिणाम ने उसके परिवार कुछ हद तक तो संगठित करने का प्रयास तो किया था अब परिवार जन पुलकित के ऊपर नजर भी रखते थे और सलाह-मशवरा भी करते थे | वो कहाँ जा रहा है ? क्या कर रहा है ? इसका भी घर वाले ध्यान रखने लगे थे | लेकिन पुलकित को तब भी बुरा लगता था जब सब लोगो ने उससे दुरी बना राखी थी और अब भी बुरा लगता है जब सब कोई उस पर नजर रखने लगे थे | जहाँ पुलकित कि नजरे इंजीनियरिंग कि कोचिंग में दाखिला लेने को लेकर थी | वहीँ परिवारजन चाहते थे कि वो किसी सरकारी नौकरी कि तैयारी करने वाली कोचिंग संस्थान में दाखिला ले इतने समय के मध्य पुलकित ने इतने रुपए कि बचत कर ली थी कि वो इंजीनियरिंग कि कोचिंग में दाखिला ले सके | परन्तु दिक्क़त ये थी कि वो परिवार वालो को ये बात कैसे बताये ? काफी कुछ सोचने के बाद उसे एक ही सूझ नजर आ रही थी और वो थी 'झूठ' | लेकिन क्या झूठ बोलना सही होगा ? इस बात का आकलन पुलकित नही कर पा रहा था | यह सच ही कि सच बोलने से युधिष्ठर धर्मराज कहलाये लेकिन यह भी सत्य है कि झूठ बोलने से भगवान कृष्ण कोई अधर्मराज नही बन गये | तात्पर्य यह ही कि कभी-कभी झूठ बोलना ही उचित होता है बशर्ते तब जब आपका उद्देश्य कल्याणकारी और मानवहित कि रक्षा हेतु हो | और पुलकित ने यही सब सोच कर घर वालो से झूठ बोलने का फैसला लिया | पुलकित ने दाखिला तो इंजीनियरिंग कि कोचिंग में लिया परन्तु घर वालो से झूठ बोला दिया कि उसने सिविल कि तैयारी करने वाली कोचिंग में दाखिला लिया है | जब वो अपने घर वालो के समक्ष इस बात को बोल रहा था तो उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मनो वो कोई अपराधी हो | परन्तु सच बोल कर उनके उद्देश्य कि पूर्ति भी तो नही होनी थी |
(14)
आज पुलकित का कोचिंग में पहला दिन है | जब पुलकित ने कक्षा में प्रवेश किया तो उसने देखा कि कक्षा काफी विशाल है, जिसमे लगभग 1000 विद्यार्थी आराम से बैठ सकते है | उत्तेजना इतनी अधिक थी कि वह कक्षा प्रारम्भ होने कि आधे घंटे पहले ही वहाँ पर पहुँच गया | जैसे-जैसे कक्षा प्रारम्भ होने का समय नजदीक आता जा रहा था वैसे-वैसे कक्षा में विद्यार्थियों कि संख्या भी बढ़ती जा रही थी | धीरे-धीरे लगभग पूरी कक्षा भर गयी | काली जींस पैंट और सफ़ेद टीशर्ट को पहने हुए जब कोचिंग के डायरेक्टर अमित शर्मा जो कि गणित के अध्यापक थे ने प्रवेश किया तो मानो दो घंटे कि कक्षा मालूम ही न पड़ी |
