बुधवार, 16 दिसंबर 2015

जवाब (लघुकथा- 1)

आज बड़ा लेट कर दिया आने में..., देर से सोकर उठे थे क्या?’ कालेज में अनुराग बाबू के साथ पढ़ाने वाले उनके पड़ोसी सुदेश ने देरी का कारण पूँछते हुए कहा ।
हाँ कुछ एक मेहमानो को स्टेशन तक छोड़कर आना था, बस उन्हे ही विदा किया और चला आया आपके पास, आखिर घर हो या कालेज आपसे दूर कैसे रह सकता हूँ ।हँसमुख मिजाजी अनुराग बाबू देरी का कारण बताते हुए बोले ।
बड़ा रिश्तेदार-विश्तेदार पधारे रहते हैं आपके घर में हमारे घर में तो कभी कोई आता ही नहीं जैसे ।सुदेश ने शरारती लहेजे में कहा ।
अब आप ठहरे बैचलर और मैं परिवार वाला आखिर अब इतना तो फर्क होता ही हैं एक शादीशुदा और गैर शादीशुदा व्यक्ति में ।अनुराग बाबू ने लगभग एक शिक्षक कि भाँति सुदेश को समझाते हुए उनसे ये सब कहा ।
हाँ वो तो हैं अनुराग जी, लगता हैं आप ईशारो ही ईशारों और कुछ ही कह रहे हैं...।सुदेश ने लगभग मुस्कुराते हुए कहा ।
अब मैं ठहरा सीधा सरल आदमी ऊपर से गणित का शिक्षक आपको भला कौन सा मौन सन्देश सुनाने लगा ।अनुराग बाबू बड़े ही भोलेपन से बोले ।
लेकिन अनुराग बाबू के इस जवाब के प्रत्युत्तर में सुदेश कुछ भी न बोले मानो कि वो कहीं और ही विचारो में मग्न हो ।
कहाँ खो गये सुदेश जी..!अनुराग बाबू ।
नहीं...नहीं कहीं नहीं बस..!सुदेश ।
अरे, कहीं तो...।लगभग सुदेश को उकसाते हुए अंदाज में अनुराग बाबू ने कहा ।
वो, कुछ नहीं...बस एक बात कहनी थी आपसे...गर आप बुरा न माने तो ।सुदेश ने थोड़ा झिझकते हुए अनुराग बाबू से कहा ।
अरे, ऐसी कौन सी बात कहने जा रहे है सुदेश भाई...भूमिका-वूमिका मत बनाइए बस कह डालिए फटाफट जो भी कहना हैं ।अनुराग बाबू ने हल्के फुल्के अंदाज में जवाब देते हुए कहा ।
वो मिश्रा जी हैं न मेरे पड़ोस वाले जो आपके गाँव के हैं, मैंने उनको किराने वाले से बात करते हुए सुना था कि भाभी जी अपने मायके पक्ष के रिश्तेदारो को ज्यादा तवज्जो देती है बजाय आपके.., अब मुझे ये तो नहीं पता हैं कि उनकी बात में कितना सच हैं और कितना झूठ...मैंने तो बस जो सुना कह दिया आपसे अब इतना तो...अनुराग जी आप सुन तो रहे है न...अपनी बात को समाप्त करने से पहले ही अनुराग बाबू के नजरंदाजगी भरे लहेजे को देखकर सुदेश को उनसे कहना पड़ा ।
अरे, माफ करिएगा यार सुदेश भाई मैं कहीं और ही खों गया था इसलिए जरा आपकी बात को ध्यान नहीं दे पाया ।अनुराग बाबू ने लगभग सुदेश कि आँखो में देखते हुए उनसे ये सब कहा ।
और इतना सुनकर सुदेश शिक्षक कक्ष से उठकर कक्षा के लिए ऐसे चल दिए कि मानो उन्हें अनुराग बाबू से उचित जवाब मिल गया हो ।

1 टिप्पणी:

  1. लघुकथा सराहनीय हैं इस बेहतरीन लघुकथा कि बधाईयाँ प्रिय मित्र

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