गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

लघुकथा एक परिचय

अगर बात लघुकथा की कि जाए तो हम साधारण अर्थ में इसे कहानी का संक्षिप्त रूप कह सकते है। आज की इस दौड़ती-भागती जिंदगी में लघुकथाओं ने क्या आम और क्या खास दोनो ही वर्गों में अपनी एक विशिष्ट पैठ बनाई हैं ।

लघुकथाओं का कथानक साधारणतय: किसी विशिष्ट पल और उसके संवाद को प्रदर्शित करता हैं । इसमें समान्यत: एक या दो पात्रो के माध्यम से कथा की रचना की जाती हैं जो कभी काल्पनिक या कभी सच्ची घटना पर आधारित हो सकती हैं ।

लेखन किसी भी विधा में किया जाए उसका उद्देश्य समाज के भीतर नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक सरोकार को बल प्रदान करना हैं । सामान्यत: लेखक अपनी लेखनी से समाज के लोगो को सत्य एवं असत्य, धर्म एवं अधर्म, स्वार्थ एवं निस्वार्थ के मध्य कि बारीक रेखा से परिचित कराता हैं । ठीक इसी प्रकार से कोई भी लघुकथा तब तक साहित्यिक द्रष्टि से सफल नहीं मानी जा सकती हैं जब तक कि उसकी कथावस्तु शिक्षाप्रद न हो ।

अन्य साहित्यक रचनाओं कि भाँति लघुकथा का शीर्षक भी सटीक होना चाहिए जिससे कि पाठक के चित्त में रोचकता के तत्व को जन्मां जा सके । किसी भी साहित्यक रचना का शीर्षक उसकी विषय-वस्तु को दर्शाता हैं अतैव लेखक को शीर्षक का चुनाव उसकी रचना के भावार्थ के आधार पर ही करना चाहिए ।

कहानी की भाँति लघुकथा के पात्रो का नामकरण बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए जिससे कथा कि रोचकता एवं सजीवता बनी रहे; उदाहरण के तौर पर ग्रामीण आंचल की किसी घटना को व्यक्त करने के लिए पात्रो का नामकरण ग्रामीण परिवेश के आधार पर गढ़ा जाना चाहिए जिससे कि पाठक कथा कि सजीवता को महसूस कर सके ।

अगर इस सम्बन्ध में प्रश्न किया जाए कि लघुकथा का आकार कितने शब्दो का होना चाहिए ? तो इसका उत्तर किसी भी तरह से सरल न होगा.....कहीं भी इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं मिलता हैं जो लघुकथा को किसी शाब्दिक सीमा में बाँधता हो । अत: इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि लघुकथा कितने भी शब्दों कि हो सकती हैं बस वो कहानी का रूप न लेने पाएं.....परन्तु फिर भी मेरे विचार से किसी भी लघुकथा के सृजन हेतु अधिकतम पाँच सौ शब्द उचित होंगे ।

धन्यवाद !

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

जवाब (लघुकथा- 1)