पुलकित को कोचिंग जाते हुए लगभग 15 दिन बीत चुके थे | परन्तु यहाँ भी अंग्रेजी भाषा ने उसका साथ नही छोड़ा था लेकिन इसका हल निकलना भी तो आवश्यक था वरना वो जो सोच रहा था वो सच कैसे होता | पुलकित ने इसका हल निकला...और वो हल था कड़ी मेहनत तथा स्वाध्याय | 'स्व' अर्थात आत्मा और 'अध्याय' अर्थात चिंतन, कहने का मतलब है आत्म चिंतन | यानि अध्यापक के ऊपर से अत्यधिक निर्भरता को समाप्त कर कड़ी मेहनत और आत्मचिंतन पर जोर दिया जाये | जब अगर किसी को व्यवस्था बदलनी है तो सबसे पहले उस व्यवस्थ को समझा तो जाये, फिर उसमे परिवर्तन को सोचा जाये | और इस समय व्यवस्थ को समझना ही पुलकित के लिए ज्यादा जरुरी था | वो परिवर्तन का बीज जो इंजीनियरिंग कोर्से के समय ही पुलकित में बोया जा चूका था वो अब पौधा बन कर तैयार था बस जरुरत थी तो अब उसकी अच्छे से देखभाल करने कि ताकि आगे चल कर वो औरो को लाभ दे सके | फलस्वरूप पुलकित ने भी स्वयं से वादा किया कि वो देश कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाएगा | लोगो को इस बात के लिए जागरूक करेगा कि भारतीय भाषाओ में पढ़ कर भी इंजिनियर और वैज्ञानिक बना जा सकता है | उसे यह कतई समझ में नही आता था कि हमें उच्च शिक्षा अपनी पसंद कि भाषा क्यों उपलब्ध नही करायी जाती है ? आखिर कब तक यही ढर्रा चलता रहेगा ? बल्कि सच तो यह है कि अपने पसंद कि भाषा में अगर विद्यार्थी को उच्च शिक्षा मिलने लगे तो इस देश को सफलता के क्षितिज पर पहुंचने से कोई नही रोक सकता है | इसलिए वो वो सपना जो कुछ धुंधला सा था वो अब साफ़ हो चुका था | और पुलकित ने इस बात का प्रण किया कि वो एक ऐसा इंजीनियरिंग कॉलेज खोलेगा कि जिसमे विद्यार्थी को उसकी रूचि कि भाषा में पढ़ने कि आजादी हो |
दो माह का वक़्त बीत चुका था | और इतने समय के मध्य पुलकित ने अपनी कड़ी मेहनत, आत्म चिंतन और त्याग के बलबूते काफी हद तक अपनी व्यक्तिगत दिक्कतो को दूर कर लिया था | और अब तो कोचिंग टेस्टो का दौर भी प्रारम्भ हो गया था | आज पुलकित का कोचिंग में पहला टेस्ट है | और वो आश्वस्त था कि वो टेस्ट में बेहतर करेगा, यह सर्वविदित था कि टेस्ट में आने वालो नम्बरो से ही तय होगा कि वो 'उजाले' कि ओर बढ़ रहा है या 'अँधेरे' कि ओर | उसकी आँखों ने जिस सपने को दिन के उजाले में देखा था उसके लिए जरुरी था कि वो अपने ज्ञान कि आभा को दिन प्रति दिन बढता ही रहे | इसलिए वो कोचिंग टेस्ट के लिए भी कड़ी मेहनत करने से पीछे नही हट रहा था | पुलकित अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटा हुआ था | समय कि ख़ामोशी भी पुलकित को कोचिंग जाने के लिए इशारा कर रही थी | पुलकित ने अपने बैग को कंधे पर टांगा और साईकिल पर बैठ कर कोचिंग के लिए निकल लिया | रास्ते में पुलकित को जाम से भी जूझना पड़ा जिसके कारण उसे कोचिंग पहुँचने में 15 मिनट कि देरी हो गयी | और जब पुलकित ने कक्षा में प्रवेश किया तो देखा कि सभी छात्र कक्षा में उपस्थित है तथा टेस्ट पेपर में व्यस्त है | जिनकी निगरानी हेतु 'अमित' सर ने सहायक अध्यापक 'सूरज पाल सर' को लगा रखा है |
सूरज सर पुलकित को दरवाजे में खड़ा देखकर- ''कहाँ बेटा..?''
पुलकित- ''सर वो टेस्ट पेपर दे दीजिये |''
सूरज सर- ''टेस्ट पेपर.., लेकिन अब क्या करोगे देकर ?''
पुलकित- ''सर वो रास्ते में जाम लग गया था इसलिए देर हो गयी |''
सूरज सर- ''ये बहाने मुझे मत समझाओ और हाँ अगर टेस्ट देना है तुम्हे तो जाओ और डायरेक्टर सर से बात करो जाकर |''
पुलकित थोड़ी देर तो खड़ा रहता है | जब देखता है कि यहाँ पर 'दाल गलने वाली नही है' तो फिर वो अमित सर के ऑफिस कि ओर बढ़ना ही बेहतर समझता है |
अमित सर के ऑफिस के बहार खड़ा होकर पुलकित- ''सर! क्या मैं अंदर आ सकता हूँ |''
अमित सर- ''हाँ...हाँ, आइयें |''
पुलकित- ''सर वो सूरज सर टेस्ट में बैठने नही दे रहे है |''
अमित सर आश्चर्य से- ''टेस्ट में नही बैठने दे रहे है...क्यों ?''
पुलकित धीमी आवाज में - ''सर वो जाम कि वजह से थोड़ी सी देर हो गयी थी | इसलिए...|''
अमित सर- ''थोड़ी देर, तुम्हे पता है अब केवल एक घंटा ही शेष बचा है, आधे घंटे तो तुमने यूँ ही बर्बाद कर दिए | अब भला टेस्ट में क्या अच्छा करोगे ?''
पुलकित तर्क-वितर्क करने कि बजाये शांत खड़े रहना ही हितकर समझता है | कुछ छड़ो बाद...
अमित सर- ''अब जाओ भी अच्छा..दो जाकर टेस्ट पेपर, यहाँ सर लटकाकर क्यों खड़े हो |''
पुलकित- ''धन्यवाद सर!''
और इतना कह कर भाग कर कक्षा में चला जाता है | तथा टेस्ट पेपर को प्राप्त कर उसे करने में जुट जाता है | उसकी मेहनत यहाँ पर सार्थक सिद्ध होती है और एक घंटे में ही वो सम्पूर्ण पेपर को हल करने में सफल हो जाता है | टेस्ट पेपर हल हो जाने के उपरांत उल्कित को इस बात कि प्रबल सम्भावना दिख रही थी कि वो शतप्रतिशत अंक लेन में सफल हो जायेगा |
क्लास टेस्ट के रिजल्ट ने आज पुलकित के ह्रदय को खासा गौरवान्वित होने का अवसर दिया था | क्यों कि वो क्लास का पहला ऐसा बच्चा था जिसने पुरे में पुरे अंको को प्राप्त किया था | इसी ख़ुशी में तब और चार चाँद लग गये जब पुलकित के सभी साथियों ने उसके सम्मान में तालिया बजाई तथा कोचिंग प्रसाशन ने भी उसे स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया | पुलकित को मिले इस उपहार ने उसे ना केवल गर्व का अनुभव कराया बल्कि उसकी मेहनत को और बल प्रदान किया |
अब पुलकित लगभग हर एक टेस्ट में अविरत बेहतर प्रदर्शन करता जा रहा था | उसकी काबिलियत का ही एक उदाहरण था कि आज उसे कक्षा का हर एक विद्यार्थी जनता था और अमित सर का मानो वो एक पसंदीदा छात्र बन चुका था | अमित सर को अक्सर ही ऐसा महसूस होता था कि पुलकित में कुछ अलग ही बात है | वो मानते थे कि पुलकित अब तक उनके द्वारा पढ़ाये हुए छात्रो में से सर्वश्रेस्ठ है | एक दिन क्लास छूटने के बाद अमित सर पुलकित से, ''पुलकित, घर जाने से पहले मुझसे मिल के जाना |'' पुलकित, ''जी सर!''