आज बड़ा लेट कर दिया आने में..., देर से सोकर उठे थे क्या?’ कालेज में अनुराग बाबू के साथ पढ़ाने वाले उनके पड़ोसी सुदेश ने देरी का कारण पूँछते हुए कहा ।
हाँ कुछ एक मेहमानो को स्टेशन तक छोड़कर आना था, बस उन्हे ही विदा किया और चला आया आपके पास, आखिर घर हो या कालेज आपसे दूर कैसे रह सकता हूँ ।हँसमुख मिजाजी अनुराग बाबू देरी का कारण बताते हुए बोले ।
बड़ा रिश्तेदार-विश्तेदार पधारे रहते हैं आपके घर में हमारे घर में तो कभी कोई आता ही नहीं जैसे ।सुदेश ने शरारती लहेजे में कहा ।
अब आप ठहरे बैचलर और मैं परिवार वाला आखिर अब इतना तो फर्क होता ही हैं एक शादीशुदा और गैर शादीशुदा व्यक्ति में ।अनुराग बाबू ने लगभग एक शिक्षक कि भाँति सुदेश को समझाते हुए उनसे ये सब कहा ।
हाँ वो तो हैं अनुराग जी, लगता हैं आप ईशारो ही ईशारों और कुछ ही कह रहे हैं...।सुदेश ने लगभग मुस्कुराते हुए कहा ।
अब मैं ठहरा सीधा सरल आदमी ऊपर से गणित का शिक्षक आपको भला कौन सा मौन सन्देश सुनाने लगा ।अनुराग बाबू बड़े ही भोलेपन से बोले ।
लेकिन अनुराग बाबू के इस जवाब के प्रत्युत्तर में सुदेश कुछ भी न बोले मानो कि वो कहीं और ही विचारो में मग्न हो ।
कहाँ खो गये सुदेश जी..!अनुराग बाबू ।
नहीं...नहीं कहीं नहीं बस..!सुदेश ।
अरे, कहीं तो...।लगभग सुदेश को उकसाते हुए अंदाज में अनुराग बाबू ने कहा ।
वो, कुछ नहीं...बस एक बात कहनी थी आपसे...गर आप बुरा न माने तो ।सुदेश ने थोड़ा झिझकते हुए अनुराग बाबू से कहा ।
अरे, ऐसी कौन सी बात कहने जा रहे है सुदेश भाई...भूमिका-वूमिका मत बनाइए बस कह डालिए फटाफट जो भी कहना हैं ।अनुराग बाबू ने हल्के फुल्के अंदाज में जवाब देते हुए कहा ।
वो मिश्रा जी हैं न मेरे पड़ोस वाले जो आपके गाँव के हैं, मैंने उनको किराने वाले से बात करते हुए सुना था कि भाभी जी अपने मायके पक्ष के रिश्तेदारो को ज्यादा तवज्जो देती है बजाय आपके.., अब मुझे ये तो नहीं पता हैं कि उनकी बात में कितना सच हैं और कितना झूठ...मैंने तो बस जो सुना कह दिया आपसे अब इतना तो...अनुराग जी आप सुन तो रहे है न...अपनी बात को समाप्त करने से पहले ही अनुराग बाबू के नजरंदाजगी भरे लहेजे को देखकर सुदेश को उनसे कहना पड़ा ।
अरे, माफ करिएगा यार सुदेश भाई मैं कहीं और ही खों गया था इसलिए जरा आपकी बात को ध्यान नहीं दे पाया ।अनुराग बाबू ने लगभग सुदेश कि आँखो में देखते हुए उनसे ये सब कहा ।
और इतना सुनकर सुदेश शिक्षक कक्ष से उठकर कक्षा के लिए ऐसे चल दिए कि मानो उन्हें अनुराग बाबू से उचित जवाब मिल गया हो ।

खुद में भगवान नजर आ जाए ।

1   

     
चार दिवारी दुनिया तेरी

पतझड़ पावन बहार हैं,

खुला आसमां प्रेम दिखाए

मगर ये सब बेकार हैं ।


यूँ समेट ली हैं ये दुनिया

मानव ने चौखाटे में,

अलग-अलग छड़ रंग दिखाए

नए-नए भिन्न मुखौटे में ।


फुदक रही ये जीवन-धारा

इस सीमित गलियारे में

मानो पंक्षी घर बनाए

समंदर के सिरहाने में ।


न प्रताप न संयम तुझमें

न प्रेम कि ज्वाला हैं,

जहाँ भी नजर उठाकर देखो

वहाँ गड़बड़ घोटाला हैं ।


जीवन में न रंग बचा हैं,

मानो फीका ये संसार हैं,

छोटा सा परिवार बनाकर

सोचे जिम्मेदार हैं ।

यूँ जो अगर जिम्मेदारी

कर्तव्य समझ में आ जाए,

सच मानलो इस दुनिया में

राम, रहीम फिर आ जाए ।


तो कर वादा हे! मानव

अपने इस परिवार से,

सीमित से गलियार नहीं

इस पूरे संसार से ।


करे भला तू जाति का अपनी

मानव तेरी जाति हैं,

मानव का हैं धर्म वहीं जिस

धर्म में विश्व-शांति हैं ।


आँखो को जो ये पूरा

संसार नजर में आ जाए,

सच मानलो दुनिया में

इंसान नजर में आ जाए ।


फैल जाएगी प्यार-मोहब्बत

इस पूरे संसार में,

जो गर मानव को खुद में

भगवान नजर में आ जाए ।


2.