जब पुलकित अमित सर के ऑफिस में पहुँचता है तो-
अमित सर- ''आओ..आओ..,पुलकित बैठो | और पढाई कैसी चल रही है |''
पुलकित- ''जी सर बढियां चल रही है |''
अमित सर- ''बढियां ही चलनी चाहियें...अच्छा ये बताओ तुम गणित के आलावा बाकि सरे विषय कहाँ पढ़ते हो |
पुलकित शांत सा बैठा रहता है | और महसूस करता है कि उसे झूठ बोलकर अमित सर को अँधेरे में नही रखना चाहियें |
अमित सर क्या हुआ ? शांत क्यों हो ? कोई पैसो-वैसो कि दिक्कत हो तो बताओ, कोचिंग संस्था तुम्हारे साथ है !''
पुलकित- ''नही सर ऐसी कोई बात नही है..|''
अमित सर- ''नही...नही कोई बात तो है, तुम जरुर कुछ छुपा रहे हो |''
पुलकित आत्मविश्वास के साथ- ''सर, दरसल बात ये है कि मैं इंजीनियरिंग कि तैयारी ही नही कर रहा हूँ |''
अमित सर बड़े ही जिज्ञासु भाव में- ''मैं कुछ समझा नही..!''
पुलकित उन सारी घटनाओं को एक-एक कर के अमित सर को बताता है जिसने उसके ह्रदय में परिवर्तन रूपी बीज़ को बोने का काम किया था | जिस छड़ पुलकित अपने अतीत को अमित सर के साथ साझा कर रहा था उस छड़ उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो समय सा थम गया हो | उन्हें पुलकित कि आँखों में एक अजीब सी चमक दिख रही थी, उसकी बातो में कुछ कर गुजरने कि मंशा साफ जाहिर हो रही थी | अमित सर खुद को बेहद भाग्यशाली समझ रहे थे कि उन्हें एक ऐसी सोच को रखने वाले छात्र को पढने का मौका मिला है जो ज्ञान के प्रकाश को और अधिक चमकीला बनाना चाहता है | उन्होने न केवल पुलकित को ये विश्वास दिलाया कि वो उसकी हर सम्भव मदद करेंगे बल्कि स्वयं से भी इसके लिए वायदा किया |
(15)
पुलकित शिक्षा के क्षेत्र में लगातार ही बेहतर प्रदर्शन करता जा रहा था | अब तक वो अपनी ग्रेजुएशन कि पढाई को पूरा कर चुका था | एक तरह अब उसके जीवन के दूसरे अध्याय का आरम्भ हो चुका था क्यों कि वो अब 'अमित सर' के साथ बतौर सहायक अध्यापक, अध्यापन के कार्य में लगा हुआ था |
पुलकित को अमित सर के साथ पढते हुए लगभग दो वर्ष का समय बीत चुका था | अब उसके मन में इस बात कि इच्छा बहुत तेजी से बढ़ रही थी कि वो एक ऐसी कोचिंग का शुभारम्भ कर सके जिसमे इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा कि तैयारी को हिंदी भाषा में कराया जाये | क्यों कि कहीं न कहीं पुलकित अंग्रेजी भाषा में पढ़ा-पढ़ा कर उब चुका था और स्वयं में आनंद कि कमी को महसूस कर रहा था | अंततः पुलकित अमित सर के सहयोग और अपनी इच्छा शक्ति के बल पर ऐसी कोचिंग का शुभारम्भ करने में सफल हो ही गया | परन्तु क्या वर्षो से सोई हुई इस आवाम को जगाना क्या आसान काम था ? नही इतना आसान तो न था | इसके लिए कोई साधारण नही बल्कि किसी विशेष प्रयाश कि जरुरत थी | और इसका अहसास पुलकित को 'अँधेरे' में जी रहे युवा वर्ग ने करा दिया था क्यों कि पुलकित को कोई भी अकेला ऐसा छात्र नही मिला था जो कि इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा कि तैयारी को हिंदी भाषा में करना चाहे क्यों कि कहीं न कहीं युवाओ के मन में इस बात को लेकर आशंका थी कि क्या वे हिंदी भाषा में 'इंजीनियरिंग' जैसी टेक्निकल पढाई को पढ़कर अपने आप को स्थापित कर पायेगे ? जहाँ विदेशी कंपनियों का साम्राज्य पुरे देश में फैला हुआ है, क्या वहां किसी हिंदी भाषी छात्र को रोजगार मिल सकेगा | लेकिन युवा वर्ग इतनी छोटी सी बात नही सोच पा रहा था कि आखिर क्यों विदेशी कंपनी हमारे देश में पैर जमाये हुए है | कौन इसका अपराधी है ? किसके कारण से हमारी ये दशा हुई है ? हाला कि पुलकित ने मीडिया, बैनरो, टीवी विज्ञापनों इत्यादि के माध्यम से तो बहुत कोशिश की कि लोग जागरूक हो और इस बात को समझे कि अपनी भाषा में भी पढ़ कर तरक्की पायी जा सकती है परन्तु किसी एक ने भी उसका साथ नही दिया | तब पुलकित को ये समझने में देर न लगी कि युवाओ के आँखों में बंधी पट्टी को उतारना इंतना आसान काम न होगा | फलस्वरूप पुलकित ने फैसला किया कि वो तब तक अंग्रेजी भाषा में ही पढ़ाता रहेगा जब तक कि वो इतने धन को इकठ्ठा न कर ले कि वो अपने सपनो का इंजीनियरिंग कॉलेज खोल सके | और फिर वो कोई ऐसी लोकलुभावनी सूझ सोचेगा जिससे युवाओ के दिमाग में व्याप्त 'अंधरे' को छांटा जा सके |
समय गुजरते वक़्त कहाँ लगता है | और यूँ ही देखते-देखते सात वर्ष बीत चुके थे | इन सात वर्षो के मध्य पुलकित कि निजी एवं पारिवारिक जिंदगी में काफी बदलाव आ चुके थे | लेकिन देश कि शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल भी नही बदली थी | और अब तो और भी तीव्र गति से देश का युवा इस अंग्रेजी भाषा के चक्रव्यूह में फसा जा रहा था | लोगो में भारतीय भाषाओ के विस्तार के लिए तो कोई आगे नही आ रहा था परन्तु अंग्रेजी भाषा का गुणगान कर युवाओ को भ्रमित करने वालो कि संख्या अवश्य बढ़ गयी थी | पुलकित अब तक तीस वर्ष का हो चुका था और इन्ही सात वर्षो के मध्य में उसके बड़े भाई सोमिल कि शादी भी हो चुकी थी तथा अब तक उन्हें एक 'पुत्री रत्न' कि प्राप्ति भी हो चुकी थी जिसका नामकरण स्वयं पुलकित ने 'प्रतीक्षा' को रख कर किया था | चाचा, भतीजी में गजब का स्नेह था | शायद इसका एक कारण ये भी था कि प्रतीक्षा के जन्म के बाद से ही पुलकित के धन और यश में काफी बढ़ोत्तरी हो रही थी, तथा अब उसकी गिनती प्रदेश के सबसे बेहतरीन अध्यापको में होने लगी थी | पुलकित कि इसी सफलता का ही परिणाम था कि अब उसके परिवारजन उसकी व्यक्तिगत जिंदगी को लेकर लगभग निश्चिंत हो चुके थे, बस अब एक ही चिंता थी जो परिवार जानो को सताए जा रही थी कि किसी भी तरह उनका प्यारा पुलकित विवाह के बंधन में बांध जाये | लेकिन तो पुलकित तो बस अपने सपनो के कॉलेज खयालो में ही खोया रहता था उसको इस बात कि बड़ी ही जल्दी थी कि बस वो किसी तरह इस कॉलेज का निर्माण कार्य पूरा करा सके |
दो वर्षो की कड़ी मेहनत और मशक्कत के बाद आखिरकार उसके सपनो का कालेज बन कर तैयार था | जिसके लिए वो अमित सर और शुभम के सहयोग को सर्वोपरि मानता था | ये अमित सर के ही सहयोग का ही परिणाम था जो उसे बीस शिक्षको की ऐसी टीम मिल चुकी थी जो न केवल हिंदी भाषा में पढाने के इच्छुक हो बल्कि कालेज की शिक्षा व्यवस्था वो सुचारू रूप से चलने में समर्थ हो |
पुलकित ने कालेज के प्रचार में कोई भी कमी नही छोड़ी, देश के इस पहले हिंदी भाषी कालेज ने युवाओ के मध्य काफी चर्चाएँ तो बनायीं परन्तु इतना सब नाकाफी था क्यों की अब भी युवा इस कालेज में प्रवेश लेने हेतु उत्साह नही दिखा रहा था | लेकिन अब किसी भी कीमत पर पुलकित अपने कदम को पीछे नही खीचना चाहता था | और उसके इसी अडिगपन और जुझारूपन का ही परिणाम था कि उसे एक 'नायब' सूझ जान पड़ी कि क्यों न अपने कालेज में पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को बीस हजार रुपए मासिक दिया तथा प्रवेश भी निशुल्क हो | जब मीडिया इत्यादि के माध्यम से पुलकित कि इस योजना ने पाँव पसारे तो इसने न केवल देश के भीतर चर्चा बटोरी बल्कि विदेशो में भी इसने काफी सुर्खियां बटोरी | यहाँ तक कि कुछ मीडिया चैनलों ने इसे एक अनोखी जॉब का तगमा भी दे डाला | लालचवश ही सही परन्तु अब देश का युवा उत्साह अवश्य दिखा रहा था | लेकिन यूँ ही निठल्लो कि फ़ौज़ तैयार करने से क्या फ़ायदा जिसमे न तो काबिलियत हो और न ही कुछ कर गुजरने का जज्बा | इसलिए पुलकित ने कालेज में प्रवेश लेने हेतु एक प्रवेश परीक्षा का आयोजन करवाया | देश में बने एक सकारात्मक माहोल का ही प्रभाव था कि काफी बड़ी संख्याओं में युवाओं ने इस प्रवेश परीक्षा में भाग लिया और जिसमे से कुल पचास छात्रों का चयन पुलकित कि टीम द्वारा किया गया | क्यों कि पुलकित कोचिंग पढ़ा कर इतने अधिक रुपयों को नही कम सकता था कि वो इससे ज्यादा विद्यार्थियों का खर्च वहन कर सके | साथ ही साथ पुलकित ने एक और फैसला भी लिया था कि वो तब तक किसी अन्य छात्रों को प्रवेश नही देगा जब तक कि वो अपने इस अनूठे प्रयोग कि सफलता या असफलता को नही देख लेता | दरसल इन सब चीज़ो के पीछे पुलकित का एक बहुत बड़ा उद्देश्य छुपा हुआ था | वो चाहता था कि लोगो में जागरूकता फैले, वो इस बात को भी समझे कि विज्ञान का सम्बन्ध ज्ञान से होता है न कि भाषा से | उसे पूरी-पूरी उम्मीद थी कि उसके द्वारा शुरू कि गयी ये पहल देश में एक सकारात्मक माहोल बना सकेगी | और शायद तब अन्य भारतीय भाषाओ के भी कालेज खुले और हो सकता है कि तब युवा भी इन कालेज में प्रवेश लेने हेतु उत्साह दिखाए न कि अंग्रेजी भाषी कालेजो में |
पुलकित इस बात से भली-भाँती परचित था कि इन पचास छात्रों कि सफलता या असफलता ही उसके भविष्य का निर्धारण करेगी इसलिए पुलकित ने अपने प्रथम व्याख्यान में युवाओं के हृदय में इस बात कि अलख जगाने कि पुरजोर कोशिश की, कि अपने उद्देश्य से पचित हो सके, वे ये भी समझ सके कि उनका लक्ष्य क्या है, उनका सपना क्या है और सम्भवता वो इस कोशिश में कामयाब भी रहा |
पुलकित का प्रथम व्याख्यान:
समस्त विद्यार्थियों,
उम्मीद करता हूँ कि आप सभी ने यहाँ तक पहुचने के लिए काफी मेहनत कि होगी | मुझे लगता ही कि आप सभी को ये बताने कि कोई जरुरत नही है कि इस कालेज के निर्माण के पीछे मेरा कोई निजी स्वार्थ नही छुपा है...लेकिन उद्देशय तो अवश्य ही है और मुझे लगता है कि आपको भी अपने इस उद्देश्य से परचित करा दिया जाये | लेकिन इन सब बातो से पहले मैं आप से कुछ पूछना चाहता हूँ | और उम्मीद करता हूँ कि आप सब बड़ी ईमानदारी से इसका उत्तर देंगे | मेरा प्रश्न यहां बैठे हर एक विद्यार्थी से है मैं बस इतनी सी बात पूछूंगा कि ये बताएं,'' क्या अंग्रेजी भाषी व्यक्ति किसी अन्य भाषा के ज्ञान को रखने वाले व्यक्ति कि अपेक्षा अधिक बुद्धिमान होता है ?
'नही', सभी ने एक स्वर में जवाब दिया |
तो फिर हम पर ये भाषा जबरदस्ती क्यों थोपी जा रही है | आप जानते है ? आज जापान, रूस, और चीन आदि देशो के शोधार्थी अपने देश कि भाषा में शोध करके डिग्री ले रहे है जब कि इसके विपरीत हम आज भी अंग्रेजो कि भाषा के चक्रव्यूह में फसे हुए है | आप कि जानकारी कि लिए मैं बता दूँ कि अंग्रेजी में मूल शब्द मात्र देश हजार है जब कि हिंदी में ढाई लाख से भी अधिक है | और विश्व में लगभग ११०३ मिलियन लोग हिंदी को बोल सकते है और यहाँ तक कि विदेश में भी हिंदी बोलने और समझने वाले लोग २ करोड़ के करीब है |
आज जहाँ हम अंग्रेजी को सभ्य और उन्नति कि भाषा समझते है वहीँ हम हिंदी को असभ्य और अनपढो कि भाषा समझते है | यहाँ तक हमारे समाज के बहुतेरे माँ-बाप केवल इस वजह से अपने बच्चो को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा रहे है क्यों कि उनमे इस बात कि भ्रान्ति फैली हुई है कि हिंदी भाषा में पढ़ कर उनका बच्चा कभी अपना भविष्य नही बना सकेगा | लेकिन इसका दोषी कौन है ? इसका दोषी है 'हमारा सिस्टम' और हम सब | आज हिंदी भाषा के उत्थान के लिए तो कोई आगे नही आता है लेकिन अंग्रेजी भाषा को जन-साधारण के बीच लोकप्रिय बनने के लिए न जाने कितने कोचिंग, कालेज खुल गए है | दुःख कि बात तो ये है कि हिन्दुस्तान में ही हिंदी का ऐसा अपमान हो रहा है |
हमारे देश कि पहचान हमारे संस्कारो से है, हमारी संस्कृति से है और हमारे प्रभावशाली इतिहास से है | जहाँ सम्पूर्ण विश्व हमरे अभिवादन के तौर-तरीको का दीवाना है वहीँ हम वेस्टर्न तरीको को शामिल किये जा रहे है | जहाँ पहले शिष्य अपने शिक्षको का पैर छू कर उनका अभिवादन करते थे वहीँ आज अधिकांश विद्यार्थी 'गुड मॉर्निंग' और 'गुड आफ्टरनून' प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते है |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें